Furr Furr

लोक-कथा -फुर्र-फुर्र (Folk Tale – Furr Furr)

एक जुलाहा सूत कातने के लिए रुई लेकर आ रहा था। वह पेड के नीचे सुस्ताने के लिए बैठा ही था कि जोर की आँधी आई। आँधी में उसकी सारी रुई उड़ गई। जुलाहा घबराया–अगर बिना रुई के घर पहुँचा तो मेरी पत्नी तो बहुत नाराज़ होगी। घबराहट में उसे कुछ न सूझा। उसने सोचा, यही बोल दूँगा-फुर्र-फुर्र। और वह फुर्र-फुर्र बोलता जा रहा था। आगे एक चिड़ीमार पक्षी पकड़ रहा था।
जुलाहे की फुर्र-फुर्र सुनकर सारे पक्षी उड़ गए। चिड़ीमार को बहुत गुस्सा आया। वह जुलाहे पर बहुत चिल्लाया तुमने मुझे बरबाद कर दिया। आगे से तुम ऐसा कहना, पकड़ो! पकड़ो!
जुलाहा जोर-जोर से “पकड़ो! पकड़ो!” रटता गया। रास्ते में कुछ चोर रुपए गिन रहे थे। जुलाहे की “पकड़ो! पकड़ो!” सुनकर वे घबरा गए। फिर उन्होंने देखा कि अकेला जुलाहा ही चला आ रहा था। चोरों ने उसे पकड़ा और घूरते हुए कहा-यह क्यान बक रहे हो? हमें मरवाने का इरादा है क्या? तुम्हें कहना चाहिए, इसकों रखो, ढेरों लाओ, समझे ?
जुलाहा यही कहता हुआ आगे बढ़ गया-इसको रखो, ढेरों लाओ। जब वह श्मशान के पास से गुजर रहा था तो वहाँ गाँववाले शवों को जला रहे थे। उस गाँव में हैजा फैला हुआ था। लोगों ने जुलाहे को कहते सुना, ‘इसको रखो, ढेरों लाओ’, तब उन्हें बड़ा गुस्सा आया। वे चिल्लाए, तुम्हें शर्म नहीं आती है? हमारे गाँव में इतना भारी दुख फैला है और तुम ऐसा बकते हो। तुम्हें कहना चाहिए यह तो बड़े दुख की बात है।
जुलाहा शर्म से पानी-पानी हो गया। वह यही रटता हुआ आगे बढ़ने लगा-यह तो बड़े दुख की बात है। कुछ देर बाद वह एक बरात के पास से गुजरा। बरातियों ने उसे यह कहते हुए सुना, ‘यह तो बड़े दुख की बात है, यह तो बड़े दुख की बात है।’ इतना सुनकर वे जुलाहे को पीटने के लिए तैयार हो गए। बड़ी मुश्किल से उसने सफाई दी तो उन्होंने कहा– सीधे से आगे बढ़ो, और हाँ, अब तुम यह रटते जाना-भाग्य में हो तो ऐसा सुख मिले।
अब जुलाहा यही रटता हुआ अपनी राह चल पड़ा। चलते-चलते अँधेरा हो गया। घर से निकलते समय उसकी पत्नी ने उससे यही कहा था कि “जहाँ रात हो जाए वहीं सो जाना।’ जुलाहा थक भी गया था। वह वहां सो गया।”
अगले दिन जब सुबह उसके मुँह पर पानी पड़ा, तब जुलाहा हड़बड़ा कर उठा। आँखें खोलीं तो देखता ही रह गया-यह तो उसी का घर था। और अभी-अभी उसकी पत्नी ने ही उस पर पानी फेंका था। जुलाहे के मुँह से निकला-भाग्य में हो तो ऐसा सुख मिले।

लोक कथा -ठगराज (Folk Tale – Thagraj )।

जगन्नाथ पुरी में रथयात्रा की तैयारियां ज़ोर-शोर से चल रही थीं। पूरे देश से भक्तजन इस यात्रा में सम्मिल्रित होने आए थे। यहीं पर एक सराय में एक शहर के ठग और एक गांव के ठग की भेंट आपस में हो गई। दोनों ही ठगी के लिए रोज़ नई जगह जाते थे। इससे पकड़े जाने का डर कम रहता था। यहां भी ये दो नामी ठग धन कमाने की नीयत से आए थे। गांव के ठग के सिर पर सेमल की रुई का बड़ा सा बोरा था। शहर के ठग के कंधे पर छोटा सा झोला लटक रहा था।
