रोहिणी व्रत Rohini Vrat 2021

प्रत्येक मास में जिस दिन रोहिणी नक्षत्र हो, उस दिन रोहिणी व्रत करना चाहिये। मृगसिरा नक्षत्र में इस व्रत का पारणा करना चाहिये। रोहिणी व्रत करने से शोक, दारिद्रय आदि नष्ट हो जाते हैं। इस व्रत के प्रभाव से ऐश्वर्य, सुख आदि की वृद्धि होती है।इस व्रत के करने से स्त्रियों को सौभाग्य,संतान,ऐश्वर्य,स्वास्थ्य आदि अनेक फलों की प्राप्ति होती हैं।

Rohini Vrat vidhi and katha

पूजा विधि एवं महात्म्य:-

प्रति मास में रोहिणी नामक नक्षत्र जिस दिन होवे उस दिन चारो प्रकार के आहार का त्याग करें और श्री जिन चैत्यालय में जाकर धर्मध्यान सहित सोलह प्रहर व्यतीत करे अर्थात सामयिक, स्वाध्याय,धर्मचर्चा, पूजा, अभिषेकादि में काल बिताये और स्वशक्ति अनुसार दान करे। इस व्रत के दिन भगवान वासुपूज्य की पूजा की जाती है।

इस व्रत के उपवास के दिन ‘ऊँ ह्रीं श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्राय नम:’ मंत्र का जाप करना चाहिये।
जिनको उपवास करने की शक्ति न हो वे संयम ग्रहण कर अल्पभोजन करें, या काँजी अथवा मांड-भात ले। व्रत के दिन पञ्चाणुव्रतों का पालन करना, कपाय और विकथाओं को छोड़ना आवश्यक है।मृगशिर नक्षत्र में पारण एवं कृतिका नक्षत्र में व्रत की धारणा करने से व्रत विधि पूर्णमानी जाती है।

पितृभ्रातृपतिश्वश्रुश्वशुराणां तथैव च।
रोहिणी शोकशमनो भव सर्वत्र न: कुले॥

अर्थ: रोहिणी-वृक्ष! आप मेरे कुल में पिता, भाई, पति, सास तथा ससुर आदि सभी का शोक शमन (नष्ट) करें।
प्रार्थना के बाद रोहिणी-वृक्ष की प्रदक्षिणा (परिक्रमा) करें। ब्राह्मण को दान दें। अगले दिन प्रात:काल पूजा करके भोजन करें।
इस व्रत को यदि स्त्री भक्तिपूर्वक करे तो वह दमयंती, स्वाहा, वेदवती और सती की भाँति अपने पति की अति प्रिय हो जाती है। वनगमन के समय सीताजी ने भी मार्ग में रोहिणी-वृक्ष का भक्तिपूर्वक गंध,पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, तिल, अक्षत आदि से पूजन कर प्रदक्षिणा किया था; उसके बाद वन को गयीं। जो स्त्री तिल, अक्षत, गेहूँ, सप्तधान्य आदि से रोहिणी-वृक्ष का पूजन कर, मंत्र से वंदना और प्रदक्षिणा कर ब्राह्मण को दक्षिणा देती है, वह शोकमुक्त होकर चिरकालतक अपने पतिसहित संसार के सुखों का उपभोग कर अंत में गौरी-लोक में निवास करता है।यह रोहिणी व्रत सब प्रकार के शोक और रोग को हरनेवाला है।

इस प्रकार यह व्रत ५ वर्ष और ५ मास तक करे। पश्चात उद्यापन करे।अर्थात् छत्र,चवर, ध्वजा, पाटला आदि उपकरण मंदिर में चढ़ाये, साधुओं व सधर्मी तथा विद्यार्थियों को शास्त्र देवे, वेष्टन देवे, चारों प्रकार के दान देवे और जो द्रव्य खर्च करने की शक्ति न हो तो दूना व्रत करे।

रोहिणी व्रत कथा Rohini Vrat Katha

वन्दूं श्री अर्हन्त पद, मन वच शीश नमाय।
कहूँ रोहिणी व्रत कथा, दु:ख दारिद्र नश जाय॥

अंग देश में चम्पापुरी नामक नगरी नगरीका स्वामी माधवा नाम का राजा था। उसकी परम सुन्दरी लक्ष्मीमती नाम की रानी थी। उसके साथ गुणवान पुत्र और एक रोहिणी नाम की कन्या थी।
एक समय राजाने निमितज्ञानी से पूछा कि मेरी पुत्री का वर कौन होगा? तब निमितज्ञानी ने विचार कर कहा कि हस्तिनापुर का राजा वातशोक और उसकी रानी विद्युतश्रवा का पुत्र अशोक तेरी पुत्री से पाणिग्रहण करेगा।

