Chatur Kekda aur Lali Bakri

चतुर केकड़ा और लाली बकरी

बहुत पुरानी बात है। मांझी गाँव में एक बूढ़ा, अपनी बुढ़ीया और दो लड़कों के साथ रहता था। एक दिन वह मेले से एक बकरी खरीद कर लाया और उस बकरी का नाम थी लाली। अगले सुबह उस बूढ़े ने अपने बड़े लड़के को बकरी चराने को भेजा । लड़का सारे दिन उस बकरी को चराकर ,शाम को घर लौट रहा था थाकि देखता है कि घर के बाहर दरवाजे पर लाल-लाल जूता पहने उसका बूढ़ा पिता खड़ा है। बूढ़े ने पूछा – ‘’बकरी , ओ बकरी ! तूने कुछ खाया पिया या नहीं ? ’’
“नहीं, बाबा, न मैंने कुछ खाया,न पिया ” बकरी ने जवाब दिया –“ उछल – कूदकर निकट पेड़ के जब मैं आई , तब एक पत्ती पाकर मैंने खाई । भरा सरोवर दिखा सामने चलते- चलते , झट से बढ़करएक बूँद बस मैंने पी ली,खाने को बस यही मिला था , पीने को बस यही मिला था ।”

बूढ़े को बहुत गुस्सा आया कि उसके बेटे ने उसकी प्यारी-प्यारी बकरी को सारे दिन भूखे रखा । गुस्से में उसने अपने बेटे से बात नहीं की । दूसरे दिन उस बूढ़े ने अपने छोटे लड़के को बकरी चराने भेजा । शाम को जब छोटा लड़का बकरी चराकर घर लौटा तो अपने पिता को दरवाजे पर ही इंतजार करते हुए पाया। इस बार बूढ़े ने बकरी से पूछा- ‘’बकरी , ओ बकरी ! तूने कुछ खाया पिया या नहीं ? ’’
“नहीं, बाबा, न मैंने कुछ खाया,न पिया ” बकरी ने जवाब दिया –“ उछल – कूदकर निकट पेड़ के जब मैं आई , तब एक पत्ती पाकर मैंने खाई । भरा सरोवर दिखा सामने चलते- चलते , झट से बढ़करएक बूँद बस मैंने पी ली, खाने को बस यही मिला था , पीने को बस यही मिला था ।”
उस रात बूढ़े ने अपने छोटे लड़के से भी बात नहीं की । अगले दिन वह स्वयं ही बकरी चराने गया और सारे दिन बकरी भरपेट खिला कर शाम को घर लौट आया। घर पहुँचते ही बूढ़े ने फिर बकरी से पूछा -‘’बकरी , ओ बकरी ! तूने कुछ खाया पिया या नहीं ? ’’

“नहीं, बाबा, न मैंने कुछ खाया,न पिया ” बकरी ने जवाब दिया –“ उछल – कूदकर निकट पेड़ के जब मैं आई , तब एक पत्ती पाकर मैंने खाई । भरा सरोवर दिखा सामने चलते- चलते , झट से बढ़करएक बूँद बस मैंने पी ली,खाने को बस यही मिला था , पीने को बस यही मिला था ।”
अब बूढ़े को बकरी पर बहुत क्रोध आया और वह उसे लेकर कसाई के पास गया। कसाई ने जैसे ही चाकू चलाने की कोशिश की बकरी रस्सी तुड़ाकर जोर से जंगल की ओर भागी । भागते – भागते उसे एक झोपड़ी दिखी, वह उस झोपड़ी में अलावघर पर चढ़ कर बैठ गयी ।
वह झोपड़ी चीकू खरगोश की थी । जब शाम को चीकू खरगोश लौट कर आया तो उसे पता चल गया कि उसके झोपड़ी में कोई पहले से मौजूद है। अत: उसने बाहर से हीं आवाज लगाई – “ घर में कौन है ? ”

अलावघर पर बैठी बकरी बोली –
“लाली बकरी , लाली बकरी
खाल है मेरी उधड़ी- उधड़ी
उल्टा- पुल्टा मेरा काम
तीन टके है मेरा दाम
दुम को अपनी हिला-हिलाकर
मारूँगी मैं रुला-रुलाकर
तुम्हें रौंदकर कुचल-कुचलकर
सींग मारकर, तुम्हें फाड़कर
लड़ना-भिड़ना मेरा काम
होगा तेरा काम तमाम”