“तुम्हारे पास क्याथ है?” शहर के ठग ने गांव के ठग से पूछा।
“मेरे पास ताज़ी हवा है। जो शहरों में नहीं मिलती। मैं इसे ऊंचे दाम पर बेचूंगा।”
इस बात से शहर का ठग ललचा गया। उसने कहा, “मेरे पास क़ीमती पत्थर हैं। जो कहीं भी बिक जाते हैं।”
“क्या तुम हवा के बदले मुझे अपना थैला दोगे?” शहर का ठग तो यही चाहता था, तुरंत तैयार हो गया।
रात में दोनों ठग अपने-अपने घर गए। अपनी पत्नी और बच्चों के सामने डींगे मारने लगे। “आज तो एक आदमी को ख़ूब उल्लू बनाया।”
“देखो छोटे से कोयले के थैले के बदले बोरी भर शुद्ध क़ीमती हवा लाया हूं।” लेकिन जैसे ही बोरी का मुंह खोला, रूई चारों तरफ उड़ने लगी।
दूसरे ठग ने जब थैला खोला और देखा उसमें कोयले थे, उसकी पत्नी ने ताना कसा, “चलो आज ठग को भी किसी ने ठग लिया। कोई ढंग का काम तो तुम्हें करना नहीं है। अच्छा हुआ।”
अगले दिन फिर रास्ते में उनका आमना-सामना हो गया। दोनों ने एक-दूसरे को घूरकर देखा और फिर ज़ोर से ठहाका लगाया। “ये भी ख़ूब रही, उस्तादों से उस्तादी!” एक बोला।
“मैं तो किसी सुंदरी के आंख का काजल चुरा सकता हूं।” दूसरा बोला।
“मैं तो ब्राह्मण के माथे का तिलक चुरा लूँ और उसे पता भी ना लगे।” पहले ने रौब दिखाया।
इस पर दोनों ने एक साथ ठगी करने की बात तय की। दोनों ने रात साथ में गुज़ारी। सवेरे वे एक घर में घुसे। वहां एक रईस बुढ़िया रहती थी। दोनों ने बुढ़िया के बारे में जानकारी आसपास के लोगों से इकट्ठी कर ली थी। वह बुढ़िया के पास गए, पैर छुए और बोले, “बुआ हम तुम्हारे भतीजे हैं। तुम तो इतने दिनों से घर आई नहीं। अब मेरे लड़के की शादी में तुमको ज़रूर आना है।”
बुढ़िया ने अपने भतीजों को बचपन में देखा था। इसी से उन्हें पहचाना नहीं। बुढ़िया ने अपने परिवार का हालचाल पूछा। फिर अतिथियों को चांदी के बर्तनों में खाना परोसा। ये बर्तन बुढ़िया को शादी में मिले थे। केवल विशेष मौक़ों पर ही इन्हें निकालती थी। उन दोनों ने खाना खाया और बर्तन धोने कुएं पर गए। ठगों ने बुढ़िया की नज़र बचाकर चुपचाप बर्तन अपने कपड़ों में छिपा लिए। एक चिल्लाने लगा, “अरे अरे क्या करता है, बर्तन कहां लिए जा रहा है?” आवाज़ सुनकर बुढ़िया आई तो दोनों बोले, “बुआ बर्तन तो कुएं में गिर गए।” बर्तन खोने से बुढ़िया दुखी हो गई और उसने कहा, “बेटा मैं तो तुम्हारे साथ नहीं चल सकती। मेरा बेटा तुम्हारे साथ शादी में जाएगा।” बेटे ने उन दोनों को बर्तन छुपाते देख लिया था। उसने मां के सामने कुछ नहीं कहा और अपने घोड़े पर बैठ इन दोनों के साथ चल दिया।
चलते-चलते रास्ते में दोनों ठग बोले, “ए भाई घोड़ा रोको तो, बड़ी भूख लगी है। हमारे पास तो पैसे नहीं हैं, तुम अमीर आदमी हो, ज़रा अच्छा खाना खिलवाओ।”
