Singhasan Battisi (सिंहासन बत्तीसी )

बहुत पुरानी बात है, उज्जैन नगरी में राजा भोज राज्य करते थे। उनके राज्य में सभी प्रजासुखपूर्वक रहती थी। वहाँ किसी को भी कोई कष्ट नहीं था।उस राज्य में कोई भी प्राणी भूखे पेट नहीं सोता।सभी अपने-अपने काम में लगे रहते थे। राजा भोज की न्याय के चर्चे स्वर्ग में भी होते थे। राजा इंद्र को भी राजा भोज से ईर्ष्या होती थी।

सैर और तमाशे के लिए नगर के किनारे-किनारे क्यारियाँ बनाकर तरह-तरह के फूल लगाये गये थे। उन्हीं क्यारियो के पास एक नगरवासी का छोटा-सा खेत था, उसने अपने खेत में खीरे के बीज बोये। जब खीरे के बेल बड़े हो गये  और उनमें फल लगे, तब उस नगरवासी ने खेत के बीचोंबीच एक-मचान बनाया । जिससे उस मचान पर बैठकर वह अपने खेत की रखवाली कर सके। लेकिन जैसे हीं वह उस मचान पर चढ़ा उसके मुख से यह निकलने लगा- “ कोई है? इसी वक्त राजा भोज को गढ़ से पकड़ लावे और सजा को पहुँचावे ।”

जैसे हीं राजा के नौकरों ने यह सुना उस नगरवासी का टाँग पकड़कर उसे नीचे गिरा दिया ,  उसकी जमकर मरम्मत की और उससे उठक-बैठक करवाय। जब उस नगरवासी के गरुर का नशा उतरा तब उसने राजा के नौकरों सेपूछा-“मैंने ऐसी कौन-सी भूल की है, जो तुम सब ने मेरी धुनाई की ? ”

इधर-उधर के राह-बाट के लोग जो वहाँ इकट्ठे हुये थे कहा- “तूने ऐसी बात राजा के लिये मुँह से निकाली है कि यदि राजा ने सुन लिया तो तुझे तोप से उड़ा देगा।” यह सुनते हीं वह गिड़गिड़ाने लगा , रहे सहे होश-हवास  उड़ने लगे, जान मुँह को आ गया। राजा के नौकरों के पैरों में पड़कर मिन्नतें करने लगा कि उसे माफ कर दें।उसके बाद वह नगरवासी अपने घर को चला गय।

लेकिन जब भी वह नगरवासी उस मचान पर चढ़ता वैसे हीं बकबास करने लगता।एक दिन राजा ने चार हरकारे एक काम को किसी तरफ भेजे थे । वे रात को उधर से फिरते हुए चले आ रहे थे और  वह नगरवासी मचान पर चढ़ा हुआ बक रहा था , कि बुलाओ हमारे दीवान और अहलकारों को कि इस जगह खासे-महल और एक गढ़ बनावें। सब सरजाम  लड़ाई का उसमें जमा करे कि, मैं राजा भोज से लड़ूँ और माड़ूँ , जो मेरे सात पुश्त का राज यह  राजा करता है। यह सुनते हीं उन चारों हरकारों को अचंभा हुआ, और  एक को उनमें से गुस्सा आया। एक ने दूसरे से कहा- “इसे पकड़ हाथ-पैर बाम्ध कर राजा के पास ले चलो । ” दूसरे ने कहा- “वे इसके हक में जो चाहे सो करे। ”

तीसरे ने कहा- “इसने शराब पी है, मतवाला है, सो बकता है ।” चौथे ने कहा- “फिर समझा जायेगा।” 

इसके बाद चारों हरकारे लौट गये अगले दिन चारों हरकारे राजा के दरबार में पहुँचे । राजा को प्रणाम कर , सअबसे पहले काम का ब्यौरा दिया जिसके लिये उन चारों को भेजा गया था।  राजा ने उनसे पूछा कि, हमारे राज्य में सब लोग खुश रहते है ? और अपने घर में रहकर हमारे हक में क्या कहते हैं? तब उन्होंने हर एक का अहवाल कहकर वह राह का किस्सा बयान किया जो सुना था। और कहा कि , अजब असर उस मचान का है कि, जब वह उस मचान पर चढ़कर बैठता है तब एक रउनत उस पर चढ़ जाती है और जब वह वहाँ से नीचे उतरता है तब नशा उतर जाता है। फिर अपनी असली हालत में आता है। तब राजा ने कहा-“तुम मुझे वहाँ ले चलो  और मुझे दिखाओ कि वह जगह  कौन-सी है ? ”  ऐसा कह राजा खुशी-खुशी से उन हरकारों को साथ लेकर उस स्थान पर गया।वहाँ छुपकर चुपके से हरकारों के साथ बैठा रहा। इतने में क्या सुनता है कि वह नगरवासी मचान पर पांव रखते ही खने लगा कि, लोग जल्दी जावें और राजा भोज को गढ़ से पकड़ लावें । उसे जल्दी मार मेरा राज ले लें। इसमें यश और धर्म दोनों उन्हें होंगे। यह सुनते हीं राजा को क्रोध आया और हरकारों को साथ लेकर राजमहल को लौट आया। रात को फिक्र के मारे नींद नहीं आई। जैसे-तैसे रात बिताई। सवेरा होते हीं स्नान करके दरबार में पहुँचा। सभी को रात का किस्सा बताया। पंडितों ,मंत्रियो और दरबारियों ने विचार कर राजा से कहा- “महाराज! हमारे विचार में उस स्थान पर लक्ष्मी का लक्षण नजर आता है। वहाँ पर बहुत दौलत है।”

यह सुनते हीं सेनापति को हुक्म दिया कि लाख बेलदार वहाँ जायें और उस मकान की तमाम जमीन को खोदें । हुक्म सुनते हीं सेनापति लाख बेलदार के साथ उस स्थान पर पहुँच गया। राजा भी अपने रथ पर सवार होकर वहाँ पहुँच गये। जब बेलदारों ने उस स्थान को चारों ओर से  खोदा और वहाँ की मिट्टी हटायी तो एक पाया नजर आया। तब राजा ने हुक्म दिया- “सावधानी से खोदो टूट न जाये।”  जब खोदते-खोदते सिंहासन के चारों पाए नजर आए तब राजाने कहा- “अब इसे बाहर निकालो ।” लाखों मजदूर उस सिंहासन को उठाने में लगे थे लेकिन वह टस-से-मस नहीं हुआ। तब एक पंडित ने कहा-“महाराज! यह सिंहासन देवताओं अथवा दानवों का बनाया हुआ है । यह इस जगह से न हिलेगा और न उठेगा। बलि लेगा । इसको बलि चढ़ाइए। ”  तब वहाँ पर भैसे और बकरेकी बलि दी गई। चारों तरफ जयजयकार होने लगे और बाजे बजने लगे। उसके बाद सिंहासन को उसके  स्थान से आसानी से बाहर निकाल लिया गया। उस सिंहासन को एक साफ-सुथरे स्थान पर रख दिया गया।

जब उस सिंहासन को पूरी तरह से साफ कर दिया गया तब उस सिंहासन की चकाचौंध देखते बनती थी। उस सिंहासन के चारों तरफ आठ-आठ पुतलियां के हाथ-में एक-एक कमल लिये हुई  बनाया गया था। राजा ने मंत्रियों को कहा कि जहाँ-जहाँ पर इस सिंहासन के नक्कासी में से हीरे-जवाहरात निकलगये हैं वहाँ पर नये लगवाकर इसे सही किया जाये। जाये। सिंहासन के जीर्णोद्धार में पूरे पाँच महीने लग गये । तब पंडितों ने ग्रह-नक्षत्र गणना करके कार्तिक महीने में एक शुभ दिन निकाला जिस दिन महाराज उस सिंहासन पर बैठे। बैठे। निश्चित तिथि को सभी को आमंत्रित किया गया। नगरवासियों में धन बँटवाये गये। महाराज तैयार होकर सभा में पहुँचे और पंडितों के मंत्रोच्चारण के साथ उस सिंहासन पर बैठने को अपने दायें पैर को बढाया हीं था कि उस सिंहासन की सभी बत्तीस- की-बत्तीस पुतलियां खिलखिलाकर हँसने लगी। उस सभा में उपस्थित सभी व्यक्तियों का मुँह आश्चर्य से खुला-का-खुला रह गया। राजा ने भी घबराकर अपना पैर पीछे कर लिया और उन पुतलियों से बोला- “तुमने क्या देखा? और क्यों हँसी? ये सब बातें मुझे बताओ । क्या मैं बली राजा का बेटा यशस्वी नहीं ? या क्षत्रियों में कायर हूँ ? या नामर्द हूँ ? या बेरहम हूँ ? या और राजा मेरे हुक्म में नहीं ? या मैं पंडित नहीं ? या मेरे यहाँ पद्मिनी नारी नहीं? या मैं राजनीति नहीं जानता ? या मैं किसी की मजलिस में नीचे होकर बैठा ? फिर किस बात में मैं नालायक हूँ ? मेरेदिल में शक पड़ा है सो मुझको बताओ । ”

यह बातें राजा से सुनकर उनमें से रत्नमंजरी नामक पहली पुतली बोली:-

पहली पुतली रत्नमंजरी

पहली पुतली बोली:- हे राजा! दिल लगाकर मेरी बात सुनो और यह किस्सा मैं तुमसे बयान करती हूं । तुम गुणग्राहक और कदरदान हो। जो तुमने बातें कहीं सो सब दुरुस्त है । तुम्हारे तेज के आग की ज्वाला सुर्य से भी अधिक है पर इतना गर्व मत करो। पुरानी कथा सुनो इस संसार का अंत नहीं। भगवान ने इस संसार में किस्म-किस्म और रंग-रंग के जवाहर पैदा किये हैं , क्दम-कदम पर दौलत का अम्बार है और एक-एक कोस पर आबे हयातका चश्मा है, पर तुम इसे नहीं जान पाये। तुम जैसे इस दुनिया में करोड़ों पड़े हैं और यह सिंहासन जिस राजा का है उसके यहाँ तुम्हारे जैसे एक-एक नौकर था। यह सुनकर राजाभोज क्रोधित हो गये और कहने लगे‌ – “इस सिंहासन को मैं अभी तोड़ डालता हूँ। ” इतने में पुरोहित वररुचि ने कहा- “राजन! यह न्याय के विपरित है। इसलिए पुतली की बात ध्यान से सुनो। उसके बाद जो कुछ करना हो वह किजिये। ” राजा भोज ने कहा- “इसके आगे बताओ ” तब पुतली रत्नमंजरी बोली – “मै क्या कहूँ ? राजा! जब इतना हीं सुनकर तुम जलकर खाक हो गये, तब आगे स्नकर और भी शर्मिंदा होगे। इसलिए कहने से भला है ना कहा जाये। हम तो उसी रोज मर चुकी थीं और सिंहासन फूट चुका था जिस रोज से राजा विक्रमादित्य से बिछुड़ी । अब हमें क्या डर है।”  इतनेमें राजा का दीवान पुतली से कहने लगा-“तुम अपने राजा का बखान किसलिये  नहीं करती? गुस्सा छोड़ दे और बता। क्या भेद छिपा रखा है? ” तब पुतली बोली –“शकबंधी नामक बड़ा बलवान राजा अंबावती में राज करता था। वह देवताओं को पूजनेवाला और सभी को दान देनेवाला था। आगे की कथा मैं तेरे वास्ते कहती हूँ । राजा ध्यान से सुनो- ”

उसी नगर में श्यामस्वयंवर नाम का राजा था। वह ब्राह्मण जात का था पर बड़ा राजा था। वह गंधर्वसेन के नाम से जाना जाता था।  उसके चार वर्ण की चार रानियां थीं- ब्राह्मणी, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र । उसमें ब्राह्मणी बड़ी नाजुक और अच्छी सूरत की थी। उस ब्राह्मणी के एक बेटा हुआ , वह बड़ा पंडित हुआ। उसका नाम ब्राह्मणजीत रखा गया। ब्राह्मणजीत के जैसा कोई पंडित इस दुनिया में नहीं हुआ। उसे हर तरह की विद्या आती थी। वह मौत के बारे में भी बता देता था।

उस राजा के क्षत्रिय-रानी  से तीन बेटे हुये। एक का नाम शंख, दूसरे का नाम विक्रम और तीसरे का नाम भर्तहरि था। इन तीनों ने क्षत्रिय धर्म अपनाया। तीनों एक-से-एक बलवान। पूरे जग में उन्हें कल्पवृक्ष कहा जाता था। वैश्य रानी से राजा के एक पुत्र हुआ जिसका नाम चंद्र रखा गया।वह बड़ा रहमदिल और सुखी था। शूद्र रानी से जो पुत्र हुआ , उसका नाम धन्वंतरि रखा गया। वह बहुत बड़ा वैद्य बना। इस प्रकार से राजा के छह बेटे हुये। सभी एक-से-बढ़कर एक ।ब्राह्मणी का बेटा राजा की दीवानी करता था। लेकिन झगड़े की वजह से वह अपने राज्य को छोड़कर  धारापुर में चला गया।

वहाँ सब तुम्हारे बुजुर्ग थे। धारापुर के राजा तुम्हारे पिताजी थे । बहुत तरकीब लगाकर ब्राह्मणी के बेटे ने तुम्हारे पिताको मार डाला और उस राज्य को हथिया कर उज्जैन नगरी में आया और मर गया। उसके  बाद क्षत्रिय  रानी का बड़ा बेटा शंख उज्जैन नगरी का राजा बना। एक दिन पंडितों ने आकर राजाशंख से कहा कि शास्त्रों के अनुसार तुम्हारा दुश्मन दुनिया में पैदा हुआ है। यह सुनकर राजा शंख को आश्चर्य हुआ। ब्राह्मण कहने लगे कि  एक और बात है जो हम अपने मुँख से नहीं कह सकते। तब राजा शंख ने कहा- “जैसे यह बात बताई, उसी प्रकार से वह बात भी बताओ।” तब पंडितोंने कहा- “राजा शंख को मारकर , विक्रम यह राज करेगा। ” यह सुनकर राजा शंख हँसा और बोला- “ये पंडित बावले हो गये हैं। हैं।इन्हें कुछ ज्ञान नहीं है। इसलिये ऐसी बात कह रहे हैं ।” राजा चुप रहा। पंडित भी शर्मिंदा हुए कि हमारे शास्त्रों को राजा ने झूठा बताया।

कुछ समय पश्चात पंडितों ने फिर गणना की और  एक पंडित ने कहा-“ मेरे विचार से विक्रम कहीं नजदीक आन पहुँचा है। ” दूसरे ने कहा- “यहाँ के किसी जंगल में है । ” और एक उनमें से कहने लगा, उस जंगल में एक तालाब भी है , वहीं अखाड़ा करके रह रहा है। तब उनमें से एक ब्राह्मण जंगल की ओर चला। वहाँ जाकर देखता है कि एक तालाब के पास ,मिट्टी का महादेव बनाकर , राजा विक्रम तपस्या कर रहा है। यह देखकर वह ब्राह्मण उल्टा लौट आया और सभी पंडितों को साथ लेकर राजा शंख के सभा में पहुँचा और कहने लगा- “राजा ! तूने हमारे शास्त्र को झूठा कहा और हमारी हँसी उड़ाई। लेकिन हमने अपनी आँखों से देखा है कि फलाने जंगल में राजा विक्रम आ पहुँचा है। ” राजा शंख उस समय चुप रहा।

अगली सुबह राजा उठा ,अपने मंत्रियों और साथियों सहित पंडितों के बताये हुये जंगल में पहुँचा और छिपकर राजा विक्रमादित्य को देखने लगा। राजा ने देखा कि विक्रमादित्य उठा और तालाब में स्नान कर महादेवकी पूजा की ।जब विक्रमादित्य पूजा कर जा चुका।  तब उस राजा शंख निकलकर उसी जगह पर पहुँचा और महादेव की पिण्डी को दूषित कर दिया ।यह देखकर राजा के साथ आये हुये लोग कहनेलगे कि इस राजा की मति मारी गई है जो इसने ऐसा किया है। उन लोगों ने राजा कओ समझाया परंतु राजा ने कहा जो लिखा होगा वही होगा। उसके बाद राजा शंख ने राजा विक्रमादित्य को मारने की योजना बनाई। राजा शंख ने तांत्रिकों की मदद से सात लकीरें बनवाइ और उस पर मिट्टी डालकर छुपा दिया जिससे पता न चले। उन लकीरों पर जो भी पैर रखता वो बावला हो जाता। इसी तरह से एक खीरा मँगाकर जादू किया और एक अभिमंत्रित छुरी मँगायी। उस छूरी और खीरे का यह असर था कि जो उस छूरी से खीरे को काटेगा उसका सर धड़- से अलग हो जायेगा।

उसके बाद पंडितों से कहा कि राजा विक्रमादित्य को बुलाओ। जैसेही वह आयेगा और इन लकीरों पर पैर रखेगा बावला हो जायेग। बावला हो छूरी से खीरा काटते हीं उसका सर धड़ से अलग हो जायेगा। राजा विक्रमादित्य को बुलाकर कहा कि आओ हम –तुम खीरा खायें। राजा विक्रमादित्य योगी था अत: वह उन लकीरों से बचकर सिंहासन के पास पहुँच गया। खीरा और छूरी  उसके हाथ से ले लिया।दाहिने हाथ में छूरी रखी और बायें हाथ में खीरा। राजा शंख जब तक समझ पाते राजा विक्रमादित्य ने उनकाकाम तमाम कर दिया। वहाँ का राजा बन बैठा। न्याय और धर्म से राज्य करने लगा।

