Gulgula (गुलगुला) Children Story in Hindi

एक समय की बात है ,एक गाँव में एक बूढ़ा और एक बुढ़िया रहते थे । एक दिन बूढ़े ने बुढ़िया से कहा – “ मेरे लिये एक गुलगुला बना दे ।” तब बुढ़िया ने आटे के कुठार को चाकु से खुरचा , फिर अनाज के कुठार को खुरचा और दो मुट्ठी आटा निकाला, उसमें थोड़ी मलाई मिलायी । आटे को गूँथ कर एक गुलगुला बनाया और उसे घी में तल कर , खिड़की के पास ठंडा होने को रख दिया ।  

कुछ देर तक वह गुलगुला वैसे हीं पड़ा रहा, मगर वह फिर उठा और लुढ़कने लगा ।खिड़की से लुढ़क कर वह मेज पर आया , मेज से लुढ़क कर वह जमीन पर आया । फिर धीरे- धीरे लुढ़कते हुए घर से बाहर सड़क पर निकल गया।

वह बहुत दूर और भी दूर सड़क पर लुढ़कने लगा । रास्ते में उसे एक खरगोश मिला ।

“गुलगुले , ओ गुलगुले , मैं तुझे खा जाऊँगा ” खरगोश ने गुलगुले से कहा ।

“नहीं , नहीं , मुझे न खाओ , खरगोश भाई , मैं तुम्हें एक गाना सुना देता हूँ ।” गुलगुले ने कहा ।

“मैं हूँ गोल गुलगुला

खस्ता और भुरभुरा

आटे के कुठार को

खुरच खुरच खुरच कर

अनाज के कुठार को

को झाड़ कर, बुहार कर

जितना आटा मिल सका

मलाई उसमें डाल कर

गूंध गूंध कर बना

गोल-गोल गुलगुला

घी में सेक-भून कर

खस्ता और भुरभुरा

ठंडा करने की लिये

खिड़की में धरा गया;

मैं नहीं हूँ बेवकूफ

वहाँ से मैं लुढ़क चला ।

बाबा को मैं नहीं मिला ,

दादी को मैं नहीं मिला ।

ओ मिया खरगोश राम

तुम को भी मैं नहीं मिला ।”

और खरगोश पलक भी नहीं मार पाया था कि गुलगुला वहाँ से लुढ़कता हुआ आगे निकल गया ।

वह लुढ़कता गया , लुढ़कता गया । रास्ते में उसे क भेड़िया मिला ।

“गुलगुले , ओ गुलगुले , मैं तुझे खा जाऊँगा ” भेड़िये ने कहा ।

“नहीं , नहीं , भूरे भेड़िये ,मुझे न खाओ , मैं तुम्हें एक गाना सुना देता हूँ ।” गुलगुले ने कहा ।

“मैं हूँ गोल गुलगुला

खस्ता और भुरभुरा

आटे के कुठार को

खुरच खुरच खुरच कर

अनाज के कुठार को

को झाड़ कर, बुहार कर

जितना आटा मिल सका

मलाई उसमें डाल कर

गूंध गूंध कर बना

गोल-गोल गुलगुला

घी में सेक-भून कर

खस्ता और भुरभुरा

ठंडा करने की लिये

खिड़की में धरा गया;

मैं नहीं हूँ बेवकूफ

वहाँ से मैं लुढ़क चला ।

बाबा को मैं नहीं मिला ,

दादी को मैं नहीं मिला ,

न मिला खरगोश को ।

सुनो , सुनो रे भेड़िये !

तुम को भी मैं नहीं मिला !”

और भेड़िया पलक भी नहीं मार पाया कि गुलगुला वहाँ से लुढ़कता हुआ आगे निकल गया ।

वह लुढ़कता गया , लुढ़कता गया । रास्ते में मिला एक रीछ ।

“गुलगुले , ओ गुलगुले , मैं तुझे खा जाऊँगा ” रीछ  ने कहा ।

“अरे , जा रे, टेढ़े-मेढ़े पाँववाले , तू क्या खायेगा मुझे ! 

“मैं हूँ गोल गुलगुला

खस्ता और भुरभुरा

आटे के कुठार को

खुरच खुरच खुरच कर

अनाज के कुठार को

को झाड़ कर, बुहार कर

जितना आटा मिल सका

मलाई उसमें डाल कर

गूंध गूंध कर बना

गोल-गोल गुलगुला

घी में सेक-भून कर

खस्ता और भुरभुरा

ठंडा करने की लिये

खिड़की में धरा गया;

मैं नहीं हूँ बेवकूफ

वहाँ से मैं लुढ़क चला ।

बाबा को मैं नहीं मिला ,

दादी को मैं नहीं मिला ,

न मिला खरगोश को ,

भेड़िये को नहीं मिला मिला।

सुनो रे रीछ राम तुम !

तुम को भी मैं नहीं मिला ।”

और रीछ पलक भी नहीं मार पाया कि गुलगुला वहाँ से लुढ़कता हुआ आगे निकल गया ।

वह लुढ़कता गया , लुढ़कता गया । रास्ते में मिली एक लोमड़ी ।

“गुलगुले , ओ गुलगुले , तुम कहाँ लुढ़कते जा रहे हो ? ”

“देखती नहीं हो, सड़क पर जा रहा हूँ ! ”

“गुलगुले , ओ गुलगुले , मुझे एक गीत सुनाओ सुनाओ ! ”

और गुलगुला गाने लगा लगा:

“मैं हूँ गोल गुलगुला

खस्ता और भुरभुरा

आटे के कुठार को

खुरच खुरच खुरच कर

अनाज के कुठार को

को झाड़ कर, बुहार कर

जितना आटा मिल सका

मलाई उसमें डाल कर

गूंध गूंध कर बना

गोल-गोल गुलगुला

घी में सेक-भून कर

खस्ता और भुरभुरा

ठंडा करने की लिये

खिड़की में धरा गया;

मैं नहीं हूँ बेवकूफ

वहाँ से मैं लुढ़क चला ।

बाबा को मैं नहीं मिला ,

दादी को मैं नहीं मिला ,

न मिला खरगोश को ,

भेड़िये को नहीं मिला ,

रीछ को भी नहीं मिला ,

ओ सुनो तो , वो लोमड़ी !

तुम को भी मैं नहीं मिला ।”

और लोमड़ी बोली – “ वाह ! कितना सुंदर गीत है ! पर क्या करूं , मुझे ठीक तरह सुनाई नहीं देता ।मेरी नाक पर चढ़ जाओ , प्यारे गुलगुले, और जरा जोर से गाओ ; तब शायद मैं सुन पाऊँ ! ”

सो गुलगुला उछल कर लोमड़ी के नाक पर जा बैठा और वही गीत जरा जोर से गाने लगा । लेकिन लोमड़ी बोली :

“ गुलगुले प्यारे , जरा मेरी जबान पर बैठ कर , अपना गीत आखरी बार गाओ ।”

गुलगुला फुदक कर लोमड़ी की जबान पर जा बैठा और ….

खट से लोमड़ी का मुँह बंद हो गया और वह गुलगुले को खा गयी ।

॥ समाप्त ॥