“क्यों नहीं! इस जगह मेरा लेन-देन चलता है। हमें कुछ भी ख़र्च नहीं करना पड़ेगा।” युवक ने कहा। वह इन दोनों को सबक़ सिखाना चाहता था।
“ठीक है, ये तो बड़ी अच्छी बात है।” दोनों ठग बोले।
“तुम लोग यहीं रुको, मैं इंतजाम करके आता हूं,” ऐसा कहकर वह युवक वहां एक व्यापारी के पास गया। गुपचुप बात की। फिर वापस आया और दोनों ठगों को व्यापारी के पास ले गया। व्यापारी ने युवक को धन दिया। वह धन लेकर जाने लगा तो दोनों ठग बोले, “अरे भई अकेले कहां जाते हो, हम भी चलते हैं।”
“नहीं मुझे काम है, थोड़ी देर में आता हूं। तब तक तुम्हारे स्वागत और खान-पान का ध्यान ये श्रीमान रखेंगे।” युवक ने व्यापारी की ओर इशारा किया।
व्यापारी ने उन दोनों को डपटकर कहा, “जाओ पीछे खेतों में मज़दूरों के साथ काम पर लगो।” उन दोनों ने व्यापारी को समझाने की बहुत कोशिश की कि वे मज़दूर नहीं हैं, पर व्यापारी ने कहा, “मैंने तुम दोनों को पैसे देकर ख़रीदा है, काम तो लूंगा ही।”
“नहीं-नहीं, हम लोग अच्छे घर-परिवार के हैं। उस युवक ने हमारे साथ धोखा किया है। आपको भी धोखा दिया है। हम उसे खोज लाएंगे, आप एक बार हमें जाने दो।” दोनों ने बहुत विनती की। व्यापारी को दया आ गई। उसने अपना एक नौकर उन दोनों के साथ युवक को खोजने के लिए भेज दिया।

इस बीच वह युवक दूसरे गांव पहुंच गया। वहां एक हलवाई की दुकान पर जाकर गपागप मिठाई खाने लगा। दुकान पर एक छोटा लड़का बैठा था। उसने कहा, “मिठाई खानी है तो दाम निकालो।”
“देखो बच्चे मैं तुम्हारे पिताजी का दोस्त हूं। उनसे जाकर कहो मक्खी मिठाई खा रही है, कुछ नहीं कहेंगे।” युवक ने प्यार से बच्चे को समझाया।
जब उस बच्चे ने जाकर पिता को बताया तो वे नाराजगी से बोले, “जाओ-जाओ, मक्खी तो मिठाई खाती ही है। चिंता मत करो, एक मक्खी कितनी मिठाई खा लेगी।”
बच्चा लौटा। इस बीच में युवक ने ख़ूब छककर मिठाई खाई। थैलों में भी भरी और घोड़े पर सवार होकर चल दिया। “रुको-रुको,” बच्चा चिल्लाता रहा।
आगे रास्ते में उसने एक बूढ़ी औरत को देखा। उसके साथ उसकी सुंदर बेटी भी थी। युवक उस पर मोहित हो गया। उसने झपटकर युवती को घोड़े पर बैठाया और तेज़ी से आगे बढ़ गया। बुढ़िया रोती-चिल्लाती उसके पीछे भाग रही थी। “अम्मा, तेरी बेटी को बहुत प्यार से रखूंगा। हां, मेरा नाम याद रखना-जंवाई राजा।”
बुढ़िया रोने, चिल्लाने लगी, “हाय मेरी बेटी, मेरी बेटी।” लोग जमा हो गए। “क्या हुआ? क्या हुआ?” पूछने लगे।
“वो मेरी बेटी को उठाकर ले गया, हाय! मैं क्या करूं?”
“कौन ले गया तेरी बेटी को अम्मा?” लोगों ने पूछा।
“जंवाई राजा,” बुढ़िया ने बताया।
यह बात सुनकर लोग हंसने लगे और बोले, “अरे, यह तो ख़ुशी की बात है। बेटी को तो एक दिन जंवाई राजा के साथ जाना ही था, रोती क्योंा है?”