एक दिन अपने साथियों और मत्रियों के साथ जंगल में शिकार करने गया। शिकार करते-करते अपने साथियों से बिछड़ कर एक घने जंगल में पहुँचा। एक वृक्ष पर चढ़ कर देखने लगा, तो उसे एक तरफ एक नगर दिखा । उस नगर को देख कर सोचने लगा कि क्यों न इस नगर को अपना राज्य बना लिया जाय । उस नगर के राजा का दीवान लूतरबन कौवे के वेश में वहीं बैठा था। जब उसनेयह सुना तो राजा विक्रमादित्य के मुख को दूषित कर दिया। इससे राजा को बहुत क्रोध आया।सवेरा होने पर अव्ह अपने राज्य को लौट आये और हुक्म दिया कि सभी कौवे को बंदी बना लिया जाय। सभी कौवे को बंदी बना कर दरबार में पेश किया गया। तब राजा ने पूछा कि बताओ तुम में से वह कौन-सा कौवा है जिसने रात्रि को मेरे मुँह को दूषित किया। तब सभी कौवे कहने लगे हम में से कोई नहीं है। तब राजा ने कहा- तुम सब के सिवाय वह कौन-सा कौवा है, जिसने यह काम किया।तब एक कौवे ने कहा  – बाहुबल नामक राजा का दीवान लूतरबन कौवे के वेश में रहता है, यह उसी का कार्य है। यदि आप हमें छोड़ दें तो हम उसे ले आये।यह सुनकर राजा ने दो कौवे को छोड़ दिया। दोनों कौवे उड़कर दीवान लूतरबन के पास पहुँचे और कहा-“तुम्हारे कारण हम सभी कौओं की जान खतरेमें है। तुम राजा विक्रमादित्य के पास चलो और हमारी जान बचाओ।”  तब दीवान लूतरबन अपने राजा से आज्ञा लेकर राजा विक्रमादित्य के दअर्बार में पहुँचा। राजा विक्रमादित्य ने उसका आवभगत किया । लूतरबन  ने पूछा – “महाराज ! आपने इन कौवों को क्यों बंदी बना रखा है? ” तब राजा ने जंगल वाली घटना बतायी। सब बातें सुनकर लूतरबन ने कहा वह मेरा काम था । आपकी मंशा जानकर मुझे गुस्सा आया और मेरी बुद्धि जाती रही जिस कारण से मैंने वैसा किया । यह सुनकर राजा विक्रमादित्य हँसा और बोला- “मुझे गर्व क्यूँ ना हो? मैं राजाहूँ, दाता हूँ,सिपाही हूँ ।और कौन-सी बात मुझमें नहीं है वह कहो।” तब लूतरबन ने कहा- “वृक्षपर चढ़कर तुमने जो नगर देखा वहाँ के राजा बाहुबल हैं। आपके पिताजी गंधर्वसेन वहाँ दीवान थे  कुछ मतभेद के कारण आपके पिताजी ने राज्य छोड़कर अंबावती नगर में आकर राजा बन गया। तुम उसी गंधर्वसेन के बेटे हो। तुम्हें कौन नहीं जानता। लेकिन जब तक राजा बाहुबल तुम्हारा राजतिलक नहीं करेगा तुम्हारा राज्य अचल नहीं हो सकता। यदि राजा बाहुबल को तुम्हारे मंशा की खबर लग गई तो तुम्हें एक क्षण में राख कर देगा। इसलिये कहता हूँ  प्यार-मोहब्बत से उसके पास जाकर अपना राज तिलक करवा तभी तेरा राज्य अचल होगा।यदि तू मेरे साथ चलना चाहता है तो अच्छा मुहुर्त निकलवा कर चल। ”

राजा विक्रमादित्य बहुत अक्लमंद था । उसने लूतरबन की बात पर ध्यान दिया  और पंडितों से मुहुर्त निकलवाकर उसके साथ राजा बाहुबल के पास चल पड़ा। अपने राज्य में पहुँचकर लूतरबन ने राजा विक्रमादित्य से कहा कि आप यहीं ठहरें मैं अपने राजा को सूचना देकर आता हूँ। उसके बाद लूतरबन अपने राजा बाहुबल के पास पहुँचा अपनी कुशल-क्षेम बतायी और यह भी कहा कि गंधर्वसेन का बेटा राजा विक्रमादित्य आपसे मिलने आया है। यह सुनकर राजा बाहुबल ने विक्रमादित्य को अपने दरबार में बुलाया । उसकी आवभगत की तथा उसे एक मकान में ठहराया। कुछ दिन व्यतीत करने के बाद राजा विक्रमादित्य ने दीवान लूतरबन से कहा- अब हमें अपने राज्य को जाना है। लूतरबन ने कहा-“हमारे राजा से जो मिलने आता है उसे विदा नहीं करते। तुम उनसे विदा माँगो और जो कुछ भी मन में इच्छा हो वह माँग लो। ” राजा विक्रमादित्य ने कहा-“मुझे कुछ नहीं चाहिये। ‌” तब लूतरबनने कहा- “हमारे राजा के पास एक सिंहासन है। वह सिंहासन महादेव जी ने इंद्र को दिया था और इंद्र ने हमारे राजा को। उस सिंहासन में ऐसा गुण है कि जो  कोई उस पर बैठेगा वह सात द्वीप और नौ खंड पृथ्वी का जीत कर राज्य करेगा।  उस सिंहासन में बत्तीस पुतलियाँ बनी हुई हैं जिन्हें अमृत से सींच कर ढ़ाला गया है। तुम विदा माँगते समय वही सिंहासन माँग लेना।”

अगली सुबह लूतरबन ने राजा बाहुबल से जाकर कहा कि राजा विक्रमादित्य विदा माँगनेआये हैं। यह सुनकर राजा बाहुबल दरवाजे पर आये। राजा बाहुबल को देखाकर राजा विक्रमादित्य ने पना शीश नवाया। तब राजा बाहुबल ने कहा‌-“तुम्हें जो भी चाहिये वह माँग लो।” राजा विक्रमादित्य ने कहा‌-“ महाराज! आप मुझे वह सिंहासन दे दो जिसे इंद्र ने आपको दिया है।” तब राजा बाहुबल ने वह सिंहासन मँगवाया और पान-तिलक ले कर मंगलाचरण के साथ राजा विक्रमादित्य का तिलक कर दिया।

उसके बाद राजा विक्रमादित्य अपने राज्य को लौट आये। राजा ने अपना राज्य दूर-दूर तक फैलाया। उनके राज्य में सभी सुखी थे। किसी को कोई दु:ख नहीं था। सभी प्रजा तीनों समय भगवान का ध्यान करते । अपना कार्य करते और सुखपूर्वक रहते। एक दिन राजा ने पंडितों से पूछा कि शास्त्र देखकर बताओ कि मै संयत  बाँधू। यह सुनकर पंडितोंने शुभ मुहुर्त देखकर राजा को सलाह दी कि एक बरष तक सभी ब्राह्मणों , कुटुम्बो को बुलाओ, कन्यादान करो, ब्राह्मणों, भूखों, नंगों को वृत्ति प्रदान करो, पुराण सुनो। इस प्रकार से पंडितों के कहे अनुसार राजा विक्रमादित्य ने संयत की।

यह सब बातें रत्नमंजरी ने राजा भोज को बताया और राजा विक्रमादित्य का यश गाया। उसके बाद  कहा-“राजा भोज! जो तुम इतने हो तो इस सिंहासन पर बैठो।”  राजा भोज ने कहा- “सच है।जो कुछ तुमने कहा मुझे पसंद आई।” इतना कहकर राजा अपनी सभा में जाकर बैठ गये ।अपने मंत्रियों और सभासदों को कहा- तुम सब संयत बाँधनेकी तैयारी करो।

इस प्रकार से उस दिन की सायत टल गई । दूसरे दिन राजा ने  दीवान को बुलाकर फरमाया कि सिंहासन पर बैठने की तैयारी करो । यह सुनकर वररूचि  पुरोहित बोला-“राजा डरते क्यों हो? सिंहासन की सभी पुतली तुमसे बातें करेगी। उन सब की बातें सुनकर जो आपको करना हो वह किजिये।”

पुरोहित की बात सुनने के बाद उस सिंहासन पर बैठने के लिये जैसे हीं पैर बढ़ाया चित्ररेखा नामकी दूसरी पुतली बोल उठी।

दूसरी पुतली चित्ररेखा

दूसरी पुतली बोली- “राजा! तेरे योग्य या आसन नहीं है।  और ऐसी अनीती कोई करता नहीं जो तू करने पर तैयार हुआ है।  इस सिंहासन पर बैठे वह जो विक्रमादित्य -सा राजा हो।”

तब राजा बोला- “ राजा विक्रमादित्य में कौन-कौन-से गुण थे सो मुझसे कहो।”

तब वह पुतली चित्ररेखा बोली- एक दिन राजा विक्रम कैलाश को गये। गये।वहाँ पर एक यती से राजा की मुलाकात हुई । उसने राजा को योग की सब रीति बतलाई । तब राजा के मन में आया कि योग कमावें। कमावें।ऐसा विचार कर राजा ने अपने भाई भर्तहरि को राजा बना दिया। और स्वयं सब छोड़ कर कमंडल ले सन्यासी बनकर जंगल को चला गया।उत्तरखंड में जाकर योग साधने लगा। उस शहर के जंगल में एक ब्राह्मण तपस्या करता था। धुँआ पी के रहता था और भूख-प्यास के दु:ख सहता था। ब्राह्मण की तपस्या देख के देवता खुश हुए । उसको वर देने लगे और उसने न ली तब आकाशवाणी हुई  कि, हम अमृत भेजते हैं सो तू ले। एक देवता आदमी की सूरत में आकर उसे फल दे यह कह गया कि यह अमर फल है इसे खाने से तू  अमर हो जायेगा।

ब्राह्मण वह फल लेकर खुशी-खुशी अपने घर को लौटा । ब्राह्मणी को फल देकर कहा कि मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर देवताओं ने यह फल मुझे दिया है। इस फल को खानेवाला अमर हो जायेगा। यह सुनकर ब्राह्मणी रोने लगी और कहा-“  अमर हो कर क्या करना। हमें भिक्षा माँगकर हीं जीवन यापन करना होगा और संसार के कष्ट झेलने होंगे। आप इस फल को राजा को दे आओ और कुछ धन माँग लो , जिससे हमारे बाकी बचे दिन आराम से गुजरे। राजा अमर हो जायेगा तो लाखों लोगों की भलाई करेगा ।”

ब्राह्मण को ब्राह्मणी की बातें सही लगी । अत: वह राज दरबार मे गया और राजा के द्वारपाल को कहा- “मैं राजा के लिये अनोखा फल ले कर आया हूँ। मुझे राजा से मिलने दिया जाय।” द्वारपाल ने राजा के पास जाकर ब्राह्मण का संदेश कहा। राजा ने ब्राह्मण को अपने सभा में बुलाया। ब्राह्मण ने वह फल राजा को दिया और उस फल के गुण बताये। तब राजा ने कहा-“हे ब्राह्मण! तुम्हें यह फल कैसे प्राप्त हुआ , विस्तार से बताओ। ” ब्राह्मण ने कहा-“मेरे घोर तपस्या से प्रसन्नहोकर देवताओं ने यह अमर फल मुझे दिया है। यह आप ग्रहण करे।” राजा ने वह फल ब्राह्मण से ले लिया और उसे लाख रूपये और गाँव वृति मे दे दी ।

राजा वह फल लेकर सोचने लगा‌, मैं इसे खा कर क्या करूँगा । यदि यह फल रानी खा ले तो वह मुझे सुख देगी । यह सोचकर राजा रानी के महल में गया और रानी को वह फल देकर कहने लगा- “रानी यह अमर फल है। इसे खाने से तुम्हारा यौवन हमेशा बना रहेगा और तुम सुंदर रहोगी।” राजा की बातें सुनकर रानी ने वह फल ले लिया और कहा ‌ – “ठीक है, यह फल मैं खाऊँगी।”

राजा के जाने के बाद रानी ने अपने प्रियतम कोतवाल को बुलाया और कहा- “तुम मेरे प्रिय हो । तुम इस फल को खाओ , यह अमर फल है।” कोतवाल वह फल लेकर रानी के महल से चल दिया और अपने प्रिया नर्तकी के घर पहुँचा । कोतवाल ने नर्तकी को वह फल दिया और कहा- “यह अमर फल है। इसे खाने से तुम कभी वृद्धावस्था को प्राप्त नहीं होओगी। ” नर्तकी ने कहा- “ठीक है। ” कोतवाल के जाने के बाद नर्तकी ने सोचा यदि मैं इस फल को खा लेती हूँ , तो ना जाने और कितने पाप कमाऊँगी। पाप सए मुझे कष्ट हीं मिलेगा। यदि यह फल राजा को दे दूँ, तो वह अमर हो जावेगा और मुझे याद रखेगा । इससे मुझे भी पुण्य मिलेगा।

यह सोचकर नर्तकी राजा से मिलने गई और उन्हें फल देकर  उस फल के गुण बताये।राजा उस फल को लेकर हँसा और नर्तकी से पूछा- “तुम्हें यह फल कैसे मिला।” नर्तकी सब बातें जानती थी , लेकिन उसने बस इतना कहा कि यह फल मुझे कोतवाल ने दिया है।

नर्तकी के जाने के बाद राजा ने सोचा मैंने अपना मन रानी को दिया। रानी ने मुझे धोखा देकर कोतवाल से दिल लगाया। मुझे धिक्कार है। आदमी जिस दिन जन्म लेता है उसी दिन उसकी मृत्यु निश्चित हो जाती है। यह धन-दौलत सब नश्वर हैं। यह सब सोच राजा रानी के महल में गया और रानी से कहा- “रानी! मैंने तुम्हें फल दिया था, उसका तुमने क्या किया? ” रानी ने उत्तर दिया- “मैंने खा लिया।” यह सुनते हीं राजाने रानी के हाथ पर वह फल रख दिया। फल को देखते हीं रानी जड़ हो गई।

राजा ने वह फल धोकर खा लिया। अपना सारा राज-पाट ,धन-दौलत छोड़ योगी बन जंगल को चला गया। यह बात राजा इंद्र को पता चली कि राजा भर्तहरि अपना राज-पाट छोड़ योगी बन गया है। यह सुनकर इंद्र की सभा ने विचार किया और एक देवता को उस राज्य की रखवाली के लिये नियुक्त कर भेज दिया।

इधर वह नियुक्त देवता राज्य की रखवाली करता था। इधर राजा विक्रमादित्य का योग पूरा हुआ। अत: उसने सोचा मैंने अपना राज्य अपने छोटे भाई को दे दिया। अब जाकर देखता हूँ कि वह किस प्रकार से राज सँभाल रहा है। यह सोचकर रात्रि को राजा विक्रमादित्य अपनेनगर को पहुँचा। नगर के पास पहुँचते ही उस देव ने पूछा- “तुम कौन हो? जो इस समय नगर में प्रवेश कर रहे हो? ” राजा विक्रमादित्य ने कहा- “मैं राजा विक्रमादित्य हूँ। तुम कौन हो? जो मुझे रोक रहे हो? ” तब उस देव ने उत्तर दिया-“मुझे देवताओं ने इस राज्य की रखवाली की लिये नियुक्त किया है। ” राजा विक्रमादित्य ने पूछा- “राजा भर्तहरि को क्या हुआ? ” उसने कहा- “राजा भर्तहरि को कोई छल कर यहाँ से ले गया । ”  यह सुनकर  राजा हँसा हँसा और बोला- “वह तो मेरा छोटा भाई है।” देव ने कहा- “मैं नहीं जानता। यदि तू राजा है तो मुझसे लड़ और फिर इस नगर में प्रवेश कर। ” राजा विक्रमादित्य और उस देव मे लड़ाई होने लगी’ जब वह देव हार गया तो उसने राजा विक्रमादित्य  से कहा – “मुझसे वरदान माँग। ” राजा विक्रमादित्य ने कहा- “मैंने तुम्हें मात दइयाहै। मैं कहाहूँ तो तुझे मार सकता हूँ। तू मुझे क्या वरदान देगा।” देव ने कहा-“राजा तू मुझे छोड दे। मैं तुम्हें एक सच्चाई बताता हूँ। तुम्हारे नगर में एक तेली और कुम्हार है जो तुम्हें मारना चाहते हैं। तुम तीनों में से जो दो को मार डालेगा वह अचल राज्य भोगेगा। तेली तो पाताल का राज करता है और वह कुम्हार योगी बना जंगल में रहता है। योगी अपने मन में कहता है कि राजा को मारकर तेली को कड़ाह में तल दूँगा। उसके बाद त्रिलोक पर राज्य करूँगा। ” तुम इनसे बचकर रहना। आगे की बात सुनो। योगी ने आज रात तेली को मारकर सिरीस के वृक्ष पर टाँग दिया है।अब तुम्हें वह निमंत्रण देगा और छल से तुम्हें वहाँ ले जाएगा। तुम उसके साथ जाना जब वह तुम्हें दंडवत करने को कहेगा तब कहना- “तुम गुरु हो मैं शिष्य मुझे बताओ दंडवत कैसे करते हैं। मैं तो राजाहूँ मुझे दंडवत नहीं आता। वह जैसे ही दंडवत के लिये झुकेगा उसे मार देना । उसके बाद तेली को वृक्ष से उतारकर दोनों को खौकते तेल के कड़ाही में डाल देना। ”   इतना कहकर वह देव वहाँ से चला गया। राजा विक्रमादित्य अपनेमहल को लौट आये। सवेरा होने पर जब सबने देखा कि राजा विक्रमादित्य लौट आये हैं तो बड़े प्रसन्न हुये । पूरे राज्य में खुशी की लहर छा गई। उसी दिन दरबार में एक योगी आया और उसने राजा से कहा-“मैंने एक अनुष्ठान किया है। आप पधारें।” राजा ने कहा- “ठीक है। मैं आज आऊँगा।” शाम को राजा अकेला हीं उस योगी के बताये हुये  ठीकाने पर पहुँच गया। योगी भी पूरी तैयारी में था। राजा को देखते हीं बोला- “राजा! देवी को दण्डवत करो। ”  राजा ने कहा- “मैं राजा हूँ। मुझे दंडवत करना नहीं आता। आप बता दो । तो मैं कर लूँगा।” राजा की बात सुनकर योगी जैसे हीं दंडवत के लिये झुका राजा ने तलवार से उस योगी के सर को धड़ से अलग कर दिया। और देव के कहे अनुसार वृक्ष से तेली को उतारकर दोनो को खौलते तेल की कड़ाही में डाल दिया। तब देवी बोली- “तू धन्य है विक्रम! धन्य हैं तेरे माता-पिता । मैं तुम्हारे साहस से प्रसन्न हूँ । जो भी वरदान माँगना चाहते हो माँग लो।” देवी के इतना कहते हीं वहाँ पर दो वीर हाजिर हुये और राजा विक्रमादित्य से बोले- “आसिया और कोयला हमारे नाम है। तुम्हारी जो भी इच्छा हो हम पूरी करेंगे। हम कहीं भी आ-जा सकते हैं।” तब राजा ने कहा- “अभी तो मुझे कोई काम नहीं है। लेकिन यदि  तुम वचन दो। तो मैं देवी से तुम्हें माँग लूँ।” तब उन दोनों ने कहा- “अच्छा। ” तब राजा ने देवी से उन दोनों वीरों को माँग लिया और उन्हें कहा कि जब भी जिस जगह मैं तुम दोनों को बुलाऊँ आ जाना। दोनो वीरों ने राजा को वचन दिया। उसके बाद राजा अपने महल को लौट आये।