यह सुनकर राजा ने स्वयंवर मण्डप रचाया और सब देशों के राजकुमार को आमंत्रण पत्र भेजे। जब नियत समय पर राजकुमारगण एकत्रित हुए तो राजकुमारी रोहिणी सुंदर पुष्पमाला हाथ में लिये हुई सभा में आई और सब राजकुमारों का परिचय पाने के अनन्तर अंत में राजकुमार अशोक के गले में वरमाला डाल दी। राजकुमार अशोक रोहिणी से पाणिग्रहण कर उसे घर ले आया और बहुत समय तक सुखपूर्वक जीवन व्यतीत किया।

एक समय हस्तिनापुर के वन में श्री चारण मुनिराज आये।यह समाचार सुनकर राजा निज प्रिया सहित श्रीगुरु की वंदना को गयागया, तीन प्रदक्षिणा दे दण्डवत करके बैठ गया। पश्चात श्रीगुरु के मुख से तत्त्वोपदेश सुनकर राजा हर्षित मन हो पूछने लगा- स्वामी! मेरी रानी इतनी शांतचित्त क्यों है?
तब श्रीगुरु ने कहा- सुनो, इसी नगर में वास्तुपाल नामक राजा था और उसका धनमित्र नामका मित्र था। उस धनमित्रके दुर्गन्धा कन्या उत्पन्न हुई।
सो उस कन्या को देखकर माता पिता निरंतर चिंतावान रहते थे कि इस कन्या को कौन वरेगा? पश्चात जब वह कन्या सयानी हुई तब धनमित्रने उसका ब्याह धन का लोभ देकर एक श्रीषेण नामके लड़के (जो कि उसके मित्र सुमित्रका पुत्र था) से कर दिया।

यह सुमित्र का पुत्र श्रीषेण अत्यंत व्यसनाक्त था। एक समय वह जुआ में सब धन हार गया, तब चोरी करने को किसी के घर में घुसा। उसे यमदण्ड नामके कोतवाल ने पकड़ लिया और दृढ़ बंधनों में बाँध दिया। इसी कठिन अवसर में धनमित्र ने श्रीषेण से अपनी पुत्री के ब्याह करने का वचन ले लिया था।
इसीलिए श्रीषेण ने उससे ब्याह तो कर लिया, परंतु वह स्वस्त्री के शरीर की अत्यंत दुर्गंध से पीड़ित होकर एक ही मास में उसे परित्याग करके देशांतर को चला गया। वह दुर्गन्धा अत्यंत व्याकुल हुई और अपने पूर्व पापों का फल भोगने लगी।

इसी समय अमृतसेन नामके मुनिराज इसी नगर के वन में विहार करते हुये आये। यह जानकर सकल नगरलोक वन्दना को गये और धनमित्र भी अपनी दुर्गन्धा कन्या सहित वन्दना को गया। धर्मोपदेश सुनने के अनन्तर उसने अपनी पुत्री के भवांतर पूछे।
तब श्री गुरुजी ने कहा- सोरठ देश में गिरनार पर्वत के निकट एक नगर है। वहाँ भूपाल नामक एक राजा राज्य करता था। उसकी शिन्धुमती नामकी रानी थी। एक समय वसंत ऋतु में राजा रानी सहित वनक्रीड़ा को चला, मार्ग में श्रीमुनिराज को देखकर राजा ने रानी से कहा तुम घर जाकर श्रीगुरु के आहार की विधि लगाओ।

राजाज्ञा से यद्यपि रानी घर तो गई तथापि वनक्रीड़ा समय वियोग जनित संताप से तप्त उस रानीने इस वियोग का सम्पूर्ण अपराध मुनिराज के माथे मढ़ दिया, और जब वे आहार को बस्ती में आये तो पडगाहकर कड़वी तुम्बी का आहार दिया, जिससे मुनिराज के शरीर में अत्यन्त वेदना उत्पन्न हो गई, और उन्होंने तत्पश्चात प्राण त्याग दिये।
नगर के लोग यह वार्ता सुनकर आये, और मुनिराज के मृतक शरीर की अंतिम क्रिया कर रानीकी दुष्कृत्य की निंदा करते हुए निज निज स्थान को चले गये। राजा को भी इस दुष्कृत्यकी खबर लग गई । उन्होंने रानी को तुरंत ही नगर से बाहर निकाल दिया।

