माधव और केकड़ा मित्र

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बहुत पुरानी बात है । हवेलीपुर गाँव में एक किसान अपनी पत्नी और बेटे माधव के साथ रहता था । उनके पास थोड़ी जमीन थी । उसी जमीन में वे फसल उगा कर अपना जीवन यापन करते थे । माधव को पशु –पक्षियों , जीव –जंतुओं से बहुत स्नेह था । वह भूल कर भी किसी को कष्ट नहीं पहुँचाता था । एक दिन माधव नदी पर स्नान करने गया तभी उसकी नजर एक घायल केकड़े पर पड़ी । वह उस केकड़ी को अपने साथ उठा कर अपने घर ले आया और उसकी मरहम पट्टी की , थोड़े हीं दिनों मे वह केकड़ा ठीक हो गया । अब तो माधव हर जगह उस केकड़े को अपने साथ ले जाता । उसने उस केकड़े के लिये अपने पिता से कहकर एक डिब्बी मँगवाई ।

माधव उस केकड़े को उसी डिब्बे में बंद कर हमेशा अपने साथ रखता । एक बार उसके पिता बीज लाने के लिये शहर जा रहे थे , तब उसने भी अपने पिता के साथ चलने के लिये कहा ; क्युँकि उसने शहर कभी नहीं देखा था । अत: वह अपने पिता के साथ शहर के लिये चल पड़ा । रास्ते के लिये उसकी माँ ने थोड़े लड्डु बना कर एक थैले में दिया । अब दोनों पिता और पुत्र शहर के लिये चल पड़े । माधव ने माँ से कहकर अपने केकड़े मित्र को भी थैली में रख लिया।

चलते – चलते एक पेड़ की घनी छाँव देखकर माधव के पिता ने वहीं थोड़ी देर विश्राम करने की सोची और अपना थैला रखकर दोनों पिता – पुत्र लेट गये । थोड़ी हीं देर में उन्हें गहरी नींद आ गई । उस पेड़ की कोटर में एक बहुत हीं विषैला साँप रहता था । उस सर्प को जैसे हीं मनुष्य की गंध लगी , वह साँप उन दोनों को डसने के लिये अपनी बिल से निकला । धीरे – धीरे वह उन दोनों की ओर बढ़ हीं रहा था कि उसे केकड़े की सुगंध मिली ।

अब तो वह साँप केकड़े को खाने के लिये थैले की ओर लपका और जैसे हीं उसने अपने दाँत उस डिब्बे पर लगाया , साँप के दाँत टूट गये और डब्बा भी टूट गया । जैसे हीं डब्बे से केकड़ा बाहर निकला मौका पाते हीं उसने साँप के गले में अपना नुकीला पंजा गड़ा दिया । अचनक के हमले से और दाँत के टूट जाने के कारण साँप वहीं मर गया । इतने में किसान और उसके बेटे माधव की आँख खुली तो उन्होंने साँप को मरा हुआ पाया । वहीं पर वह केकड़ा भी बैठा था । सारी बात समझ कर माधव ने अपने केकड़े मित्र को हाथ पर उठा लिया तथा अपने पिता से उस केकड़े के लिये नई और मजबूत डीब्बी बनाने को कहा ।

इसी से कहते हैं बच्चों आवश्यकता पड़ने पर छोटी वस्तु भी काम में आती है ।