इतना कह पुतली चित्ररेखा ने राजा भोज से कहा कि राजा विक्रम ऐसे थे। बाद में जब भी उन्हें उन दोनों वीरों की आवश्यकता हुई । वे दोनों आए और राजा के कहे अनुसार कार्य को अंजाम दिया। यदि तुम राजा विक्रम के जैसे हो तो सिंहासन पर बैठो। इस तरह से उस दिन का भी शुभ मुहुर्त निकल गया। अगले दिन राजा फिर सिंहासन पर बैठने के लिए आगे बढ़ा कि तीसरी पुतली सत्यभामा बोल पड़ी।

तीसरी पुतली सत्यभामा

तीसरी पुतली बोली- यह काम नहीं जो इस पर बैठो । पहले मुझसे नई कथा सुन लो, फिर बैठने की सोचना। एक दिन  राजा विक्रमादित्य दरिया के किनारे अपने रंगमहल में बैठे थे। नर्तकी नाच रही थी। दरबार लगा हुआ था। तरह-तरह की खेल हो रहे थे। एक-से-एक सुंदर नर्तकी वहाँ राजा का दिल बहला रही थी।

तभी दरिया के किनारे एक पंथी , एक स्त्री के संग जिसकी गोद में बच्चा था, वहाँ पहुँचा।  तीनों अपने घर से खफा हो वहाँ आये थे। और क्रोध के वशीभूत होकर दरिया में कूद पड़े।  दरिया में कूदते हीं तीनो डूबने लगे। पंथी एक हाथ से बच्चा और दूसरे हाथ से स्त्री को पकड़े हुये था। जब तीनों डूबने लगे तब पुकारकर कहा- “कोई धर्मात्मा है हमारी आवाज सुन रहा है, जो हमें बचा सके।जब कोई गुस्से पर काबू नहीं कर पाता तो ऐसे हीं बेमौत मारा जाता है।फिर बाद में पछताता है। ”

राजा विक्रमादित्य  ने जैसे हीं उस पंथी की आवाज सुनी तो अपना रास-रंग छोड़कर पूछा- “कौन फरियादी पुकार रहा है? ” हरकारों ने कहा- “महाराज! एक मर्द ,एक औरत और बच्चे के साथ दरिया में डूब रहा है, वही पुकार रहा है कि कोई उपकारी है जो हमें बचा ले। ” अभी हरकारा कह हीं रहा था कि उस डूबते हुये पंथी ने फिर पुकारते हुये कहा- “हम तीन प्राणी डूबते हैं, कोई भगवान का  बंदा हमें बचा लें।” इतना सुनते हीं राजा विक्रमादित्य उन तीनों को बचाने के लिये दरिया में कूद पड़े।एक हाथ से बच्चे को और दूसरे हाथ से स्त्री को पकड़ा। उस पंथी ने भी राजा को पकड़ लिया।लिया। तब राजा भी डूबने लगा।बहुत जोर लगाया लेकिन निकल नहीं पा रहा था। राजा विक्रमादित्य ने भगवान को याद किया और मन-हीं-मन कहने लगा हे प्रभु! मैं तो परोपकार करने आया था। लेकिन अब तो अपना जान भी जाएगा। धर्म करने आया और अधर्म का पाप लगेगा। यह कह कर   बहुत जोर लगाने लगा। जब सफल न हो सका। तब उन दोनों वीर आसिया और कोयला को याद किया। राजा के याद करते हीं दोनों वीर दरियामें पहुँच गये और राजा सहित उन तीनों को दरिया से निकाल लिया।लिया।जब उस पंथी को होश आया तो वह राजा के चरणोंमे गिर कर कहने लगा- “महाराज! आपने हम तीनों को जीवनदान दिया है।ाप हीं हमारे भगवान हो।” राजा उन तीनों को अपने राजमहल में ले गया और बोला- “जो तुम्हें चाहिये।वह माँग लो।” तब पंथी बोला- “महाराज! यदि आपकी आज्ञा हो तो हम घर को जायें। जब तक जियेंगे आपको आशीष देंगे।यह जीवन आपका दिया हुआ है।” तब राजा ने उन्हें लाख मोहरें देकर घर को विदा कर दिया।

इतना कहकर तीसरी पुतली  बोली-“राजा! यदि तुम इतने लायक हो , तो सिंहासन पर बैठो। नहीं तो सभी लोग हँसेंगे।” इस तरह से उस दिन का मुहुर्त भी जाता रहा। दूसरे दिन राजा फिर सोचता हुआ शुभ मुहुर्त में उस सिंहासन की ओर बढ़ा तब चंद्रकला नामवाली चौथी पुतली बोली-

चौथी पुतली चंद्रकला

चंद्रकला नामवाली चौथी पुतली बोली- सुनो! राजा तुम अपना मन मलिन न करो। मै जो कथा कहती हूँ उसे सुनो‌ –

एक दिन एक ब्राह्मण राजा विक्रमादित्य के दरबार में आया और कहा कि जो कोई मेरे कहे अनुसार एक महल बनवाये तो बड़ा नाम कमावे और सुख चैन से रहे। तब विक्रमादित्य ने ब्राह्मण से कहा- “बताओ। ” ब्राह्मण ने कहा- “जब तुला लग्न आये तो उसमें मंदिर उठाये।जब तक तुला लग्न हो काम करवाये और तुला लग्न के खत्म होते हीं काम रोक दे।इसी प्रकार से तुला लग्न में ही पूरा महल तैयार हो। तो उस महल में रहनेवाले के अटूट भंडार होगा और उसके पास से लक्ष्मी कभी नहीं जायेगी।”

यह सुनकर राजा बहुत प्रसन्न हुआ। दीवान को बुलाकर आदेश दिया कि उचित स्थान देखकर महल का निर्माण ब्राह्मण के कहे अनुसार तुला लग्न में ही कराया जाये। जाये। तुला लग्न के आते हीं सभी कारीगर उस महल को बनाने में जुट जाते और लग्न समाप्त होते हीं आराम करते। यह महल दरिया की किनारे बनवाया गया। इसमें सात खण्ड और चार दरवाजे लगे हुये थे। सभी नक्कासी, हीरे-जवाहरात से किये जा रहे थे। दरवाजे पर दो नीलम जड़े गये जिससे किसी की नजर ना लगे। महल को बनने में बरसों लग गये। जब महल बनकर तैयार हो गया, तब दीवान ने राजा से कहा- “महाराज! आपके कहे अनुसार महल तैयार हो गया है। आप चलकर देखें।” हर कोई उस महल को देखकर देखता हीं रह जाता।

जब राजा विक्रमादित्य उस महल को देखने गये तो उस ब्राह्मण को भी ले गये। ब्राह्मण ने उस महल को देखकर राजा से कहा- “महाराज! यदि मैं ऐसा महल पाऊँ , तो अपना सारा जीवन सुख से बिताऊँ।” ब्राह्मण की बात सुनकर राजा ने उसी क्षण  तुलसीदल और जल मँगवाकर उस महल को ब्राह्मण को दान में दे दिया। ब्राह्मण उस महल को पाकर ऐसे प्रसन्न हुआ जैसे चकोर रात को चंद्रमा को पाकर होता है। ब्राह्मण ने अपने सभी कुटुम्ब को उस महल में बुला लिया। रात को जब ब्राह्मण पलंग पर सोता था कि पहले पहर बीते लक्ष्मी वहाँ आई और ब्राह्मण से कहा- “ब्राह्मण! हुक्म दे तो मैं गिरूँ गिरूँऔर घर बाहर सम्पूर्ण भरूँ।” डर के मारे ब्राह्मण ने कुछ जवाब नहीं  दिया। दूसरे पहर लक्ष्मी फिर आई और बोली- “ओ ब्राह्मन! अज्ञानी मुझे आज्ञा दे।”

ब्राह्मण ने जैसे तैसे रात बिताई और सवेरा होते हीं डर से काले स्याह मुख लिये  हुये राजा के दरबार में पहुँचा। राजा ब्राह्मण को देखकर हँसा और बोला- “ब्राह्मण कल वाली खुशी आज कहाँ गायब हो गई। यह आश्चर्य की बात है।”

ब्राह्मण ने कहा- “हे महाराज! मेरे दु:ख के तुम दाता हो। प्रजा को सउख देनेवाले और शकबंधी नरेश हो। कर्ण के जैसे दानी हो।आपने जो मंदिर मुझे दिया है उसकी असलियतमैं बताता हूँ। उस मंदिर में भूत पिशाच का बसेरा है। मुझे रात भर सोने नहीं दिया । आपकी कृपा से और बच्चों के भाग्य से हें मैं जीवित हूँ। भिक्षा माँग कर रह लूँगा लेकिन उस महल में नहीं रहूँगा। ”

तब राजा ने दीवान को कहा कि उस महल की जो भी कीमत हो उतना धन ब्राह्मण को दे कर विदा करो। इस प्रकार से ब्राह्मण महल की कीमत के बराबर धन लेकर अपने घर को लौट गया। पंडितों से शुभ मुहुर्त निकलवा कर राजा विक्रमादित्य उस महल में रहने को गये। रात्रि को राजा अपने पलंग पर कुछ विचार कर रहे थे कि लक्ष्मी प्रकट हुई और कहा- “धन्य हो राजा विक्रम ! धन्य है तुम्हारा धर्म।” इतना कहकर लक्ष्मी उस समय चली गई। जब एक पहर बीता तब लक्ष्मी फिर आई और राजा से कहा- “राजा ! अब मैं कहाँ गिरूँ।” तो राजा ने कहा- “हे माता!यदि तुम गिरना चाहती हो, तो मेरे पलंग कोछोड़कर जहाँ तुम्हारी इच्छा हो वहाँ गिर।” उसके बाद पूरी रात पूरे राज्य में सोने की बरसा हुई। जब सुबह राजा उठा तो दीवान ने आकर सूचना दी  कि पूरी रात हमारे राज्य में सोने की बारिश हुई है। हर जगह सोना-ही-सोना है। आप का जो हुक्म हो वह किया जाय। तब राजा ने कहा- पूरे राज्य में ढ़िढोरा पिटवा दो कि जिसके रैयत में जितना सोना हो वह ले ले। कोई किसी को मना नहीं करेगा। राजा की आज्ञा पाकर सारे नगर वासियों ने अपने –अपने रैयत की दौलत को एकत्रित कर रख लिया।

इतना कहकर पुतली चंद्रकला बोली- “सुन राजा भोज! ऐसे थे राजा विक्रम के गुण और ऐसे प्रजा की हित किया करते थे। इसलिये तू किस प्रकार इस सिंहासन पर बैठता है।” राजा भोज निरुत्तर हो गये और पुरोहित वररूचि का भी शर्मिंदा हुये।

उस दिन का भी मुहुर्त बीत गया। अगली सुबह जब राजा सिंहासन बैठने को सोच हीं रहे थे की पाँचवीं पुतली लीलावती बोल पड़ी-

पाँचवीं पुतली लीलावती

पाँचवीं पुतली लीलावती बोल पड़ी- सुन राजा विक्रम के गुण। एक दिन दो पुरुष आपस में लड़ने लगे। एक ने कहा कर्म बड़ा, यदि कर्म करो तो फल भी मिलता है। तो दूसरे ने कहा नसीब।यदि किस्मत अच्छी हो तो मिट्टी भी सोना हो जावे। दोनों अपने झगड़े को निबटाने के लिये राजा इंद्र के पास पहुँचे। राजा इंद्र ने कहा- “इस झगड़े का फैसला तो वही कर सकता है जो योगी हो। तुम दोनों फैसले के लिये पृथ्वीलोक में राजा विक्रमादित्य के पा जाओ। वही यह फैसला कर सकता है।”

राजा इंद्र की आज्ञा पाकर दोनों राजा विक्रमादित्य के पास पहुँचे और कहा-“तीनों लोकों  में हमारा फैसला कोई नहीं कर पाया। राजा इंद्र की आज्ञा पाकर हम दोनों यहाँ उपस्थित हुये हैं। हमारा फैसला करो।”

तब राजा ने कहा- आज से ठीक छह माह बाद हमारे पास आओ। तब मैं इस बात का जवाब दूँगा। यह कहकर उन दोनो को अपने-अपने घर लौटा दिया। राजा अपने मन में फैसले की बात सोचने लगे और विदेश को चल दिये। मन में यही ठान लिया कि जब तक फैसला नहीं कर लेंगे लौट कर नहीं आएँगे। चलते-चलते समुद्र के किनारे पहुँचे । समुद्र के किनारे एक नगर बसा हुआ था। उस नगर की सभी हवेलियाँ हीरे-जवाहरात से जड़ी हुई थी । यह देखकर राजा ने सोचा कि इस देश का राजा कैसा होगा। यही सोचकर उस नगर में चल दिया। नगर में कहलते-चलते शाम हो गई लेकिन वह नगर खत्म नहीं हुआ। इतने में राजा की नजर एक दुकान पर पड़ी ,दुकान में महाजन सिर झुकाये हुये बैठा था। राजा उसी दुकान के सामने जा पहुँचा।

सेठ ने राजा से पूछा- “तू किस देश से आया है और तेरा मुख मलीन क्यूँ है? किसे ढ़ूँढ़ रहे हो? तुम्हारा क्या काम है? यह सब बातें मुझे बतलाओ? तुम किसके बेटे हो? तुम्हारा नाम क्या है? ”

तब राजा ने कहा- “सेठ जी! मेरा नाम विक्रम है।मैं आज तुम्हारे पास आया हूँ। मैं राजा से मिलना चाहता हूँ लेकिन आज मुलाकात नहीं हुई। इसलिये तुम्हारे पास आया हूँ। कल मिलने जाऊँगा। और उनकी सेवा करूँगा। जो वो मुझे नौकर रखेंगे और महीना कर देंगे तो मै रहूँगा।” यह सुनकर सेठ बोला- “तुम रोज का क्या लोगे? ”

राजा विक्रम ने कहा- “जो कोई लाख रूपये रोज देगा तो मैं उसके यहाँ नौकर रहूँगा।” तब सेठ बोला- “भाई! तुम क्या काम करते हो? जो तुम्हें लाख रूपये रोज को देवे वह काम मुझे बताओ। ” राजा ने कहा- “जिस राजा के पास मैं रहता हूँ, उसकी गाढ़ी मुश्किल में काम आता हूँ।” सेठ हँसकर बोला- “लाख रूपये रोज हमसे लो और कठिनता में मेरी सहायता करो।” सुबह हुए नौकर रखा और दूसरे दिन लाख रूपए दिये। राजा ने उसमें से आधे रूपए भगवान के नाम संकल्प कर ब्राह्मणों को दान दे दिये।आधे के आधे कंगालों को दिये। और जो बच गये उनका खाना पकाकर भूखों को खिला दिया। रात को एक फकीर मिला तो उसे भी अपना खाना खिला कर खुद चने चबा कर रह गया।इस प्रकार से जितने दिन सेठ के पास रहे सारे पैसे खर्च किए।किस्मत ने यारी  दिखाई तब जोर बोला अब मेरी बारी।

एक दिन सेठ ने जहाज तैयार करवाया और विक्रम से कहा- मैं किसी देश जाता हूँ। वह बोला- सेठ! मैंए यह वचन दिया था कि गाढ़ी भीड़ में तुम्हारे काम आऊँगा।  मैं भी तुम्हारे साथ चलूँगा।सेठ ने उसे भी अपने साथ जहाज में चढ़ा लिया। एक दिन जब जहाज तूफान से गिरकर तबाह होने लगा तो सेठ ने वहीं लंगर डलवा कर जहाज रोक दिया। उसी जगह पर एक टापू  था वहाँ की राजकन्या का नाम सिंहावती था।वह हजार कन्या के साथ रहती थी। जब तूफान थमा तो सेठ ने जहाज के लंगर को उठाने को कहा लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी लंगर टस –से-मस नहीं हुआ। सब लोग भगवान को याद करने लगे। लेकिन लंगर समुद्र में कहीं अ‍टक गया था जिससे नहीं निकल रहा था। तब सेठ ने विक्रम से कहा अब तुम कुछ करो क्योंकि तुमने मुश्किल में काम आने का वचन दिया था। सेठ की बात सुनकर विक्रम हाथ में छुरा लेकर रस्से के सहारे समुद्र में उतर गया। लंगर को निकालने की कोशिश की पर सफल न हुआ। तब सेठ से कहा – “सेठ जी पालें चढ़ा दों।” लोगों ने पालें चढ़ा दी। तब विक्रम समुद्र मे कूद गया और लंगर को काट दिया। पानी के बहाव और हवा से जहाज चल पड़ा लेकिन विक्रम वहीं रह गया।

जो विधाता ने लिखा है उसे कोई बदल नहीं सकता। वह बहते-बहते एक नगर के पास पहुँचा। जब वह नगर में जाने लगा तो उसकी नजर नगर के दरवाजे पर पड़ी, जिस पर लिखा था- “सिंहावती की राजा विक्रमादित्य से शादी होगी।” यह देख राजा आश्चर्य में पड़ गया कि यह किस पंडित ने लिखा है?