इस तरह रास्ते में सबको चकमा देता युवक सुंदर युवती को साथ लिए घर की तरफ़ लौट रहा था। एक जगह पेड़ के नीचे उसने घोड़ा रोका और वे दोनों थैले में से मिठाई निकालकर खाने लगे। पास ही राजघराने का धोबी कपड़े सुखा रहा था। उसने कुछ मिठाई उसे भी दी और बताया, “ये मामूली नहीं, दिव्य मिठाइयां हैं। वहां झील के उस पार पेड़ पर उगती हैं। जितनी चाहे तोड़ लो। ख़ुद भी खाओ और बेचकर पैसे भी कमाओ।” धोबी उसकी बातों में आ गया और विनती की, “कुछ देर आप मेरे कपड़ों का ध्यान रखना, मैं मिठाई लेकर जल्द ही लौट आऊंगा।”
“जाओ, पर शीघ्र लौटना। हम अधिक देर नहीं रुक सकते हैं।” युवक ने कहा। जब धोबी चला गया तो युवक ने राजघराने के क़ीमती वस्त्रों की गठरी बांधी, घोड़े पर लादी और युवती को बैठाकर चल दिया।
व्यापारी का नौकर और दोनों ठग उसे ढूँढ़ते हुए हलवाई की दुकान पर पहुंचे। उसकी बातें सुनीं और अपने साथ मिला लिया। आगे बुढ़िया मिली, वो अभी तक अपनी बेटी के लिए रो रही थी। अब इन पांचों की टोली युवक की तलाश में आगे बढ़ी, तो देखा धोबी लुट जाने पर अपना सिर पीट रहा था। उसे भी साथ लिया। वे सब रास्ते में अपनी-अपनी कहानी सुनाने लगे। सब क्रोध में थे और युवक को पकड़ना चाहते थे।
अंततः एक गांव के बाहर इन लोगों ने उस युवक को पकड़ ही लिया। सबने उसका घेराव किया और धमकाने लगे। बचने का कोई उपाय न देख वह बोला, “देखो भाई, आप सब मेरी बात सुनो, मैं कोई चोर- उचक्का नहीं हूँ। मैं आप सबका सामान लौटा दूंगा। जो मिठाई मैंने खाई थी, उसके पैसे दे दूंगा। मैं तो परख रहा था कि कैसे लोग आसानी से बेवकूफ़ बन जाते हैं। आप सब छोटे-मोटे फ़ायदे के लिए मेरी बातों में आ गए। आज आप सब मेरे मेहमान हैं। मैं आप सबके रहने-खाने का इंतज़ाम अपने एक मित्र के घर में कर देता हूं। रात्रि में आराम कीजिए। सवेरे मैं सबका सामान लौटा दूंगा, फिर आप लोग अपने-अपने घर चले जाना।”
वे सब लोग खा-पीकर सो गए। युवक ने मोहल्ले के चौकीदार को घूस दी और डोंडी पिटवा दी, “गांव में कुछ नए लोगों को देखा गया है। लगता है पड़ोस के जासूस हैं। जो कोई इनको पकड़ने में सहायता करेगा उसे इनाम मिलेगा।”
पकड़े जाने की घोषणा सुनकर दोनों ठग, व्यापारी का नौकर, हलवाई, बुढ़िया, धोबी सभी घबरा गए और वहां से जान बचाकर भागे। जाते-जाते अपने पास का सामान भी वहीं छोड़ गए। बहुत दूर निकल जाने पर जब लगा कि कोई उनके पीछे नहीं आ रहा था तो दोनों ठग एक जगह बैठ गए। एक ठग दूसरे से बोला, “भाई आज तो जान बची। तुम शहर के नामी ठग हो और मैं गांव का। पर हम तो छोटी-मोटी हेरा-फेरी करते हैं। मामूली ठग हैं। असली ठग तो वह युवक है, ठगों का राजा ‘ठगराज’। सबको ख़ूब चकमा दिया।”
उधर उस युवक ने सबके भागने का तमाशा देखा। हंसते-हंसते अपनी मां के चांदी के बर्तन लिए और युवती के साथ घोड़े पर सवार अपने घर पहुंचा। घर पर मां के आशीर्वाद से युवती से शादी की और सुखपूर्वक रहने लगा। एक दिन पत्नी ने पूछा कि उसने उन सब लोगों को क्यों सताया? इस पर युवक बोला, “ख़ाली हेरा-फेरी में क्या है! मज़ा तो चतुराई से चकमा देने में है।”

लोक कथा -अकनंदुन (Folk Tale – Aknandun )

प्राचीन काल में कश्मीर के एक भाग पर जिसका नाम नाम संघिपत नगर था एक राजा राज करता था। यह जगह अब जलमग्न हो गई है और उसकी जगह अब झील वुलर है। राजा के कोई पुत्र न था। अत: राजा और उसकी रानी, जिसका नाम रत्नमाला था, पुत्र पाने की इच्छा से, साधु संतों की बड़ी सेवा किया करते। एक दिन उनके महल में एक जोगी आया। उन्होंने इस जोगी की बड़ी आव-भगत की और अपनी मनोकामना उसके सामने प्रकट की।
जोगी ने उत्तर दिया-राजन् आपको पुत्र प्राप्त होगा, मगर एक शर्त पर।
राजा-रानी एक साथ बोले-कहिए वह कौन सी शर्त है, हम भी तो सुनें?