इस पाप से रानी के शरीर में उसी जन्म में कोढ़ उत्पन्न हो गया, जिससे शरीर गल गल कर गिरने लगा तथा शीत, उष्ण और भूख, प्यास की वेदना से उसका चित्त विह्वल रहने लगा। इस प्रकार वह रौद्र भावों से भरकर नरक में गई।
वहाँ पर भी मारन, ताड़न, छेदन, भेदन ,शूली रोहणादि घोरान्घोर दु:ख भोगे।वहां से निकल कर गाय के पेट में अवतार लिया और अब यह तेरे घर दुर्गन्धा कन्या हुई।

यह पूर्व वृतान्त सुनकर धनमित्र ने पूछा- हे नाथ! कोई व्रत विधानादि धर्मकार्य बताइये जिससे यह पातक दूर होवे।
तब स्वामी ने कहा- सम्यग्यदर्शन सहित रोहिणीव्रत पालन करो अर्थात् प्रति मास में रोहिणी नामक नक्षत्र जिस दिन होवे उस दिन चारो प्रकार के आहार का त्याग करें और श्री जिन चैत्यालय में जाकर धर्मध्यान सहित सोलह प्रहर व्यतीत करे अर्थात सामयिक, स्वाध्याय,धर्मचर्चा, पूजा, अभिषेकादि में काल बिताये और स्वशक्ति अनुसार दान करे।

इस प्रकार यह व्रत ५ वर्ष और ५ मास तक करे। पश्चात उद्यापन करे।अर्थात् छत्र,चवर, ध्वजा, पाटला आदि उपकरण मंदिर में चढ़ाये, साधुओं व सधर्मी तथा विद्यार्थियों को शास्त्र देवे, वेष्टन देवे, चारों प्रकार के दान देवे और जो द्रव्य खर्च करने की शक्ति न हो तो दूना व्रत करे।
दुर्गन्धा ने मुनिश्री के मुख से व्रत की विधि सुनकर श्रद्धापूर्वक उसे धारण कर पालन किया और आयु के अंत में सन्यास सहित मरण कर प्रथम स्वर्ग में देवी हुई वहाँ से आकर माधवा राजा की पुत्री और तेरी परमप्रिया स्त्री हुई। इस प्रकार रानी के भवांतर सुनकर राजा ने अपने भवांतर पूछे ।

तब स्वामी ने कहा- तू प्रथम भव में भील था। तूने मुनिराज को घोर उपसर्ग किया था।सो तू वहां से मरकर पाप के फल से सातवेंनरक गया।
वहाँ से तैंतीस सागर दु:ख भोगकर निकला।सो अनेक कुयोनियों में भ्रमण करता हुआ तूने एक वणिक के घर जन्म लिया। सो अत्यन्त घृणित शरीर पाया। लोग दुर्गन्ध के मारे तेरे पास न आते थे।
तब तूने मुनिराज के उपदेश से रोहिणीव्रत किया, उसके फल से तू स्वर्ग में देव हुआ। और फिर वहां से चलकर विदेह क्षेत्र में अर्ककीर्ति चक्रवर्ती हुआ वहाँ से दीक्षा ले तप करके देवेन्द्र हुआ। और स्वर्ग से आकर तू अशोक नामक राजा हुआ है।

राजा अशोक यह वृत्तांत सुनकर घर आया और कुछ कालतक सानन्द राज्य भोगा।पश्चात एक दिन वहां वासुपूज्य भगवान का समवशरण आया सुनकर अत्यन्त वैराग्य को प्राप्त हो श्री जिन दीक्षा ली।रोहिणी रानी ने भी दीक्षा ग्रहण की।
सो राजा अशोकने तो उसी भव में शुक्लध्यान से घातिया कर्मों का नाश कर केवल ज्ञान प्राप्त किया और मोक्ष गये;

और रोहिणी आर्या भी समाधिमरण कर स्त्रीलिंग छेद स्वर्ग में देव हुई।अब वह देव वहाँ से चलकर मोक्ष को प्राप्त करेगा।इस प्रकार राजा अशोक और रानी रोहिणी, रोहिणीव्रत के प्रभाव से स्वर्गादि के सुख भोगकर मोक्ष को प्राप्त प्राप्त हुए व होंगे। इसी प्रकार जो अन्य भव्य जीव श्रद्धासहित इस व्रत का पालन करेंगे वे भी उत्तमोत्तम सुख पायेंगे।
व्रतरोहिणी रोहिणी कियो, अरु अशोक भूपाल।
स्वर्ग मोक्ष सम्पत्ति लही, ‘दीप’ नवावत भाल॥