जब राजा अंदर पहुँचा तो उसे वहाँ एक महल नजर आया, जिसमें केवल स्त्रियाँ हीं थी। वहाँ कोई मर्द नहीं था। राजा महल के अंदर गया, तो देखा कि एक पलंग पर सिंहावती सो रही है और चारों ओर उसकी सखियाँ बैठी है। राजा भी उसी पलंग पा बैठ गया। राजा ने सिंहावती को जगाया और उसके हाथ पकड़ लिये। वहाँ सभी जानतीं थी  कि एक दिन राजा विक्रमादित्य यहाँ आयेगा। अत: सखियों ने उन दोनों का गंधर्व विवाह करवाया। राजा वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे। उसे अपने राज्य की कुछ सुध ना रही।

इतना कह लीलावती पुतली ने राजा भोज से कहा- जैसा राजा ने बल किया वैसा विधाता ने उसे सुख दिया।

फिर लीलावती पुतली ने कहा – उन सखियों में से एक को राजा से प्रीतीहो गई। इसलिये उसने राजा विक्रम पर दया करते हुये  वहाँ का भेद बताया कि वह जीते हुये वहाँ से कभी निकल नहीं पायेगा। तुम्हारा नाम सुनकर और तुम्हारे राज्य का ध्यान कर के मुझे तुम पर रहम आता है क्योंकि तुम न्यायप्रिय, धर्मात्मा और साहसी राजा हो। तुम्हारे यहाँ रहने से लाखों लोग न्याय से वंचित हो दु:ख पाते होंगे। तब राजा को अपने राज्य की याद आई। राजा ने उस सखी से पूछा- यहाँ से निकलने का भेद बताओ। सखी ने कहा- “रानी के अस्तबल में एक घोड़ी है वह उदय से अस्त तक चल सकती है। ” यह जानकर राजा दूसरे दइन रानी के साथ अस्तबल में गया और घोड़ों को देखने लगा। रानी ने कहा, यदि तुम्हें घुड़सवारी पसंद है तो किया करो। तब राजा रोज-रोज नये-नये घोड़े मँगवाता और उस पर बैठ कर सवारी करता । इसी तरह से मौका देखकर राजा ने उस घोड़ी को मँगवाया, रानी इस गलतफहमी में थी कि राजा ऐसे ही खेल रहा है। लेकिन राजा ने घोड़ी को ऐड़ लगाई। ऐड़ लगाते हीं घोड़ी हवा में बाते करने लगी। सभी सखियाँ और रानी के देखते-देखते राजा घोड़ी के साथ उनकी आँखों से ओझल हो गया।  राजा सीधे अम्बावती नगरी में आ पहुँचा। वहाँ नदी के किनारे राजा ने एक सिद्ध को बैठे देखा।सिद्ध को देख कर उसे दंडवत किया। सिद्ध जब ध्यान से उठे तो राजा को दंडवत देख प्रसन्न हुये और उसे एक माला देते हुये कहा- राजा! यह विजयमाला है । यह जहाँ जायेगा वहाँ फतह पाएगा। इस माले में एक गुण और भी है कि यदि तुम इसे धारण करोगे तो तुम सब को देख पाओगे लेकिन तुम्हें कोई नहीं देख पायेगा। पायेगा।उसके बाद एक छड़ी दीं और उसका गुण बताया। कि यह पहले पहर माँगने पर सोने का जड़ाऊ गहना देगी। दूसरे पहर यह एक नारी देगी जिसके तुम आशिक हो जाओगे। तीसरे पहर रात को जो इसे हाथों में लेगा वह किसी को नजर नहीं आयेगा और चौथे पहर काल के समान हो जायेगी। जायेगी। इसके डर से कोई दुश्मन तुम्हारे पास न आ सकेगा। सिद्ध से विदा लेकर  जब राजा उज्जैन नगरी की ओर बढ़े तो रास्ते में एक भाट और ब्राह्मण को देखा। दोनों ने राजा को आशीष दिया और कहा-“आपके द्वार पर हमने बड़ी सेवा की लेकिन भग्यने हमारा साथ नहीं दिया।”  यह सुनते हीं राजा ने ब्राह्मण को छड़ी और भाट को माला दे दी और उसके गुण भी बतलाये। राजा को दोनों ने कहा- “इस समय आप राजा कर्ण के समान दानवीर हो। तुम्हारे जैसा कोई दूसरा दानवीर इस समय कोई नहीं है। ”  यह कह कर दोनों अपने –अपने स्थान को चल दिये। राजा भी अपने महल को लौट गये। राजा के आने की खबर पाकर सभी नगरवासी प्रसन्न हो गये। दरबार लगा।

समाचार पा दोनों लड़ाई वाले मनुष्य भी आ पहुँचे और कहा- “महाराज! आपने छह माह कहे थे, वो तो कब के बीत गये। हमारा फैसला सुनाइये।” यह सुन राजा ने कहा- “बिना कर्म के बल काम नहीं आता आता और बिना बल के कर्म का कोई काम नहीं। अत: दोनों बराबर है । कोई किसी- से बड़ा या छोटा नहीं है।”  यह सुनकर दोनों बड़े प्रसन्न हुये और खुशी वहाँ से अपने घर को लौट गये।

इतना कह लीलावती पुतली ने कहा- “राजा भोज! मैंने यह कथा इसलिये सुनाई कि यदि तुझमें भी राजा विक्रम के जैसा योग है तो इस सिंहासन पर बैठ।”

इस प्रकार से वह दिन भी बीत गया।गया।गले दिन जैसे ही राजा सिंहासन की ओर बढ़ा छठी पुतली कामंदकला बोल पड़ी-  

छठी पुतली कामंदकला

छठी पुतली कामंदकला हँसी और बोल पड़ी-  “जिस आसन पर राजा विक्रमादित्य ने पाँव धरा है उस पर तू बैठने के लायक हो , तभी बैठो।  ” तब राजा ने कामंदकला से कहा- “मुझे राजा विक्रमादित्य के गुण बताओ। ”

छठी पुतली कामंदकला बोली- “तो ध्यान से सुन । उस नृपति की कथा।”

एक दिन राजा विक्रमादित्य अपने दरबार में बैठा था कि एक ब्राह्मण आया और आश्चर्य की बात बताई। उत्तर दिशा में एक वन है , उस वन में एक पर्वत के आगे एक तालाब है। उस तालाब में एक खम्भा स्फटिक का है। सुर्य निकलने के साथ हीं वह खम्भा तालाब से निकलता है और सूरज ज्यों-ज्यों चढ़ता है वह खम्भा भी बढ़ता है , दोपहर को वह  खम्भा सुर्य के रथ के बराबर पहुँच जाता है। तब उस जगह रथ कुछ देर ठहरता है। सुर्य जब भोजन कर लेते हैं । उसके बाद सुर्य का रथ आगे बढ़ जाता है और वह खम्भा भी धीरे –धीरे घटते हुये सुर्यास्त के साथ तालाब के अंदर चला जाता है। इस बात को देवता या देव कोई नहीं जानता। ब्राह्मण के मुख से यह आश्चर्य की बात सुनकर राजा ने उन्हें दान देकर विदा किया।कुछ बोले नहीं और इस बात को मन में हीं रखा।

शाम को राजा अपने कक्ष में पहुँच कर दोनों वीर अगियाऔर वेताल को याद किया । दोनों राजाके कक्ष में हाजिर हुये और कहा- “बताइये आप कहाँ जाना चाहते हैं। क्या खिदमत करूँ। ” तब राजा ने उन दोनों से कहा कि मैं उत्तरखंड में उस तालाब के आश्चर्य को देखना चाहता हूँ। आज्ञा पाते हीं दोनों ने राजा को उस तालाब के पास पहुँचा दिया। राजा ने वह तालाब देखा चारों घाट उसके पक्के हैं।हंस –बगुले उसमें तैर रहे है। कमल के फूल खिले हुये हैं। चारों ओर पंछियों का कलरव है। जब सुबह हुई तब राजा ने ब्राह्मण के बताये हुये आश्चर्य  को अपनी आँखों से देखा। वह देखकर राजा ने दोनों वीरों से कहा कि मुझे सुबह होते हीं भगवान का नाम लेकर उस खंभे पर बैठा दो। अगली सुबह दोनोंवीरों ने राजा को उस खंभे पर बैठा दिया और भगवान का नाम ले अपने घर को लौट गये। जैसे-जैसे खम्भा बढ़ता राजा में भय लिये हुये उस पर बैठा रहा। सुर्य की गर्मी से जलकर झुलस गया। जब खंभा रथ के बराबर पहुँचा तो सुर्य  ने देखा कि खंभे पर एक मनुष्य झुलसा पड़ा है।सुर्य त्राहि-त्राहि कर बोले- “यह कार्य किसी मनुष्य का नहीं है। यह या तो योगी है या देवता या गंधर्व। इस मुर्दे के रहते मैं इस जगह कैसे भोजन करूं । ” अत: अमृत लेकर उस पर छिड़क दिया ।जिससे राजा भगवान का नाम लेकर उठ खड़ा हुआ। सुर्य को देखकर दण्डवत किया और कहा- “धन्य मेरे भाग और मेरा कुल ,  जो आपके दर्शन हुये। मैंने जरूर अच्छे कर्म किये हैं जो आपके दर्शन हुये।”  सुर्य ने कहा- “तुम कौन हो? तुम्हारा क्या नाम है? अपना परिचय दो।”

तब राजा ने कहा- “हे सुर्य देव! अंबावती नगरी के राजा गंधर्वसेन का मैं पुत्र हूँ।मेरा नाम विक्रम है। आपकी कथा मैंने एक ब्राह्मण के मुख से सुनी थी ।तब मुझे दर्शन की इच्छा हुई और मैं यहाँ पहुँचा। पहुँचा। मेरेलिये कोई आज्ञा हो तो बतायेबतायेतब मैं विदा लूँ।”

सुर्यदेव ने राजा की बात सुनकर उसे अपने कुण्डल उतारकर दिये और कहा तू निडर होकर राज कर। । सुर्यका रथ आगे बढ़ गया और खंभा भी धीरे-धीरे घटने लगा। जब राजा अकेला रह गया तो दोनों वीरों को याद किया । दोनों वीर के साथ जब वे अपने नगर के पास पहुँचे तो रास्ते में उन्हें एक गुंसाई मिला। उस योगी ने योग के बल से राजा को कहा‌ -“राजा! जो कुण्डल आप सुर्य के पास से ले के आये हो उसे दान कर दीजिये और अपना यश बढ़ाइये।” राजा ने उससे कहा- “ऐसा योग तुमने कब कमाया।” गुंसाई ने कहा- “कमाया तो नहीं, लेकिन सुना है कि राजा विक्रम बहुत बड़ा दानी है।” राजा ने हँसकर वह कुण्डल गुंसाई को दे दिया। गुंसाई अपने घर को लौट गया। राजा भी अपने महल को चला गया।

कामंदकला यह कहानी सुनाकर कहने लगी- “राजा! तुझमें इतनी शक्ति हो तो इस सिंहासन पर बैठ। ” पुतली की यह बात सुन राजा उदास हो अपने कक्ष की ओर लौट गया। अगले दिन राजा फिर सिंहासन की ओर बढ़ा और पुरोहित वररूचि से कहा- “आज मैं पुतली के कहने पर भी नहीं रूकूँगा।” जैसे हीं राजा सिंहासन की ओर बढ़ा सातवीं पुतली कामोदी बोली-

सातवीं पुतली कामोदी

सातवीं पुतली कामोदी राजा के पैर के पास आ पड़ी। राजा यह देखकर अपने पैर पीछे खींच लिया और बोला- “तू मेरे पैर पर आ कर क्यूँ गिरि? ” तब सातवीं पुतली कामोदी ने कहा – “हम सतयुग की अबला ठहरीं और तुम कलयुग के राजा। हमने एक मर्द के सिवा किसी दूसरे का मुँह नहीं देखा।विश्वकर्मा ने हमारी रचना की और हमें राजा बाहुबल के पास रख दिया। जब राजा बाहुबल ने जब सिंहासन विक्रमादित्य को दिया, तब हम सब भी  विक्रमादित्य के पास जा पहुँची। उससे जब बिछड़ी तब से सुख नहीं देखा। जो उस राजा के बराबर हो, वही इस सिंहासन पर बैठे।”

तब राजा ने पूछा- “कैसा था तुम्हारा राजा विक्रमादित्य ? बताओ” तब पुतली बोली- “सुन राजा! विक्रम की कथा।”

एक रात राजा विक्रमादित्य अपने महल में सो रहा था। पूरा देश निश्चित्त हो सोया हुआ था। हर तरफ शांति छायी हुई थी। तभी राजा के कानों में किसी स्त्री की दहाड़ मार कर रोने की आवाज सुनाई पड़ी। राजाने सोचा कौन दुखियारी इतनी रात को रो रही है? मेरे राज्य किस-को कष्ट है? यह सोचकर राजा उठा और आवाज की दिशा में चल पड़ा। चलते-चलते दरिया के किनारे पहुँचा । आवाज दरिया के दूसरी तरफ से आ रही थी। सो, राजा ने दरिया को तैर कर पार किया और उस स्त्री के पास पहुँचा। वह स्त्री अभी भी रो रही थी। राजा ने पूछा- “तुझे क्या कष्ट है ? पुरुष का वियोग है? या पुत्र शोक? या सौत का दु:ख? इन दु:खों में से कौन-सा दु:ख तुझे है? जो कष्ट तुझे है वह मुझे बता?”