यह उत्तर पाकर जोगी बोला-शर्त कठिन है। संभवत: आप स्वीकार न करें। वह यह है कि यदि मेरी कोशिश से आपके पुत्र जन्मेगा तो वह केवल ग्यारह वर्ष तक आपका होगा, और उसके बाद आपको उसे मुझे सौंपना होगा। कहिए, क्या आपको यह शर्त स्वीकार है?
राजा और रानी कुछ समय तक एक-दूसरे का मुंह ताकते रहे और फिर बाद में बोले-जोगी महाराज! हमें पुत्र चाहिए, चाहे वह ग्यारह वर्षों तक ही हमारे पास रहे। हमें आपकी शर्त मंजूर है।
सुन कर जोगी ने उत्तर दिया-अच्छा, तो आज से नौ मास के बाद आपके यहां पुत्र होगा। कह कर वह उन्हें आशीर्वाद देकर चला गया।
रानी ने सचमुच ही यथा समय एक सुन्दर बालक को जन्म दिया। उसका नाम अकनंदुन रखा गया। अकनंदुन बड़ा होकर पाठशाला में पढ़ने लगा तो वहां वह अपनी कक्षा के छात्रों में सबसे बुद्धिमान गिना जाने लगा। दिन बीतते गए और उसका ग्यारहवां जन्म दिन आया। उस दिन वही जोगी न मालूम कहां से फिर आ पहुंचा और राजा-रानी से बोला-अब आप अपनी शर्त पूरी कीजिए और अकनंदुन को मेरे हवाले कीजिए।
भारी मन से राजा-रानी ने अकनंदुन को पाठशाला से बुलवाया और जोगी से कहा-जोगी महाराज, यह है आपकी अमानत।
उसे देखते ही जोगी गंभीर होकर बोला- तो फिर देर क्या है? मैं भूखा हूं, इसका वध करके, इसके मांस को पकाइए और मुझे खिलाइए। जल्दी कीजिए मुझे भूख सता रही है।
राजा-रानी ने रो-रो कर जोगी को इस घृणित और क्रूर कार्य से रोकने का प्रयत्न किया, पर वह एक न माना और क्रोधित होकर बोला-इसके सिवा मुझे और कुछ स्वीकार नहीं। हां एक और बात, इसका वध तुम दोनों के हाथों ही होना भी जरूरी है।
खैर रोते-धोते और मन में इस दुष्ट जोगी को बुरा-भला कहते हुए उन्होंने अकनंदुन को मार डाला। उसका मांस रसोईघर में जब पक कर तैयार हुआ तो जोगी बोला-अब देर क्या है? इसे चार थालियों में परोसो। एक मेरे लिए, दो तुम दोनों के लिए और चौथी स्वयं अकनंदुन के लिए।
अकनंदुन की थाली का नाम सुनकर वहां उपस्थित लोग क्रोध से लाल-पीले और हैरान हो उठे। पर जोगी की आज्ञा का पालन करके चार थाल परोसे गए। सभी अपने-अपने आसन पर बैठे। राजा-रानी के नेत्रों से निरंतर अश्रुधारा बह रही थी। इतने में ही जोगी बोला-रानी रत्ना! उठो और खिड़की में से वैसे ही अपने पुत्र को बुलाओ जैसे रोज बुलाती हो। जल्दी करो खाना ठण्डा हो रहा है।
रानी रत्नमाला भारी हृदय से उठकर खिड़की की ओर गई और रोते-विलाप करते हुए उसने अकनंदुन का नाम पुकारा। उसके पुकारने की देर थी कि सीढ़ियों पर से दिन प्रतिदिन की तरह ‘आया माताजी’ कहता हुआ अकनंदुन वहां पहुंच गया। रत्नमासला और राजा से लपक कर गले लगा। पर यह क्या? जब उन्होंने थालियों और जोगी की ओर देखा तो वहां न तो जोगी ही था और न वे परोसे गए थाल ही। जोगी की हर जगह तलाश की गई पर वह कहीं न मिला। वह कहां से आया था और कहां गया, इसका भी किसी को पता न चला। राजा-रानी अकनंदुन को पुन: पाकर अत्यंत हर्षित हुए।

लोक-कथा -अजगर (Folk Tale – Ajgar)