चीकू खरगोश डरकर वहाँ से भाग गया और एक पेड़ के नीचे बैठकर रोने लगा ।तभी उधर से एक भालू गुजरा । उसने खरगोश को रोते हुए देखकर पूछा – “ ओ चीकू खरगोशवे ! तू क्युँ रो रहा है ? ”
खरगोश ने अपनी कहानी सुनाई , तब भालू ने कहा चल देखते हैं कौन घुसा है, मैं उसे बाहर निकालूँगा । दोनो झोपड़ी के पास पहुँचे । इस बार भालू ने गरज कर पूछा – “ घर में कौन है ? ”

अलावघर पर बैठी बकरी बोली –
“लाली बकरी , लाली बकरी
खाल है मेरी उधड़ी- उधड़ी
उल्टा- पुल्टा मेरा काम
तीन टके है मेरा दाम
दुम को अपनी हिला-हिलाकर
मारूँगी मैं रुला-रुलाकर
तुम्हें रौंदकर कुचल-कुचलकर
सींग मारकर, तुम्हें फाड़कर
लड़ना-भिड़ना मेरा काम
होगा तेरा काम तमाम”

इतना सुनते हीं भालू घिग्घी बँध गयी और वह दुम दबाकर वहां से भाग खड़ा हुआ । खरगोश फिर से पेड़ के नीचे जाकर रोने लगा । इस बार एक भेड़िया उधर से गुजरा , उसने भी खरगोश की बात सुनकर उसके साथ झोपड़ी के पास जाकर पूछा – “ घर में कौन है ? ”

अलावघर पर बैठी बकरी बोली –
“लाली बकरी , लाली बकरी
खाल है मेरी उधड़ी- उधड़ी
उल्टा- पुल्टा मेरा काम
तीन टके है मेरा दाम
दुम को अपनी हिला-हिलाकर
मारूँगी मैं रुला-रुलाकर
तुम्हें रौंदकर कुचल-कुचलकर
सींग मारकर, तुम्हें फाड़कर
लड़ना-भिड़ना मेरा काम
होगा तेरा काम तमाम”


भेड़िया भी डरकर वहाँ से भाग गया । उसके बाद लोमड़ी और कुच और जानवरों ने भी कोशिश की । लेकिन सब भाग गये। अंत में वहाँ से एक केकड़ा जा रहा था , उसने भी खरगोश से उसके रोने का कारण पूछा , तो चीकू खरगोश ने बताया कि उसके झोपड़ी में एक खतरनाक जानवर घुस गया है जो किसी से भी नहीं डरता । तब केकड़े ने कहा – “मैं उसे निकाल बाहर करूँगा ”
“भालू ने कोशिश की , लेकिन हार मान गया, भेड़िये ने भी कोशिश की, लेकिन दुम दबाकर भाग गया, लोमड़ी ने भी कोशिश की , वह थर-थर काँपने लगी । तुम भी नाकाम साबित होगे ” खरगोश नी कहा।
“देख लेना , अगर मैं उसे निकाल बाहर न करूँ तो ”
इतना कहकर केकड़ा रेंगते रेंगते झोपड़ी के बाहर पहुँच गया , फिर उसने जोर से पूछा – “ खरगोश की झोपड़ी में कौन है ? ”
बकरी पहले की तरह अलावघर पर बैठी- बैठी बोली –
“लाली बकरी , लाली बकरी
खाल है मेरी उधड़ी- उधड़ी
उल्टा- पुल्टा मेरा काम
तीन टके है मेरा दाम
दुम को अपनी हिला-हिलाकर
मारूँगी मैं रुला-रुलाकर
तुम्हें रौंदकर कुचल-कुचलकर
सींग मारकर, तुम्हें फाड़कर
लड़ना-भिड़ना मेरा काम
होगा तेरा काम तमाम”


लेकिन केकड़ा जरा भी नहीं डरा और रेंगता हुआ झोपड़ी के अंदर घुस गया गया, धीरे – धीरे अलावघर के ऊपर जा पहुँचा पहुँचा। वहाँ उसनी अपने मजबूत पंजों में बकरी को जकड़ लिया और बोला –
“सुन री , बकरी बकरी, मैं हूँ केकड़ा
मूर्ख नहीं हूँ , समझ गई तू ”
इधर पंजा कसा और वह मिमियाने लगी । किसी तरह केकड़े के पंजे से अपने आप को छुड़ा कर वहां से जान बचाकर भागी ।
खरगोश खुशी के मारे उछलने लगा ।वह अपने झोपड़ी में आया और केकड़े को धन्यवाद दिया ।उसके बाद वह खरगोश अपनी झोपड़ी में खुशी – खुशी रहने लगा ।

॥ समाप्त ॥