तब उस स्त्री ने राजा से कहा- “हे राजा! मेरा पति चोरी करता था इसलिये शहर के कोतवाल ने उसे शूली पर चढ़ा दिया। मैं उसे कुछ भोजन खिलाना चाहती हूँ, लेकिन शूली बहुत ऊँचाई पर है और मैं वहाँ नहें पहुँच सकती। इस कारण से रो रही हूँ।”

तब नृपति ने कहा- “इतनी छोटी-सी बात के लिये तू क्यों रोती है। मेरे काँधे पर चढ़कर उसे भोजन करा दे।” तब वह कंकालिन राजा के काँधे पर चढ़ गई और अपने पति को भोजन कराने लगी। लगी।तब रक्त राजा के बदन पर गिरने लगा। लगा। राजा समझ गया कि यह मनुष्य नहीं है कोई और है। इसने मुझे धोखा दिया है। है।यह सोचकर राजा ने पूछा- “ओ स्त्री! तेरे पति ने भोजन किया या नहीं? ” कंकालिन ने उत्तर दिया- “रूचि से खाया। अब इसका पेट भर गया। तू मुझे नीचे उतार दे।” राजा के काँधे से उतरकर कंकालिन बोली- “राजा ! तुझे जो चाहिये वह मुझसे माँग। ।मैं कंकालिन हूँ। मुझसे डर मत। ” राजा ने कहा- “मैं क्यों डरूँगा और क्या मागूँगा? मैंने तो तुम्हारी सहायता की है।” कंकालिन ने कहा- “तू यह मत सोच की तूने क्या किया और क्या न किया। किया।जो तेरी इच्छा हो वह माँग ले।” तब राजा ने कहा- “मुझे अन्नपूर्णा चाहिये।”

वह बोली- “अन्नपूर्णा मेरे छोटी बहन है। तू मेरे साथ चल, मैं तुझे अन्नपूर्णा दूँगी।” इसके बाद दोनो वचन बद्ध हो साथ-साथ चल दिये। आगे-आगे कंकालिन पीछे-पीछे राजा। कहलते-चलते नदी के किनारेएक मंदिर के पास पहुँचे। वहाँ पर कंकालिन ने दरवाजे के आगे ताली मारी। ताली मारते हीं अन्नपूर्णा वहाँ प्रकट हुआ। उसने कंकालिन से पूछा- “यह भूपाल कौन है? ”  कंकालिन बोली- “यह राजा विक्रम है। इसने मेरी सहायता की है। मैंने इससे वचन हारा है। यदि तुम्हारे मन में मेरे प्रति प्यार हो तो इसे अन्नपूर्णा दे दो।” तब हंसकर अन्नपूर्णा ने एक थैली राजा को दी और कहा- “इससे जितनी खाने की वस्तु माँगोगे वह तुम्हें मिल जायेगी।” राजा वह थैली ले खुशी-खुशी दरिया के किनारे पहुँचा स्नान-ध्यान कर महल की ओर चल पड़ा । इतने में राजा ने एक ब्राह्मण को आते देखा। उस ब्राह्मण को राजा ने बुलाया और कहा- “कुछ खाओगे।” ब्राह्मण ने कहा- “हाँ।” राजा ने पूछा- “क्या खाओगे?” तब ब्राह्मण ने कहा- “इस समय यदि पकवान मिल जाये ।”  राजा अपने मन में सोचने लगा यदि थैली से पकवान नहीं निकला तो मैं ब्राह्मण के पास झूठा बन जाऊँगा। यह सोचते हुये थैली में हाथ डालकर निकाला तो देखता है कि उसमें से पकवान निकले। पकवान खा कर ब्राह्मण अति प्रसन्न हुआ।उसके बाद उसने राजा से कहा- अब दक्षिणा दो। राजा ने कहा- “ब्रह्मण! आप जो माँगेगे , मैं दूँगा।” ब्राह्मण ने कहा- “तो यह थैली मुझे दे दीजिये।” राजा ने वह थैली दक्षिणा के रूप में उस ब्राह्मण को दे दी और महल लौट आया।

आया।इतनी कथा कहकर पुतली कामोदी ने राजा से कहा- इतनी मेहनत से थैली पाई लेकिन दान देने में एक पल न लगाया। यदि तू इतना बड़ा दानी और साहसी है तो सिंहासन पर बैठ । वह दिन भी निकल गया। अगले दिन पुष्पावती नामकी आठवीं पुतली ने राजा को रोका।

आठवीं पुतली पुष्पावती

पुष्पावती नामकी आठवीं पुतली ने राजा को रोका और बोली- “हे राजा भोज! इस सिंहासन पर बैठने की आशा छोड़ दे।” तब राजा ने कहा- “मैं किस तरह छोड़ दूँ।” तब पुतली ने कथा शुरु की- एक दिन राजा विक्रमादित्य अपने दरबार में बैठे थे। सभा चल रही थी। तभी एक बढ़ई दरबार में हाजिर हुआ। उसने राजा को प्रणाम किया और कहा- “महाराज! मैं आपके दर्शन को आया हूँ और एक घोड़ा आपके लिये लाया हूँ।  ”  राजा ने बढ़ई को दरबार में घोड़ा लाने को कहा। बढ़ई घोड़ा लेकर आया। राजा ने बढ़ई से पूछा- “इस घोड़े के गुण बताओ।” बढ़ई  बोला- “महाराज! यह न कुछ खाता है, न पीता है। लेकिन जहाँ ले जाना चाहो वहाँ जा सकता है। दरियाई घोड़े के बराबर है।” घोड़ा एक जगह न ठहरता था, इधर-उधर भाग रहा था। राजा उस घोड़े को जितना देखता उस पर रीझता जाता।

आखिर पसंद कर बोला, इसे मैदान में घुमाकर दिखाओ। बढ़ई  घोड़े को लेकर मैदान में पहुँचा। राजा भी दरबारियों के साथ मैदान के पास पहुँच गये। बढ़ई ने जैसे घोड़े को कोड़े लगाए वह ऐसा दौड़ा कि किसी को नजर न आये। घोड़े के गुण देखकर राजा ने दीवान को आज्ञा दी कि बढ़ई  को घोड़े के बदले एक लाख रूपए दिये जाएँ। दीवान ने अर्ज किया- “महाराज ! काठ के घोड़े के लाख रूपए मुनासिब नहीं।  ” तब राजा ने कहा- “ठीक है। दो लाख रूपए दो।” दीवान ने चुप होकर दो लाख बढ़ई  को दे दिया और समझ गया यदि मैं कुछ कहूँगा, तो राजा और अधिक रूपए दे देंगे। बढ़ई  ने घोड़े को अस्तबल में बाँध दिया और राजा से कहा कि इस पर सवार होकर भूल से भी कोड़े न लगाए।उसके बाद वह अपने घर को चला गया।

कहते हैं किस्मत का लिखा हो कर रहता है। होनी को कोई नहीं टाल सकता।कई दिन बीत जाने के बाद राजा ने घोड़े को मँगवाया और अपने दरबारियों को कहा कोई इस पर चढ़ कर बताए। लेकिन डर के मारे कोई उस घोड़े पर बैठने को राजी न हुआ। तब राजा ने कहा घोड़े को सजाकर लाओ। सभी उसे सजाने में लग गये। घोड़े को सजाकर लाया गया। गया।तब राजा उस घोड़े पर सवार हो हाथ फेरने लगा, वह चाहता था कि उस पर काबू कर ले।पर घोड़ा एक जगह न ठहरता इधर-उधर टहल रहा था। राजा खुशी के मारे बढ़ई की बात भूल गया और घोड़े को कोड़ा लगाया। चाबुक लगाते हीं  घोड़ा हवा से बातें करने लगा ।राजा को लेकर समुद्र पार किसी घने जंगल में दरख्त के ऊपर से गिरा। राजा की हालत मृतक सी हो गई। गई। जब होश आया तो सोचा किस्मत मुझे कहाँ ले आई, राज-पाट, अपने-पराये सब छूटे । अब आगे क्या होता है भगवान हीं जाने। यह सोच कर वहाँ से आगे को चला। आगे एक अंधोयारे वन में पहुँचा जहाँ कुछ दिखाई नहीं दे। बस हिंसक जानवरों की आवाजें सुनाई पड़ती थीं। उस घने वन से जैसे-तैसे चल्ते हुये पंद्रह दिनों के बाद एक तरफ जा निकला।

वहाँ एक नजारा देखा कि एक हवेली  है और उसके बाहर एक बड़ा दरख्त। ।दरख्त के दोनों ओर एक-एक कुँआ। उस दरख्त पर एक बंदरिया बैठी थी। कभी ऊपर चढ़ती कभी नीचे उतरती। राजा छिपकर यह देख रहा था। इतने में राजा की निगाह ऊपर पड़ी , तो देखा उस हवेली में एक मकान  है । राजा दूसरे दरख्त पा चढ़ कर देखने लगा तो देखता है कि उस मकान में एक पलंग बिछा है। वहाँ पर सभी ऐशो-आराम के सामान मौजूद हैं। तब राजा ने सोचा कि अभी जाहिर होने का समय नहीं है। कुछ समय और प्रतीक्षा करता हूँ। पहले पता कर लूँ कि कौन यहाँ आता है और कौन जाता है।

जब दोपहर हुआ, तब एक सिद्ध वहाँ आया। बाईं  तरफ वाले कुँए से एक कलश जल निकाला । उसी समय वह बंदरिया वहाँ आ गई। सिद्ध ने एक चुल्लु पानी उस बंदरिया के सर पर डाला। पानी पड़ते हीं वह बंदरिया एक रूपवती स्त्री बन गई। गई। उस रूपवती स्त्री के साथ सिद्ध ने सुख भोगा। तीसरा पहर होने पर सिद्ध ने दाईं  तरफ वाले कुँए से एक कलश जल निकाला और एक चुल्लु पानी उस रूपवती स्त्री के सर पर डाला । इस बार वह रूपवती स्त्री फिर-से बंदरिया बन गई। गई।बंदरिया बन दरख्त पर चढ़ बैठी। सिद्ध भी पहाड़ की गुफा में जाकर योग करने लगा।

इसके बाद राजा वहाँ पर गया और चतुराई से बायें कुँए से जल निकाल बंदरिया पर डाल दिया। बंदरिया फिर से रूपवती स्त्री बन गई। राजा को देखकर दूसरी ओर मुँह करके बैठ गई। राजा से बोली-“मुझे ऐसे ना देखो। मैं तपस्विनी हूँ । मेरा शाप तुम्हें लग जायेगा और तुम भस्म हो जाओगे। ” राजा ने कहा- “मैं वीर विक्रमादित्य हूँ। मुझे शाप नहीं लगेगा। मेरे हुक्म में ताल-वैताल हैं। ” राजा विक्रमादित्य का नाम सुनकर वह रूपवती स्त्री राजा के चरणों में गिर पड़ी और बोली-“तुम नरेश हो। हो।मेरी बात सुनो। तुम यहाँ से जाओ। अभी यती आयेगा । तुम्हें और मुझे दोनों को शाप देकर जला देगा।” तब राजा ने कहा- “यदि मैं उसके सामने नहीं जाऊँगा, तो वह मेरा कुछ नहीं कर सकेगा। पर स्त्री हत्या से नरक भोगना होता है।” फिर राजा ने उस स्त्री से पूछा- “उस सिद्ध ने तुझे कहाँ पाया? ” स्त्री बोली- “कामदेव मेरे पिता हैं और पुष्पवती माता। जब बारह वर्ष की हुई तब उन्होंने मुझे एक आज्ञा दी जो मैंने नहीं मानी। इसी अपराध की वजह से माता-पिता ने मुझे क्रोधवश इस सिद्ध को दे दिया। सिद्ध ने मुझे अपने वश में कर लिया और इस वन में बंदरिया बना दरख्त पर बैठा दिया। एक वर्ष से मैं इस वन में पड़ी हूँ। सब किस्मत का लेख  है जिसे कोई नहीं मिटा सकता।”

राजा ने कहा- “मेरा मन चाहता है कि मैं तुझे अपने महल ले चलूँ।”  तब उस स्त्री ने कहा- “मेरा मन भी करता है। पर तुम्हारा देश तो समुद्र के पार है।”  राजा ने कहा- “उसकी चिंता मत करो।तुम महल में पहुँच जाओगी और पता भी नहीं चलेगा।” तब स्त्री ने कहा- “एक विनती है । सुना है तुम बहुत बड़े दानी हो कही मुझे ही दान न कर दो। मैं दासी होकर आपकी सेवा करूँगी।” राजा ने कहा- “यह कभी नहीं हो सकता। अपनी नारी पर पुरुष को देना धर्मविरूद्ध  और लोकविरूद्ध है।” इस प्रकार से दोनों बातें करने लगे और रात बिताई। सुबह होते हीं राजा ने स्त्री को फिर से कुँए के पानी से बंदरिया बना डाला। बंदरिया दरख्त पा जा बैठी और राजा वृक्ष पर छिप गया।

दोपहर को सिद्ध आया । जब योगी जाने लगा तब बंदरिया ने कहा – “महाराज! एक विनती है कुछ प्रसाद मुझे दीजिये।” यह सुन योगी ने एक कमल उसे दिया और बोला यह कभी मुरझायेगा नहीं और हर रोज इससे एक लाल पैदा होगा। इसे यत्न से रखना। उसके बाद योगी गुफा में चला गया।राजा आया और बंदरिया को फिर से स्त्री बना दिया। स्त्री ने राजा को वह कमल दिखाया और उसके गुण बताये। रात बीतते हीं उस कमल से एक लाल पैदा हुआ। दोनों ने यह चमत्कार देखा। तब राजा ने कहा- “अब यह स्थान हमें छोड़ना होगा।”  यह कह कर राजाने अगिया और बैताल को याद किया। दोनों वीर हाजिर हुये और पलक झपकते हीं उन्हें नगर के बाहर पहुँचा दिया। इधर योगी जब लौटा तब बंदरिया को न पाकर हैरान हुआ।

जब राजा अपने महल की ओर जा रहे थे , तो देखा एक खूबसूरत लड़का अपने दरवाजे पर खेल रहा है। राजा के हात में कमल का फूल देखकर रोने लगा और फूल लेने की जिद करने लगा। राजा ने वह फूल उसे दे दिया। लड़का फूल ले हँसता हुआ अपने घर में चला गया। राजा भी उस स्त्री के साथ अपने महल को आ गये। जब सुबह हुआ तो कमल से एक लाल गिरा। लड़के के पिता ने यह देखा और लाल को रख लिया और कमल फूल को छिपा दिया। इसी प्रकार से जब उस लड़के के पिता के पास बहुत से लाल होगयेतो वह उन्हें बेचने निकला। कोतवाल ने उस लड़के के पिता को पकड़ लिया और बोला – “तू तो बनिया है। तूने यह लाल कहाँ से चोरी किया। सच बता।” उसने कहा- “यह मेरे घर के हैं।” पर कोतवाल ने उसकी न सुनी और उसे राजदरबार में हाजिर किया। राजा ने उस बनिये से कहा- “मुझे सच-सच बताओ। झूठ कहोगे तो देश निकाला और सच कहोगे तो और धं। ” बनिये ने सारी सच्चाई राजा को बता दी कि उसके लड़के को किसी ने कमल का फूल दिया ये लाल उसी से निकले हैं। । राजा सच सुनकर प्रसन्न हुआ और कहा कि कोतवाल ने गलत किया है जो एक नेक को पकड़ लाया। कोतवाल को दंड के रूप में एक लाख बनिये को देने का हुक्म दिया।

यह कह पुतली बोली- “सुन राजा भोज! वीर विक्रमादित्य के गुण और धर्म ।  तू ऐसे राजा को अपने से कम समझता है।” राजा उस दिन भी पछता के रह गया। गया।दूसरे दिन राजा सिंहासन के पास पहुँचा और पुतली से बोला- “तू खुश तो है। तुझसे कथा सुन कर मुझे खुशी होती है।” यह सुन नवीं पुतली मधुमालती बोली‌

नवीं पुतली मधुमालती

नवीं पुतली मधुमालती बोली‌- “मै एक दिन की कथा सुनाती हूँ। एक बार राजा विक्रमादित्य ने यज्ञ करना आरंभ किया। राज्य के सभी ब्राह्मणों को बुलाया गया। सभी प्रजा उस यज्ञ में उपस्थित हुये। देश-विदेश के राजा-महाराजा भी उस यज्ञ में पधारे। जितने देवता थे, वे सब भी पधारे। ” यज्ञ आरम्भ हो गया। राजा ने यज्ञ के मंत्र पढ़ने शुरु कर दिये थे कि एक बूढ़ा ब्राह्मण वहाँ पहुँचा। राजा ने ब्राह्मण को मन-हीं-मन दंडवत किया।  उस ब्राह्मण को आगम विद्या से यह मालूम हो गया अत: उसने आशीष दिया कि चिरंजीवी हो। यज्ञ समाप्त कर राजा ने उस ब्राह्मण से कहा कि आपने मंद काम किया जो बिना पैर लागे मुझे आशीष दिया। ब्राह्मण ने कहा जैसे ही तुमने मन में मुझे दंडवत किया मुझे पता लग गया और मैंने आशीष दिया। तब राजा ने ब्राह्मण को लाख रूपये दिये। ब्राह्मण ने राजा सेकहा- “महाराज इतने से मेरा निर्वाह  नहीं होगा। ऐसा इंतजाम कर दीजिये जिसमें मेरा काम हो।” तब राजा ने उस एपाँच लाख रूपये दिये। ब्राह्मण प्रसन्न हो अपने घर को गया। उस यज्ञ में जो भी उपस्थित थे उस एराजा ने यथोचित सत्कार और दान दिये।

पुतली ने कहा- मैंने इसलिये तुमसे यह कथा कही कि सिंहासन के बैठने के योग्य नहीं है। सिंह की बराबरी सियार नहीं कर सकता और हंस की बराबरी कौवे से नहीं होती। बंदर के गले में मोती की माला नहीं शोभती। यह सुनकर  राजा चुप रहा और वह दिन भी बीत गया। रात बीतीऔर सुबह जब राजा सिंहासन के पास पहुँचा तो दसवीं पुतली प्रेमवती हँसती हुई बोली।

दसवीं पुतली प्रेमवती

दसवीं पुतली प्रेमावती हँसती हुई बोली- हे राजा! पहले मुझसे यह कथा सुन, फिर इस पर बैठना। राजा ने कहा- “सुना । मैं भी तुम्हारी कथा सुनना चाहता हूँ।” राजा वहीं आसन बिछाकर बैठ गया और प्रेमावती कहने लगी- वसंत ऋतु था। मोर नाच रहे थे। कोयल कूक रही थी। थी।मंद-मंद हवा बह रही थी। राजा विक्रमादित्य अपने बाग में झूला झूल रहे थे। इतने में एक वियोगी भूला-भटका वहाँ पहुँचा, राजा के चरणों में गिर पड़ा और कहने लगा- “स्वामी! मैंने बहुत दु:ख पाया है और अब आपकी शरण में आया हूँ।” उस वियोगी का शरीर सूख कर काँटा हो चला था। जैसे उसने कई दिनोंसे कुछ खाया न हो।