बहुत समय पहले एक राजा की दो रानियाँ थीं। बड़ी रानी शोभा बहुत अच्छे स्वभाव की दयावान स्त्री थी। छोटी रानी रूपा बड़ी कठोर और दुष्ट थी। बड़ी रानी शोभा के एक पुत्री थी, नाम था देवी। रानी रूपा के भी एक बेटी थी, नाम था तारा।
रानी रूपा बड़ी चालाक और महत्वाकाँक्षी स्त्री थी। वह चाहती थी कि राज्य की सत्ता उसके हाथ में रहे। राजा भी उससे दबा हुआ था। रानी रूपा बड़ी रानी और उसकी बेटी से नफरत करती थी। एक दिन उस ने राजा से कह दिया कि रानी शोभा और देवी को राजमहल से बाहर निकाल दिया जाये। राजा रानी रूपा की नाराजी से डरता था। उसे लगा कि उसे वही करना पड़ेगा जो रूपा चाहती है। उस ने बड़ी रानी और उस की बेटी को राजमहल के बाहर एक छोटे से घर में रहने के लिए भेज दिया। लेकिन रानी रूपा की घृणा इससे भी नहीं हटी।
उस ने देवी को आज्ञा दी कि वह प्रतिदिन राजा की गायों को जंगल में चराने के लिए ले जाया करे। रानी शोभा यह अच्छी तरह जानती थी कि यदि देवी गायों को चराने के लिए गई तो रानी रूपा उन्हें किसी और परेशानी में डाल देगी। इसलिए उसने अपनी लड़की से कहा कि वह रोज सुबह गायों को जंगल में चरने के लिए ले जाया करे और शाम के समय उन्हें वापिस ले आया करे।
देवी को अपनी माँ का कहना तो मानना ही था, इस लिए वह रोज़ सुबह गायों को जंगल में ले जाती। एक शाम जब वह जंगल से घर लौट रही थी तो उसे अपने पीछे एक धीमी सी आवाज़ सुनाई दी-
‘‘देवी, देवी, क्या तुम मुझसे विवाह करोगी ?’’
देवी डर गई। जितनी जल्दी हो सका उसने गायों को घर की ओर हाँका। दूसरे दिन भी जब वह घर लौट रही थी तो उस ने वही आवाज़ पुन: सुनी। वही प्रश्न उससे फिर पूछा गया।
रात को देवी ने अपनी माँ को उस आवाज़ के बारे में कहा। माँ सारी रात इस बात पर विचार करती रही। सुबह तक उस ने निश्चय कर लिया कि क्या किया जाना चाहिए।
‘‘सुनो बेटी,’’ वह अपनी लड़की से बोली- ‘‘मैं बता रही हूँ कि यदि आज शाम के समय भी तुम्हें वही आवाज़ सुनाई दे तो तुम्हें क्या करना होगा।’’
‘‘बताइये माँ,’’ देवी ने उत्तर दिया।
‘‘तुम उस आवाज़ को उत्तर देना,’’ रानी शोभा ने कहा, ‘‘कल सुबह तुम मेरे घर आ जाओ, फिर मैं तुम से विवाह कर लूँगी।’’
‘‘लेकिन माँ,’’ देवी बोली- ‘‘हम उसे जानते तक नहीं।’’
‘‘मेरी प्यारी देवी,’’ माँ ने दु:खी होकर कहा- ‘‘जिस स्थिति में हम जीवित हैं उस से ज्यादा बुरा और क्या हो सकता है। हमें इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेना चाहिए। ईश्वर हमारी सहायता करेगा।’’
उस संध्या को जब देवी गायों को लेकर लौट रही थी उसे वही आवाज़ फिर सुनाई दी।
आवाज़ कोमल और दु:ख भरी थी।
‘‘देवी, देवी क्या तुम मुझ से विवाह करोगी ? क्या तुम मुझ से विवाह करोगी ?’’ आवाज़ बोली।
देवी रुक गई। उस ने पीछे मुड़कर देखा लेकिन उसे कोई नहीं दिखाई दिया। वह हिचकिचायी। वह वहाँ से भाग जाना चाहती थी लेकिन फिर उसे माँ के शब्द याद आ गये। वह जल्दी से बोली- ‘‘हाँ, यदि तुम कल सुबह मेरे घर आ जाओ तो मैं तुम से विवाह कर लूँगी।
तब वह बड़ी तेजी से गायों को हाँकती हुई घर चली गई।