राजा ने उसे धीरज बँधाया और कहा- “अब यहाँ आ गये हो तो अपनी कथा बताओ। बताओ।किस कारण से तुम्हारी यह गति हुई है? तुम किस देश से आये हो और तुम्हारा नाम क्या है? ” तब उस वियोगी ने आह भरते हुये कहा- “कलंजर देश है मेरा। मैं मतिहीन और दुर्बुद्धि हूँ।  एक यती ने मुझसे कहा कि एक रूपवती युवती एक जगह है मानो कामदेव से पैदा हुई हो। लाखों राजा उसके पास जाते हैं।जल-जल जाते हैं  पर उसे नहीं पाते हैं।” राजा ने पूछा- “किसलिए जल जाते हैं? ” तब वह वियोगी सच्चाई बताने लगा- “उस युवती के पिता ने आग जला रखी है और उस आग पर कड़ाह भरकर घी खौलाया हुआ है।  उसकी यह शर्त है कि जो उस खौलते घी से भरी कड़ाही में स्नान कर जीवित बच जायेगा, उसी से अपनी पुत्री का विवाह करेगा। वहाँ लाखों राजा आते हैं और कुछ पछताकर लौट जाते हैं , तो कुछ प्राण गँवा देते हैं। यह बात सुनकर मैं भी वहाँ गया। उस युवती को देखकर अपनी सुध-बुध खो कर यह शक्ल बनाई है। ” यह बात उस वियोगी से सुनकर राजा ने कहा- “आज तुम विश्राम करो। खाना खाओ। कल हम और तुम वहाँ चलेंगे । तुम्हें वह युवती दिलवायेंगे।” जब उस वियोगी ने स्नान कर भोजन कर लिया तब राजा ने नगर की सभी नर्तकी को बुलाया और मुजरा करने को कहा। उस वियोगी से कहा –“तुम्हें इनमें से जो भी पसंद हो उसे अपने साथ ले जाओ।”

वियोगी ने कहा- “सिंह अगर सात दिन भी उपवास करे तो भी घास नहीं खाता। मुझे उस युवती के सिवा कोई और की इच्छा नहीं। ”  इस प्रकार से वह रात बीत गई। राजा सुबह स्नान कर तैयार हुआ और अपने दोनों वीर असिया और वैताल को याद किया। दोनों उसी क्षण हाजिर हुये। वियोगी के बताये हुये स्थान पर राजा को ले गये। राजा ने उस युवती के पिता के शर्त के अनुसार घी के खौलते कड़ाही में छलांग लगा दी। राजा कूदते हीं जल कर राख हो गया। वैताल यह देख रहा था, उसने तुरंत राजा पर अमृत डाला जिससे राजा जीवित हो गया। राजा को जीवित देखकर सभी लोग जय-जयकार करने लगे। उस राजकन्या ने राजाकेगले में हार डाल दिया। वहाँ उपस्थित सभी लोग कहने लगे यह जरूर कोई अलग तरह का है। जो जलकर भी जीवित बच गया।  राजकन्या के पिता ने राजा को बहुत-सा धन देकर विदा किया। राजकन्याने भी राजा को कहा-“तुम धन्य हो। जो मुझे बचा लिया। न हीं तो मेरे पिता ने ऐसी शर्त रखी थी कि मै इस पाप से कभी नहीं बचती और अनब्याही रह जाती। ”  राजा उस राजकन्या के साथ अपने राज्य को लौट आया।

इतनी कथा कह प्रेमावती ने राजाभोज से कहा- “राजा सुन ।इतनी कठिनता से राजकन्या को लाया। लेकिन  आते हीं वियोगी को सारी दौलत के साथ राजकन्या सौप दी। स्वयं अपने महल को चला गया। तुमसे ऐसा साहस न हो सकेगा।” यह सब बातें राजा सुनता रहा और वह मुहुर्त भी बीत गया। अगली सुबह राजा जैसे हीं सिहासन के पास पहुँचा कि  ग्यारहवीं पुतली पद्मावती बोल उठी-

ग्यारहवीं पुतली पद्मावती

ग्यारहवीं पुतली पद्मावती बोल उठी- हे राजा ! पहले मेरी कथा सुन। एक दिन राजा विक्रमादित्य उज्जैन नगरी को गया। अपने सभी आदमियों को विदा कर सो रहा था कि  उत्तर दिशा की ओर से एक स्त्री के आवाज सुनाई पड़ी- “कोई ऐसा है जो मेरी आ कर खबर ले। इस पापी से मुझे बचाये और मुझे जीवन दान दें। ” इसी तरह से थोड़ी-थोड़ी देर पर वह स्त्री पुकार लगा रही थी। उसकी पुकार सुन राजा ढ़ाल और तलवार ले आवाज की दिशा में चल पड़ा । वन में पहुँच कर देखा कि एक सुंदर स्त्री पुकार रही है। वहीं एक दानव खड़ा है और उस स्त्री से भोग माँग रहा है। उस स्त्री के मना करने पर सर के बाल पकड- कर भूमि पर पटक दे रहा है। राजा यह देख कर उस दानव से बोला- “ओ पापी! तू इस स्त्री को क्यूँ मारता है। तुझे नरक का डर नहीं? ” राजा की बात सुनकर वह दानव फिर से उस स्त्रीको मारने लगा।तब राजा ने कहा-“तू इस स्त्री को छोड़ दे नहीं तो मैं तुझे मार डालूँगा।” राजा का वचन सुनकर वह दानव स्त्री को छोड़कर राजा की ओर लपका और बोला- “भाग जा। वरना मैं तुझे खा जाऊँगा। तू कौन है? जो यहाँ आकर बातें बनाता है।” तब राजाने गजब की फुरती दिखाते हुये उस दैत्य के सर को धड़ से अलग कर दिया। सर के अलग होते हीं उसमें से रूंड- मूंड दो वीर निकले । दोनों राजासे लिपट गये। उन दोनों में से एक को राजा ने मार डाला और दूसरा रात भर राजा से लड़ता रहा। सुबह होते ही दूसरा वहाँ से भाग गया। तब राजाने उस स्त्री से कहा-“ अब तुम जल्दी से मेरे साथ चलो। और मन में शंका न करो। वह राक्षस अब नहीं आयेगा। मेरे डर से भाग गया है।  ” तब उस सुंदर स्त्री ने कहा- “सुनो नरेश!मैं सातों द्वीप और नौखंड पृथ्वी जहाँ पर भी भागकर छिपूँ, उससे बच नहीं पाऊँगी। उससे बच नहीं सकती। उसके बिना मेरी जिंदगी न होगी। उसके पास एक मोहनी पुतली है, वह उसके पेट में रहती है। उसके बल से वह मुझे ढ़ूँढ़ लेगा। लेगा। और उस पुतली में यह ताकत है कि एक दैत्य मारने से चार पैदा हो जाते हैं।  ”

उस स्त्री की यह बात सुनकर राजा उसी वन में छिपकर रह गया। रात होते हीं वह दैत्य फिर आ गया ।उस स्त्री को मारने लगा। स्त्री फिर पुकार कर रोने लगी। उसकी आवाज सुनते हीं राजा उस दैत्य से लड़ने लगा। वह दैत्य भी राजा से युद्ध करने लगा।  लड़ते-लड़ते राजा ने ऐसा तलवार मारा कि उस दैत्य का सर धड़ से अलग। उस दैत्यके धड़ से मोहिनी निकली और चल दी अमृत लाने। राजाने अपने दोनो वीर अगिया-वैताल को याद किया और आज्ञा दी मोहिनी कहीं न जानेपाये। दोनों ने उस मोहिनी की चोटी पकड़ कर राजा के सामने पेश किया।

राजा ने उस मोहिनी से कहा- “तू चंपकवरणी, मृगनयनी, गजगामिनी, कटिकेसरी, चंद्रमुखी,हँसे तो फूल झड़ते हैं और सुंगध पर भँवरे मंडराते हैं। तू  इस दैत्य के पेट में क्यों रह रही थी?   ”

उस मोहिनी ने कहा- “सुन राजा! पहले मै शिवगण थी। पर एक आज्ञा चूक जाने के कारण शापवश मोहिनीरूप बन गई। इस दैत्य ने शिवकी बहुत तपस्या की और भगवान शिव ने प्रसन्न हो कर मुझे इस दैत्य को दे दिया।फिर इस पापी ने मुझे अपने पेट में रख लिया। शिव की आज्ञा थी कि इसकी सएवा किजियो और जो यह कहे मानियो। इसलिये मैं इसके वश में थी। ” इन दोनों वीरों ने मुझे पकड़ लिया नहीं तो मनुष्य के वश का नहीं जो मुझे पकड़ पाये।तुम भी उपाय करते तो मुझे वश में ना कर पाते। अब इन्होंने मुझे तुम्हारे पास लाया है तो अब मैं तुम्हारे पास हीं रहूँगी। एक वह सुंदर स्त्री और दूसरी मोहिनी दोनों राजा के साथ चल दी।

यह कहकर पद्मावती ने  राजा भोज से कहा- “मोहिनी से राजा ने गंधर्व विवाह किया। आगे का पराक्र्म मैं तुम्हें सुनाती हूँ। ”

उसके बाद राजा विक्रमादित्य ने उस सुंदर स्त्री से पूछा- “सुन सुंदरी! मैं तुझसे पूछता हूँ? दैत्य ने तुझे कहाँ पाया था।तुम्हारे द्वीप और देश का क्या नाम है? तुम्हारे पिता कौन है? अपने बारे में सब बताओ?जैसा तू कहेगी वैसा ही मै विचार करूँगा।  ”

तब वह सुंदर स्त्री बोली- “महाराज !मेरी कथा सुनो। जो कुछ किस्मत में लिखा है उसे भोगना हीं होता है। किस्मत का लिखा मिट नहीं सकता।  समुद्र के पास सिंहलद्वीप है, वहीं पर ब्रह्मपुरी नगर है। उसी नगर के ब्राह्मण की मै बेटी हूँ। एक दिन सखियों के संग तालब पर स्नान करने को गई। उस तालाब के आस-पास घने वृक्ष थे जिससे वहाँ पर सुर्य की रोशनी तक नहीं आती थी। वहीं पर स्नान, पूजा कर मै घर को लौट रही थी कि रास्ते मे वह दैत्य नजर आया। मुझसे भोग माँगने लगा। मैं अनब्याही उसे मना करती तो मुझे दु:ख देने लगा। कितने दिनों से मुझे सता रहा था। तुमने मुझे इस दु:ख से निकाला। निकाला।तुमने मेरे धर्म की रक्षा की और मेरे कुल की लाज रख ली। जैसा तुमने मुझ पर उपकार किया वैसा हीं आशीष मैं तुम्हें देती हूँ।तू हजार वर्ष तक जीता रह। तू किसी के वश में ना पड़े। तेरा यश और कीर्ति बढ़े।” इतना सुनने के बाद राजा ने बेटी कह उस स्त्री को गले से लगा लिया। वैताल को कहा कि अपने महल को ले चले। चले।महल पहुँच कर राजा ने दीवान को आज्ञा दी कि एक सुयोग्य ब्राह्मण को ढ़ूँढ कर लाओ।दीवान मार्कंडेय नामक एक ब्राह्मण को लेकर आया। राजा ने उस ब्राह्मण से कहा-“ब्राह्मण!एक ब्राह्मण कन्या हमारे यहाँ है। आप उसका पाणिग्रहण करें।” ब्राह्मण ने कहा‌ -“तुम कन्यादान करो।और आशीष पाओ।” राजाने उस ब्राह्मणकन्या का विवाह उस मार्कंडेय ब्राह्मण के साथ कर दिया। दोनो को धन-सम्पत्ति देकर विदा किया।

इतना कह पुतली ने राजा भोज से कहा- “तू गुण-ग्राहक है। राजा विक्रमादित्य के जैसा दानीऔरसाहसी नहीं।” राजा चुप रहा। दूसरे दिन बारहवीं पुतली कीर्तिवती बोली‌-

बारहवीं पुतली कीर्तिवती

बारहवीं पुतली कीर्तिवती बोली‌-एक दिन राजा विक्रमादित्य ने अपनी सभा में बैठे हुये कहा – कलियुग में और भी कहीं कोई दाता है?

यह सुनकर एक ब्राह्मण बोला‌ – “हे राजा! प्रजा के हितकारी, तेरे बराबर साहसी और दानी कोई नही। पर एक बात मैं कहना चाहता हूँ। पर शर्म से कह नहीं सकता। ” राजा ने कहा- “सत्य कहने मे कैसी लज्जा। जो भी बात है कहो हम बुरा नहीं मानेंगे।” वह ब्राह्मण बोला- “एक राजा समुद्र के किनारे रहता है और सदा धर्म कार्य करता है। वह सवेरे स्नान करता है, लाख रूपये दान देता है और फिर जल पीता है।यह तो मैंने उसके एक दान की रीत बताई।और भी बहुत कुछ दान करता है।ऐसा राजा धर्मात्मा उसके सिवा दूसरा हमने नहीं देखा।”

यह बात सुनकर राजा के मन में इच्छा हुई की उस राजा को देखे। यह सोचकर दोनों वीर वैताल को बुलाया और तख्त पर सवार हो उस राजा के नगर के पास जा पहुँचा। तख्त से उतरकर दोनों वीर वैताल को कहा तुम देश को जाओ और मैं इस राजा की सेवा करता हूँ। तुम वहाँ से हमारी खबर लेते रहियो। तब वैताल ने पूछा- “इसका विचार क्या है? ” राजा ने कहा- “तुम्हें इन बातों से क्या। जो हम तुम्हें कहते हैं वह करो।” यह बात सुनकर वैताल अपने घर को लौट आये और राजा पैदल-पैदल उस नगर को चल दिया। राजा के महल के पास पहुँच कर द्वारपाल को कहा कि अपने राजा से कहो कि कोई विदेशी तुम्हारी सेवा करने के लिये खड़ा है। राजा के पास जाकर जब द्वारपाल ने यह कहा तो राजा हँसता हुआ आप ही बाहर आ गया । राजा को देखकर विक्रमादित्य ने प्रणाम किया। राजा ने पूछा- “कुशल से तो हो? ” तब विक्रमादित्य ने कहा- “आपकी दया से। ” राजा ने कहा- “तुम किस देश से आये हो? तुम्हारा नाम क्या है? और तुम्हारा अर्थ क्या है? सब सुनाओ । ” विक्रमादित्य बोला- “महाराज! मेरा नाम विक्रम है। मैं वीर राजा विक्रमादित्य के देश का रहनेवाला हूँ। मेरे जी में कुछ वैराग्य इसी से आपके दर्शन को आया हूँ।” राजा बोला- “तुम्हें हम क्या रोज कर दें। जिससे तुम्हारा निर्वाह हो जाये।” विक्रमादित्य ने कहा- “चार हजार रूपये में मेरी गुजर होगी।” यह सुन राजा ने कहा- “ऐसा क्याकाम करते हो ? जो चार हजार रूपये रोजाना हम तुम्हें दे।” विक्रमादित्य बोला- जो काम हमसे कहोगे, हम वह काम करेंगे।जिस राजा के पास मैं रहता हूँ उसके मुश्किल के समय काम आता हूँ।

इस प्रकार से चार हजार रूपये रोजाना के लेकर विक्रमादित्य वहाँ रहने लगा। लगा।नौ-दस दिन बीत जाने पर विक्रमादित्य ने सोचा कि जो लाख रूपये रोज दान करता है उसका नितनेम क्या है? इसे पता करना चाहिये । किस देवता का बल है? इसी सोच में रहने लगा। एक दिन देखता है कि रात के दो पहर बीत जाने पर राजा वन को जा रहा है। यह देख विक्रमादित्य भी उसके पीछे हो लिया।आगे- आगे राजा पीछे-पीछे विक्रमादित्य । इस प्रकार दोनो शहर से निकल वन को पहुँच गये।  उस वन में देवी के मंदिर के आगे एक कड़ाह में घी खौल रहा है। वह राजा तालाब में स्नान कर देवी के दर्शन कर उस कड़ाह में कूद पड़ा। कूदते ही भून गया। चौसठ योगनियों ने उसका स्वाद लिया। तभी कंकालिन अमृत लेकर आई और उस पर डाला। अमृत पड़ते हीं राजा भगवान का नाम लेकर उठ खड़ा हुआ। तब देवी ने मंदिर से लाख रूपये राजा को दिये। वह लेकर राजा महल को लौट गया।

राजा के जाते हीं विक्रमादित्य उस कड़ाह में कूद पड़ा। कूदते हीं भून गया। चौसठ योगनियों ने विक्रमादित्य  का स्वाद लिया। तभी कंकालिन अमृत लेकर आई और उस पर डाला। अमृत पड़ते हीं विक्रमादित्य भगवान का नाम लेकर उठ खड़ा हुआ। तब देवी ने मंदिर से लाख रूपये उसे दिये।इसी प्रकार से विक्रमादित्य ने सात बार किया । जब आठवीं बार कूदने लगा तो  देवी ने आकर विक्रमादित्य का हाथ पकड़ लिया और कहा – “मांग तुझे क्या चाहिये।” विक्रमादित्य ने हाथ जोड़कर कहा- “मैं मांग लूँ, जो मांग पाऊँ।” देवी ने कहा- “मांग” विक्रमादित्य ने  कहा- “हे देवी! जिस थैली में से तुमने रूपये दिये हैं, मुझे वह थैली चाहिये।” देवी ने हँसते हुये वह थैली राजा विक्रमादित्य को दे दी। थैली लेकर वह शहर को लौट आया।

दूसरी रात राजा जब वन को गया तो देखता है  कि वहाँ न देवी का स्थान है, न कड़ाह है, ना मंदिर है। यह देखकर सोच में डूब गया।और बदहवास हो महल को लौट आया। जब सुबह को दरबार में सब पहुँचे दो देखा राजा विह्वल हो पड़ा है, उसे किसी की सुध नहीं। राजा न हँसता है, न बोलता है, बस एकटक शून्य में देख रहा है। यह देखकर दीवान ने राजा से कहा- “महाराज! आपकी यह दशा देखकर सभी सारी सभा दु:खी हो रही है।” तब राजा ने दीवान से कहा- “आज दरबार का काम तुम सँभालो।” यह कह राजा अपने कक्ष में चला गया। सभी लोग तरह-तरह की बातें करने लगे। इतने में विक्रमादित्य हाजिर हुआ और राजा के पास गया। राजा की हालत देख कर विक्रमादित्य ने पूछा- “महाराज! आपको क्या दु:ख है? मुझे बताये । क्योंकि मैंने कहा था कि मुश्किल समय में काम आऊँगा।” तब राजा ने कहा- “मैं तुम्हें क्या बताऊ? अब मैं अपना प्राण त्याग दूँगा।” विक्रमादित्य ने कहा- “एक बार अपने मन का दु:ख बताओ तो सही।” राजा ने कहा- “एक देवी मेरे पास था। पर मैं नहीं जानता वह कहाँ चली गई। लाख रूपये मुझे रोज देती थी , जिससे मैं नित्य का दान-पुण्य करता था। अब मेरी नित्यक्रिया निभेगी नहीं। ऐसा मैं किसी को नहीं देखता जिससे मेरा नित्य नेम चले। इसलिए अब मैं अपना प्राण त्याग दूँगा। जब धर्म पुण्य नहीं रहेगा तो मेरा जीना व्यर्थ है।”

विक्रमादित्य ने राजा की बात सुनते हीं कहा- “यह मैं करूँगा।” ऐसा कहकर उसनेवह थैली महाराज के हाथ में दी और कहा आप स्नान ध्यान कर अपना नित्य धर्म कीजिये। इस थैली से जितने रूपये चाहेंगे खर्च करे। कभी कम न होगा। होगा।यह सुनते ही राजा उठ बैठा ,दीवन को बुलाकर रूपये दिये और रोज की तरह दान करनेका हुक्म दिया। दीवान आज्ञा पाकर अपने कार्य को करने चल पड़ा।

तब विक्रमादित्य ने राजा से कहा- “महाराज! अब मुझे भी आज्ञा दीजिये। मैं अपने देश को जाऊँ।” तब राजा ने कहा- “हम तुम्हारे गुण कहाँ तक मानेंगे।तुमने मुझे जीवन-दान दिया है। अपने दएश पहुँच कर कुशल-क्षेम का संदेशा भिजवाना । अपना पता ठिकाना बताते जाओ, हम भी तुम्हारी कुशल पता करते रहेंगे।” तब विक्रमादित्य ने कहा- “हे महाराज! मैं राजा वीर विक्रमादित्य हूँ। अंबावती नगरी का राजा। तुम्हारा नाम और यश सुनकर दर्शन की इच्छा थी, इसलिये यहाँ आया।”

यह सुनते हीं राजा , विक्रमादित्य के चरणों में गिर पड़ा और कहने लगा- “बड़ा अपराध हुआ। मैंने तुम्हें नहीं पहचाना। अपनी सेवा करवाई। जैसा धर्म मैंने सुना था वैसा हीं देखा। धन्य हैं तुम्हारे माता-पिता और तुम्हारा कुल।” इतना कहकर राजा ने विक्रमादित्य को तिलक लगा विदा किया। विक्रमादित्य नगर के बाहर आ अपने वीरों को बुलाया और अपने महल को लौट आया।

इतना कह कीर्तिवती ने कहा-“ऐसा था विक्रमादित्य कोई भी वस्तु दान करने में न देर करता।ऐसा दानी और साहसी था विक्रमादित्य। ” राजा यह सुन मौन हो गया और चुपचाप अपनी कक्ष की ओर कहला गया। दूसरे दिन प्रात: फिर सिंहासन के पास पहुँचा लेकिन पैर बढ़ाते हुये झिझक रहा था कि तेरहवीं पुतली त्रिलोचनी बोली-

तेरहवीं पुतली त्रिलोचनी

तेरहवीं पुतली त्रिलोचनी बोली- “सुन राजा भोज! इस सिंहासन पर वही बैठेगा जो विक्रमादित्य के जैसा साहसी और दानी होगा। अत: मेरा कथा सुनो। आगे विचार करना। ” राजा भोज ने कहा- “सुना।”

पुतली त्रिलोचनी ने कथा सुनाया- एक दिन विक्रमादित्य शिकार खेलने को चला। उसके साथ हजारों शिकारी, मंत्री, दरबारी सभी अपने घोड़े पर सवार हो, चल पड़े। सभी ने अपने-अपने हाथ पर शिकारी जानवर बाज, बहरी, जुर्रा, शाहीन, लूरमा बैठा रखे थे। राजा ने भी अपने बाजू पर एक बाज बैठा रखा था। जब सभी वन में पहुँच गये, तब राजा ने आज्ञा दी कि सभी कोई  अपने-अपनी शिकारी जानवर के साथ शिकार करे और मेरे सामने पेश करे , मैं ईनाम दूँगा। यदि कोई शिकार न कर पाया तो नौकरी से जावेगा। मैं बस यह नजारा देखूँगा।

इतना सुनते हीं सभी शिकारी अपने जानवर और झुंड के साथ शिकार को चल दिये। जिसे जो भी शिकार मिलता राजा के सामने पेश करता और ईनाम पाता। ऐसे हीं करते-करते दोपहर हो गई। तब राजा ने भी अपने बाजू के बाज को उड़ाया और घोड़े पर सवार  हो पीछा करने लगा।  दौड़ते- दौड़ते शाम हो गई , और जब पीछे मुड़कर देखा तो कोई भी नजर न आया । बस घना जंगल, लाव-लश्कर , साथी, शिकारी, दरबारी सब पीछे छूट गये। इधर जब सब शिकार कर लौटे और राजा को न देखा तो नगर को लौट गये।

राजा भटकते-भटकते एक नदी के पास पहुँचा। वहीं पर घोड़े को बाँध कर सुस्ताने लगा । तभी देखता है कि नदी उसकी ओर बढ़ती चली आ रही है। राजा जैसे-जैसे पीछे होता नदी बढ़ती जाती। फिर जो निगाह डाली तो देखता है कि नदी के बीच धार में एक मुर्दा पड़ा है , उस मुर्दे के साथ एक योगी और वैताल खींचातानी कर रहे हैं। योगी वैताल से कहता है- तूने बहुत- से मुर्दे खाये हैं। इसे मेरे लिये छोड़ दे। मैं इस पर योग करूँगा। वैताल कहता है‌ – “ मैं अयाना नहीं हूँ, जो तू मुझे फुसलावे। मैं अपना भोजन तुम्हेंक्यों दूँ। ” इसी प्रकार दोनों झगड़ रहे थे और कह रहे थे कि यहाँ कोई तीसरा भी नहीं है जो हमारा न्याय कर सके। फिर योगी ने कहा‌ “कल प्रात: काल हम-तुम सभा में चलेंगे। वहाँ जो भी फैसला होगा। वह तू भी मान लेना और मैं भी।” इतने में दोनों की दृष्टि राजा पर पड़ी । दोनों हँसे और कहने लगे कि नदी के किनारे कोई मनुष्य नजर आ रहा है। वहाँ पर चलो, वही  हमारा न्याय करेगा।

यह कह कर दोनों मुर्दा को घसीटते हुये राजा के पास आ पहुँचे। दोनों ने अपना किस्सा सुनाकर राजा से कहा- “महाराज! तुम धर्मात्मा हो, इसलिये धर्म का विचार कर हमारा न्याय करो।” योगी ने कहा- “मैं जो कहता हूँ, उसे ध्यान से सुनो। इस वैताल ने बहुत –से  मुर्दे खाये और यह मैंने अपने दाव पर पाया है।यह बेवजह मुझसे तकरार कर रहा है। और कहता है- मैं तुझे न दूँगा।मैं इससे विनती करके माँगता हूँ  कि यह प्रसाद मैंने तुझसे पाया है। लेकिन यह नहीं मानता।” तब राजा ने वैताल से कहा- “तू अपना पक्ष बता।” वैताल बोल- “महाराज! यह योगी बड़ा मूर्ख है। जो इसने मुझसे राह में झगड़ा लगाया। मैं हजार कोस से इस को लेकर आया हूँ और यह मुझसे मांग रहा है।है।मैं इसे क्यों दूँ। इसके लिये मैंने बहुत कष्ट झेले हैं। और आहार के समय में यह दुष्ट आ पहुँचा। अब इसका न्याय तेरे हाथ में है। क्योंकि तू धर्मात्मा है। जो तू कहेगा वह मुझे मान्य है। ”

राजा कहने लगा- “तुम दोनों बड़े हो। इस वास्ते पहले हमें कुछ प्रसाद दो , तब हम इसका न्याय करेंगे।” यह सुन योगी ने हँसकर अपने थैली में से एक बटुआ निकालकर राजा को दइया और कहा- “राजा! तुझे जितना धन अभीष्ट होगा, यह बटुआ तुम्हें देगा। देगा।और इसमें से कम न होगा। ” तब वैताल बोला- “राजा! मैं एक मोहिनी तिलक तुझे देता हूँ। तू जब घिसकर इसे लगा लेगा, तब तेरे सामने सब झुक जाएँगे।” दोनों के प्रसाद को राजा ने अपने पास रख लिया और बोला- “सुन वैताल!तू इस मुर्दे को छोड़ दे और मेरे घोड़े को खा ले। यह योगी के हवाले कर दे। इससे तू भूखा भी नहीं रहेगा और योगी का काम भी हो जायेगा।” तब वैताल ने वह मुर्दा योगी को दे दिया और घोड़े को खा कर अपनी भूख शांत की। योगी वह लेकर अपने स्थान को चल दिया।

राजा ने अपने वीरों को बुलाया और नगर के पास पहुँच गया। रास्ते में एक भिखारी आता हुआ दिखा। भिखारी ने राजा को देखा तो कहा- “महाराज! आपके नगर में मैं बहुत दिनों तक रहा लेकिन कुछ अर्थ सिद्ध न हुआ।अब मैं आपसे कुछ माँगता हूँ। मुझे कुछ दीजिये।” यह सुन राजा ने वह बटुआ औ भिखारी को दे दिया और उसके गुण बताये। वह भिखारी राजा को आशीष देते हुये अपने घर को चला गया। राजा भी अपनेमहल को लौट गये।

इसके बाद त्रिलोचनी पुतली ने राजा भोज से कहा- “बता राजा भोज! क्या तू विक्रमादित्य जितना बड़ा दानी और साहसी है।” उसके दूसरे दिन राजा स्नान कर दरबार में पहुँचा । ब्राह्मणों को दान दिये और जैसे ही सिंहासन की ओर बढ़ा कि चौदहवीं पुतली त्रिलोचना बोली-

चौदहवीं पुतली त्रिलोचना

चौदहवीं पुतली त्रिलोचना बोली-पहले मेरी कथा सुन। एक दिन राजा विक्रमादित्य ने अपने प्रधान को बुलाकर कहा कि मैं यज्ञ करूँगा जिससे पुण्य हो और आगे का निस्तार होवे।तब प्रधान ने सुनते हीं सभी देश के राजाओं को निमंत्रण भेज दिया। सभी जगह के ब्राह्मणों को  बुलावा भेजा। पाताल और स्वर्ग में भी बुलावा भेजा गया। एक ब्रह्मण को कहा – आप समुद्र के पास जाओ और मेरी ओर से दण्डवत कर कहना कि राजा विक्रमादित्य ने यज्ञ का आयोजन किया है और आपको नम्रतापूर्वक बुलावा भेजा है।

तब वह ब्राह्मण कई दिनों तक चलते-चलते समुद्र के पास पहुँचा ।।वहाँ पहुँच कर देखता है कि न कोई मनुष्य है और न ही पशु-पक्षी। चारों ओर जल-हीं-जल है ।तब ब्राह्मण सोच में पड़ गया कि राजा का संदेश किसे कहूँ। यहाँ तो कोई दिखाई नहीं देता। चारों ओर बस जल-हीं-जल है। ऐसा विचार कर समुद्र के पास हाथ जो‌ड़कर जोर से बोला- “हे समुद्र देव! हमारे राजा विक्रमादित्य ने यज्ञ का आयोजन किया है और आपको यज्ञ में आने का निमंत्रण दिया है। आप जल्दी पहुँचना।” यह कहकर वह ब्राह्मण वहाँ से चल पड़ा। तब एक बूढ़े ब्राह्मण के रूप में उस ब्राह्मण को समुद्र नजर आया।समुद्र ने ब्राह्मण से पूछा- “मुझे राजा विक्रमादित्य ने किसलिये बुलाया है? ” तब ब्राह्मण ने कहा- “महाराज ने अपने यज्ञ में आपको बुलाया है। ” समुद्र ने कहा- “ठीक है। लेकिन जब मैं यहाँ से चलूँगा, तो रास्ते में जितने भी देश आयेंगे सब जल में डूब जावेंगे। इसलिये मेरी ओर से राजा को विनती कर कहना कि मेरे न आने का पछतावा न करे।मैं नहीं पहुँच सकता। ” यह कह कर समुद्र ने ब्राह्मण को पाँच लाल दिये और एक घोड़ा राजा के लिये सौगात भेजा।

ब्राह्मण  सभी  कुछ लेकर राजा के पास पहुँचा। पाँचों रत्न राजा को दिये और घोड़े को बाँध सारा वृतांत सुनाया। राजा ने प्रसन्न हो पाँचों रत्न और घोड़ा उस ब्राह्मण को दे दिये।

यह कह त्रिलोचना ने कहा- “सुन राजा भोज! यह कथा मैंए इसलिये कही कि तुझे मालूम हो कि राजा दान करने के समय कुछ न देखता था। वे पाँचों रत्न और घोड़े अनमोल थे , लेकिन राजा ने दान देने में देर न की। बता तू ऐसा कर सकता है । पंडित तो तू है,पर वैसा दानी नहीं।”

इस तरह वह दिन भी बीत गया। दूसरे दिन पंद्रहवीं पुतली अनूपवती ने राजा को रोककर कहा‌-

पंद्रहवीं पुतली अनूपवती

पंद्रहवीं पुतली अनूपवती बोली- सुन राजा भोज! हम राजा विक्रमादित्य के गुण कहते नहीं थकते। राजा ने कहा- “सुना। मैं सुनने को आतुर हूँ।” अनूपवती ने कहना आरंभ किया- एक दिन राजा विक्रमादित्य अपने दरबार में बैठा था। तभी वहाँ एक ब्राह्मण आया। उसने एक श्लोक सुनाया सुनाया, वह सुनकर राजा मन में बहुत प्रसन्न हुआ। उस श्लोक का अर्थ यह था कि जब तक सुर्य और चंद्र विद्यमान है तब तक मित्रद्रोही और विश्वासघाती नरक भोगेंगे।

यह सुनकर राजा ने उस ब्राह्मण को एक लाख रूपये दिये और कहा कि – इस का अर्थ विस्तार से कहो। इसका पूरा वृत्तांत बताओ।

तब ब्राह्मण ने कहना प्रारंभ किया- एक राजा बड़ा अज्ञानी था । ।उसके प्राण की आधार उसकी रानी थी। वह सभा में भी अपनी रानी को साथ लेकर बैठता था। शिकार करने को जाता तो उसे भी साथ ले जाता।कहने का तात्पर्य यह कि वह अपनी रानी के साथ ही सोता, जगता, खात, पीता, सभी कार्य में साथ। लेकिन मूर्ख ऐसा कि उसे कुछ भी शर्म नहीं था।

एक दिन उसके प्रधान ने अवसर पाकर हाथ जोड़कर विनय किया – “स्वामी!जो मुझे जीवन-दान दें। तो मैं एक बात कहूँ।”  राजा बोला- “कहो।” प्रधान ने कहा- “महाराज! रानी के साथ आप शोभा नहीं पाते। राज कुल की  मर्यादा और शान जाती है। सभी देश के राजा देख हँसते और कहते हैं राजा के मन में ऐसी सुंदरी बैठी कि एक पल नजर नहीं फेरता। मेरी बात माने तो रानी का एक चित्र बनवाइये  और उसे अपने पास रखिये। इससे लोग लोक-निंदा नहीं करेंगे।”