अगले दिन सुबह रानी शोभा जरा जल्दी उठ गई। उस ने जाकर बाहर का दरवाजा खोला, देखने के लिए कि कोई प्रतीक्षा तो नहीं कर रहा।
वहाँ कोई भी न था। अचानक उसे एक धक्का सा लगा और वह स्तब्ध रह गई। एक बड़ा अजगर कुण्डली मारे सीढ़ियों पर बैठा था।

रानी शोभा सहायता के लिए चिल्लायी। देवी और नौकर भागे-भागे आये कि क्या बात है।
तभी एक आश्चर्यजनक बात हुई। अजगर बोला :-
‘‘नमस्कार,’’ उसका स्वर बहुत विनम्र था- ‘‘मुझे निमन्त्रित किया गया था इसलिये मैं आया हूँ। आपकी लड़की ने मुझसे वायदा किया था कि यदि मैं सुबह घर आ सकूँ तो वह मुझ से विवाह कर लेगी। मैं इस लिये आया हूँ।
रानी शोभा की समझ में नहीं आ रहा था कि वह करे तो क्या करे | उसे तो यही आशा थी कि किसी दिन कोई सुन्दर नौजवान उसकी लड़की से विवाह करने आयेगा । उसने यह कभी नहीं सोचा था कि वह अजगर होगा !
एक नौकर भाग कर रानी रूपा के पास गया और उसे उसने सारी घटना बतला दी । रानी यह सुन कर प्रसन्न हुई। वह उसी समय अपने नौकरों के साथ रानी शोभा के घर गई ।
“यदि राजकुमारी देवी ने किसी के साथ विवाह का वायदा किया है,” वह बोली— तो उसे अपना वायदा अवश्य निभाना चाहिए । रानी होने के कारण यह देखना मेरा कर्त्तव्य है कि वह अपना वायदा पूरा करें।
उसी दिन विवाह हो गया । रानी शोभा और देवी के लिए यह कोई प्रसन्नता का समय नहीं था लेकिन इतने दुर्भाग्य सहने के बाद वे किसी भी प्रकार की विपत्ति का सामना करने को तैयार थीं ।
विवाह के पश्चात्‌ अजगर अपनी पत्नी के साथ उसके कमरे में गया ।
सारी रात रानी शोभा ने प्रार्थना करते हुए बिताई कि उसकी बच्ची ठीकठाक रहें। दूसरे दिन बड़े सवेरे उसने देवी के कमरे का दरवाज़ा खट- खटाया। एक सुन्दर नवयुवक ने दरवाज़ा खोला । देवी उसके पीछे खड़ी थी।
“मैं आपको कह नहीं सकता कि मेरी जान बचाने के लिए मैं आपका और देवी का कितना आभारी हूँ,” वह नवयुवक बोला— मैं एक शाप के कारण अजगर बन गया था । एक वन-देवता मुझसे क्रुद्ध थे और उन्होंने मुझे अजगर बना दिया । बाद में उन्हें अपनी करनी पर दुख हुआ । तब उन्होंने कहा कि यदि कोई राजकुमारी मुझसे विवाह कर लेगी तो मैं फिर से मनुष्य बन जाऊँगा । और अब देवी ने मुझ से विवाह कर लिया है, मेरा शाप उतर गया है। अब मैं फिर कभी अजगर नहीं बनूंगा ।”
रानी शोभा बहुत प्रसन्न हुई। वह्‌ अपनी लड़की और दामाद को राजा से मिलाने के लिए ले गई। यह बड़ी विचित्र घटना थी। चारों ओर से लोग इस विचित्र नवयुवक को देखने राजमहल में आने लगे । सभी उत्सुक थे–सिवाय रानी रूपा के ।
रानी रूपा बहुत गुस्से में थी | उसने झल्लाते और खीझते हुए अपने आपको कमरे में बन्द कर लिया । देवी का भाग्य उससे देखा नहीं जा रहा था। वह चाहती थी कि उसकी बेटी तारा भी ऐसी भाग्यशाली बने । आखिरकार उसे एक युक्ति सूझी ।
उसने झपनी लड़की को बुलाया ।
“देवी का विवाह तो अब हो गया है,” वह बोली—“ इस लिए गायों को जंगल में चराने के लिए तुम ले जाया करो । ” “नहीं!” तारा चीख कर बोली–“इतने नौकर हैं तो फिर में क्यों गायें चराने जाऊं?”
“यह मेरी आज्ञा है!” रानी क्रुद्ध होकर बोली–“ एक बात और भी सुनो । यदि जंगल में कोई तुमसे विवाह का प्रस्ताव करे तो तत्काल कह देना कि तुम विवाह के लिए राज़ी हो, यदि वह अगले दिन सुबह हमारे घर आ जाये। ”
“तारा माँ की इस योजना से भयभीत हो गई । वह गायों को जंगल में नहीं ले जाना चाहती थी। वह खूब रोई। लेकित रानी फिर भी नहीं पिघली । तारा को उसकी आज्ञा माननी पड़ी ।
तारा रोज़ सुबह गायों को जंगल में चराने के लिए ले जाती और फिर शाम के समय वापिस ले आती ।
लेकिन उसने एक बार भी जंगल में किसी तरह की आवाज़ नहीं सुनी जो यह कह रही हो, “क्या तुम मुझसे विवाह करोगी ?”
फिर भी रानी निराश नहीं हुई । जंगल में कोई अजगर तो था नहीं जो तारा से विवाह का प्रस्ताव करता। इसलिए उसने खुद अजगर ढूंढने का निश्चय किया ।
उसने अपने नौकरों को एक अजगर लाने की आज्ञा दी । बहुत खोज करने पर काफी दिनों पश्चात्‌ उन्हें एक बहुत बड़ा अजगर मिला । उसे पकड़ कर वे राजमहल में ले आये ।
आखिरकार रानी का अभिप्रायः पूरा हो गया और उसने तारा का विवाह इस अजगर से कर दिया। अब रानी को संतोष हुआ ।
विवाह की रात तारा तथा अजगर को एक कमरे में बन्द कर दिया गया।
रानी अधीरता से सुबह की प्रतीक्षा कर रही थी । रानी रूपा ने सवेरे सवेरे ही लड़की के कमरे का दरवाज़ा खटखटाया लेकिन कोई उत्तर न मिला । उसने ज़रा और जोर से दरवाज़ा खटखटाया लेकिन दरवाज़ा तब भी न खुला । रानी से और प्रतीक्षा न की गई और उसने धक्का देकर दरवाज़ा खोल दिया । मोटा अजगर ज़मीन पर पड़ा हुआ था लेकिन तारा का कहीं पता नहीं था।
रानी चीख पड़ी। महल में सभी ने उसका चीखना सुना । राजा और नौकर भागे आये कि क्या बात है। राजकुमारी कहाँ है?” सब चिल्लाये ।
“वह तो अजगर के पेट में होंगी,” रसोइया बोला— देखो वह कितना मोटा हो गया है?” रानी अब बड़ी ज़ोर-जोर से रोने लगी। राजा भी रोने लगा ।
रसोइया अपना सबसे बड़ा चाकू ले आया । वह बोला– यदि वह अब तक जीवित हुई तो मैं राजकुमारी को बचाने की कोशिश करूँगा।
उसने अजगर का पेट चीर डाला । तारा अच्छी भली जीवित थी । रसोइये ने उसे बाहर खींचा । वह चीख मारकर अपनी माँ की तरफ भागी।
अजगर की मृत्यु हो गई और साथ में रानी रूपा की इस इच्छा की भी कि तारा का विवाह देवी की तरह ही किसी योग्य और सम्पन्न नवयुवक से हो ।