राजा को प्रधान की यह बात भा गई और उसने एक चित्रकार को ढ़ूँढ़ कर लाने को कहा जो रानी का चित्र बनाये। प्रधान ने एक चित्रकार को बुलाया जो चित्र भी बनाता था और ज्योतिष विद्या का भी पंडित था। था। उसे राजा ने कहा कि रानी का चित्र लिख दे जिसे वह अपने पास रख सके।सके।चित्रकार ने मस्तक झुका कर कहा- “अच्छा । मैं लिख लाता हूँ।” उसके बाद अपने घर को चला गया। घर पहुँच कर उसने रानी की चित्रकारी बनाई, एक-एक अंग जैसा गढ़ा था वैसा हीं। नैन-नक्श, आँख, बाजू, भाव सभी। चित्र लेकर वह राजा के पास पहुँचा।

राजा ने देखा तो बहुत पसंद किया।राजा उस चित्र को देख रहा था, रानी का अंग-अंग साँचे में ढ़ला हुआ था।राजा की दृष्टि देखते-देखते दाईं जांघ पर गईगई, वहाँ पर उसे एक तिल बना दइखा। यह देख कर राजा बहुत घबड़ाया और कहने लगा- “इसने रानी का तिल क्यों देखा। हो-न-हो इसकी रानीसे मुलाकात हुई है।”  इस प्रकार अपने मन में विचार कर प्रधान को कहा कि उस चित्रकार को बुलावा भेजो।

चित्रकार को बुलावा भेजा गया।चित्रकार मन-में बहुत खुश हुआ कि चित्रकारी पसंद आई, आज राजा मुझे ईनाम देगा। शीघ्रता से राजा के पास पहुँच गया। राजा ने उसे देखते हीं जल्लाद को हुक्म दिया कि इसकी गर्दन धड़ से अलग कर दो और इसकी आँखे निकाल कर मेरे पास ले आओ। जल्लद उसे लेकर चल दिया। प्रधान भी जल्लाद के साथ गया। प्रधान ने जल्लाद से कहा कि इस चित्रकार को मुझे दो और हिरण की आँखे निकाल कर राजा के पास ले जाओ। जल्लाद ने   प्रधान के अनुसार राजा के पास हिरण की आँखे पेश की और उस चित्रकार को प्रधान को सौंप दिया।

प्रधान को राजा की तरफ से बहुत क्रोध आया  कि यह राजा तो निरा मूर्ख है। गुणवान पुरुष को कोई फाँसी देता है क्या। यदि गुणी से कोई भूल हो जाये तो उसे देश निकाला दे दो। यही राजाओं का चलन है। पर राजाओं का क्या मुँह पर अमृत और पेट में विष ।राजा कहते कुछ हैं और करते कुछ और।।यही विचार कर प्रधान ने उस चित्रकार को छुपा दिया।

जल्लाद राजा के पास गया और हिरण की आँखे दे कर कहा कि महाराज मैंने उस चित्रकार को मार दिया और उसकी यह आँखे आपके पास लाया हूँ। राजा ने आँख देखकर  आदेश दिया कि इसे संडास मे बहा दे।

कुछ दिन यूँ हीं बीत गये। एक दिन राजकुमार शिकार को वन में गया । वन में भटकते-भटकते उसे एक शेर नजर आया। शेर को देखते हीं राजकुमार के हाथ-पाँव फूल गये।डर के मारे बुरा हाल। सामने एक वृक्ष दिखा, फौरन उस पर चढ़ा। थोड़ा हीं चढ़ पाया था कि उसी वृक्ष पर ऊपर एक रीक्ष नजर अया।अब राजकुमार करे-तो- क्या- करे आगे कुँआ पीछे खाई। उस राजकुमार को देख कर रीक्ष ने कहा – “तू डर मत , तू मेरी शरण में है। मैं तुम्हें नहीं खाऊँगा।” इसी तरह से रात हो गई। तब रीक्ष ने कहा -“नीचे हम दोनों का दुश्मन बैठा है। ऐसा कर हम-दोनों मिलकर आधी –आधी रात रखवाली करेंगे। पहले के दोप पहर तू सो जा और मैं रखवाली करूँगा। फिर बाद के दू पहर मैं सो रहूँगा और तू रखवाली करना।”

यह करार कर राजकुमार पहले के दो पहर में सो गया।जब राजकुमार सो गया तो शेर ने रीक्ष से कहा-“तू क्यूँ मनुष्य पर विश्वास करता है।इसे नीचे फेंक दे, हम-तुम मिलकर इसे खा जायेंगे।अज्ञानी मत बन। यह तो हमारा भक्ष्य है।तू क्यों विष बोता है।तू जब सोयेगा तो यह तेरा सिर काटकर नीचे फेंक देगा।” तब रीक्षने कहा‌ -“सुन अज्ञानी शेर! अपने ऊपर पाप लेना उचित नहीं।जितना पाप राजा को मारने, वृक्ष को काटने, गुरु को झूठ बोलने, विश्वासघात करने से होता है। उतना हीं पाप शरणागत को मारने से होता है। यह महापाप है। यह पाप किसी तरह से नहीं मिटता। क्या हुआ जो मैंने एक जीव न खाया।” तब शेर ने कहा- “तू ने मेरी बात नहीं मानी। इसलिए मैं तुझे जीतानहीं जाने दूँगा। ”

इसके बाद दो पहर बीत गये। रीक्ष के सोने की बारी आ गई। गई।रीक्ष सो गया और राजकुमार पहरा दएने लगा। अब शेर ने राजकुमार से कहा- “जो मैं कहूँ वह सुन। इस रीक्ष की बातो में न आ।जब सुबह यह सो कर उठेगा तो तुझे मारकर खा जावेगा।जावेगा।उसने मुझसे कहा है कि जब मैं सुबह उठूँगा ,तब इस राजकुमार को खा जाऊँगा। इसलिये कहताहूँ कि तू इस रीक्ष को नीचे फेंक दे। मैं इसे खा जाऊँगा और  तू भी सही-सलामत अपने घर को चला जावेगा। ” राजकुमार उस शेर की बातों में आ गया उर जिस डाल पर रीक्ष सोया था उसको जोर से हिलाने लगा। इतने में रीक्ष की आँख खुल गई। वह डाल पकड़ कर बैठ गया और राजकुमार से बोला- “ओ पापी! मैंने तेरी जान बख्शी और तू मतिहीन मेरे को मारने को तैयार है। अब जो मैं तुझे मार कर खा जाऊँ । तो तू क्या कर लेगा।”  यह बात सुनते हीं राजकुमार के प्राण सूख गये और वह समझ गया कि रीक्ष अब मुझे खा जायेगा।

इतने में सुबह हो गई। शेर वहाँ से चला गया। रीक्ष ने राजकुमार के कानों को दूषित कर दिया और बोला- “तुझे जी से क्या मारूँ ? क्योंकि तुझेयहाँ बचानेवाला तो कोई है नहीं। इसलिये असमर्थ समझ कर तुझे छोड़ रहा हूँ।”  इतना कहकर रीक्ष वहाँ से चला गया। राजकुमार वहाँ से गूँगा-बहराहो अपने राजमहल को लौट आया। राजा उसकी दशा देखकर बहुत चिंतित हुआ। रानियाँ  विलाप करने लगी- “भगवान!यह क्या अनर्थ कर दिया। किसी ने इससे छल किया है तभी यह हालत हो गई है। ”

राजा ने प्रधान को आज्ञा दी कि जितने भी वैद्य- गुणी हैं उन्हें बुलाओ और राजकुमार को दिखाओ।प्रधान ने सभी गुणी, पंडित, वैद्य को बुलाया । सभी ने अपने-अपने ओर से यत्न कर के देख लिया लेकिन राजकुमार को कुछ भी आराम न मिला। सभी ने राजा के सामने हाथ जोड़ लिये कि हमारे से कुछ नहीं हो पाया। यह देखकर प्रधान ने राजा से कहा- “महाराज! मेरे पुत्र की बहू बड़ी गुणी है। यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं उसे बुलावा भेजूँ। ईश्वर की कृपा होगी तो राजकुमार को कुछ आराम हो जावेगा।और कोई उपाय नहीं है। ”  

राजा ने कहा- “तेरे पुत्र की स्त्री क्या जाने? ” प्रधान ने कहा- “वह बहुत बड़े योगी कि शिष्या रह चुकी है। उसे मंत्र-तंत्र सभी आते हैं।” राजा ने आज्ञा दे दी। प्रधान अपने घर को गया। वहाँ उसने उसी चित्रकार को बुलावा भेजा और सभी बातें विस्तार से बता दी। चित्रकार को कहा की स्त्री का वेष बनाकर मेरे साथ चलो। चित्रकार ने प्रधान के कहे अनुसार स्त्री का वेष बना लिया। दोनो रथ पर सवार हो महल को पहुँचे। उसे परदे कर के राजकुमार के पास ले जाया गया। राजा और दीवान परदे के एक ओर बैठे तथा दूसरी ओर राजकुमार । चित्रकार ने कहा – “कुँवर को स्नान करवाओ। और सावधान होकर बैठने को कहो।कहो।जो मैं मंत्र बोलूँ उसे ध्यान से सुने। ” चित्रकार ने दुबारा कहा ‌- “विभीषण बड़ा शूरवीर था लेकिन भाइ से दगा कर रामचंद्र जी से जा मिला। उसने रावण का सब राज खोल दिया और अपने कुल का नाश करा बैठा। उस लाज से एक वर्ष तक सिर न उठाया और अपने किये का फल पाया। भस्मासुर ने महादेव जी से वर पाकर उन्हीं से विश्वासघात किया। पार्वती जी को लेने की इच्छा की जिसका फल उसे तुरंत  मिला । स्वयं भस्म हो गया।”

“ओ कुँवर! फिर तू मित्रद्रोही और विश्वासघाती क्यों हुआ? सोये हुये रीक्ष को तूने नीचे ढ़केला। उसने तो तेरे पर उपकार किया और तूने उसका बुरा विचारा। पर उसमें तेरा दोष कुछ नहें है। उसमें तेरे पिता का दोष है। क्योंकि जैसे बीज होगा वैसा हीं फल भी होगा। यह तुमने अपने पिता के पास से दु:ख पाया है।”

इतना सुनते हीं राजकुमार सचेत हो बोल उठा। तब राजा ने कहा- “हे सुंदरी! तू सच कह तूने वन के जानवर के बारे में कैसे जाना। ”  यह सुनकर चित्रकार ने उत्तर दिया- “राजा! मैं अपनीपूर्व अव्स्था तुझे बताती हूँ। जब मैं अपने गुरु के पास विद्या के लिये जाती थी, तब मैंने अपने गुरु की बहुत सेवा की।जिससे प्रसन्न हो उन्होंने मुझे एक मंत्र दिया।दिया।वह मंत्र मैंने साधा। तब से सरस्वती मेरे जिह्वा पर बसती है। जैसे मैंने रानी के जाँघ का तिल जाना, वैसे हीं वन के जानवरों रीक्ष और शेर  को भी जाना। ”

यह सुनते हीं राजा प्रसन्न हो गया और बीच के पर्दे को खींच कर हटा दिया और बोला- “हे चित्रकार! तू सच्चा शारदापुत्र है। तेरे गुण को मैंने अब जाना।” इसके बाद राजा ने अपना आधा राज्य उसे दे दिया और अपना मंत्री नियुक्त किया।

इतनी कथा कह उस ब्राह्मण ने राजा विक्रमादित्य से कहा-“महाराज!यह कथा उस  श्लोक का अर्थ है।” इसके बाद राजा विक्रमादित्य ने उस ब्राह्मण को हजार गाँव वृत्ति में दे दिया। यह कहकर पुतली बोली- “ओ राजा भोज! और अब इस नगर में राजा विक्रमादित्य के समान राजा होना मुश्किल है। ”  इसी प्रकार वह दिन बीत गया। अगले दिन राजा के सिंहासन के पास पहुँचते हीं सोलहवीं पुतली सुंदरवती बोल पड़ी-

सोलहवीं पुतली सुंदरवती

सोलहवीं पुतली सुंदरवती बोल पड़ी- सुनो राजा! मैं तुमसे राजा विक्रमादित्य का एक अहवाल बताती हूँ। उज्जैन नगरी में छत्तीस कौम और चार जाति रहते थे। वहाँ एक नगरसेठ रहता था। वहा बड़ा प्रतापीऔर धनी था। लोगों को त्योहार करने के लिये बहुत माया लेता देता था। जो कोई उसके पास अपना कार्य लेकर जाता था, वह खाली हाथ नहीं आता। उस सेठ के एक पुत्र था रत्नसेन, बहुत हीं सुंदर, गुणवान और विद्यावान। उस सेठ के मन में अपने पुत्र के ब्याह का ख्याल आया। तब उसने नगर के कुछ ब्राह्मणोंको बुलाया और कहा कि आपलोग देश-परदेश में जाओ और मेरे पुत्र के योग्य यदि कोई सुयोग्य लड़की मिले तो उसे देख कर टीका कर देना। और यहाँ आ जाना। फिर मैं अपने पुत्र का विवाह उससे कर दूँगा। टीका ले कर आने पर मैं बहुत-सा धन भी दूँगा।इस प्रकार से कई ब्राह्मणों को दहन देकर नगर सेठ ने अलग-अलग दिशा में भेजा दिया।

उनमें से एक ब्राह्मण को पता चला कि समुद्र के पार एक सेठ जिसकी पुत्री बहुत हीं सुंदर है। वह सेठ भी अपने पुत्री के लिये योग्य वर तलाश कर रहा है। यह समाचार पाकर वह ब्राह्मण उस सेठ के पास पहुँचा। सेठ ने ब्राह्मण का आवभगत किया और आने का उद्देश्य पूछा। तब ब्राह्मण ने बताया कि  हमारे नगर सेठ ने मुझे अपने पुत्र के लिये वधू तलाशने के लिये भेजा है। यह सुन सेठ अति प्रसन्न हुआ और बोला- “मैं भी अपनी पुत्री के लिये योग्य वर देख रहा हूँ। और ईश्वर ने आपको भेज दिया। आप यहाँ दो-चार दिन ठहर कर आराम करो। मैं अपना पुरोहित आपके साथ भेज दूँगा, वह आपके साथ जाकर वर देख लर टीका कर आवेगा।” दो-चार दिन तक वह ब्राह्मण वहाँ ठहरा। सेठ की पुत्री को भली-भाँति देखकर टीका कर दिया और उस सेठ के पुरोहित को साथ ले अपने नगर उज्जैन आ पहुँचा। नगर सेठ के पास जाकर सभी बातें बता दीं।सेठ के पुरोहित ने भी नगर सेठ के पुत्र को देखकर टीका कर दिया। जाने के पहले नगर सेठ से बोला- “आपलोग शादी के लिये जल्द-से-जल्द बरात लेकर पधारें। हम वहाँ शादी की तैयारे करवाते हैं।”  

इतना कह सेठ का पुरोहित अपने सेठ के पास चला गया। यहाँ नगर सेठ के घर पर शादी की तऐयारियाँ होने लगी। सभी लोगों ने नये कपड़े सामान बनवाने शुरु कर दिये। मंगलाचार होने लगा। शनाईयाँ बजने लगीं। जब ब्याह का दिन नजदीक पहुँचा तो सब सोचने लगे इतना लम्बा सफर हम कैसे तय करेंगे। इतने कम समय में पहुँचना बहुत मुश्किल है। यह सोच कर सभी बंधु-बाँधव उदास हो गये।तब एक शख्स से नगर सेठ से कहा- “सेठ मैंने सुना है कि कुछ समय पहले महाराज को एक कारीगर ने एक उड़न खटोला बनाकर दिया है जिसे महाराज ने दो लाख रूपये ईनाम के तौर पर दिये थे। उस उड़न खटोले में बैठकर कहीं भी कुछ हीं समय में जाया जा सकता है। यदि उचित लगे तो महाराज के दअर्बार में जाकर अर्ज करें।”

यह सुनकर वह नगर सेठ महाराज विक्रमादित्य के दरबार में गया। वहाँ जाकर दीवान से कहा कि मैं महाराज से मिलना चाहता हूँ। दीवान ने कहा-“महाराज तो महल में हैं।” यह सुन नगर सेठ उदास होकर दीवान से सभी हाल बताया और यह भी कहा कि विवाह के चार दिन बचे हैं यदि मैं समय पर ना पहुँच सका तो मेरे कुल के बड़ा जग-हँसाई होगी। दीवान ने यह सब सुनकर महाराज के पास जाकर सभी बातें बताई। महाराज विक्रमादित्य ने जब सभी बातें सुनी दो दीवान को आज्ञा दीं कि वह उड़न खटोला नगर सेठ को दे दें और जो कुछ भी वह सेठ कहे वैसी तैयारी कर आवश्यक सामान भी दे।तब दीवान ने वह उड़न-खटोला सेठ को दे दिया और कहा कि जो कुछ भी चाहिये बताओ महाराज ने कहा है कि आवश्यक की सभी सामान आपको दी जाये।

नगर सेठ ने कहा- “महाराज की दया से सब कुछ है मेरे पास। बस यही छ्हिये था। ” यह कह कर उड़न खटोला ले कर अपने घर को पहुँचा। उड़न -खटोले पर अपने पुत्र के साथ, ब्राह्मणों और  दो-चार आदमियों सहित समुद्र के पार सेठ के पास पहुँच गया। वहाँ जाकर देखा कि मंगलाचार हो रहे हैं और सभी राह देख रहे हैं।जब लोगों ने देखा तो उन्हें हाथों हाथ लिया और एक हवेली में ठहराया।सेठ को जाकर खबर दी कि तुम्हारा सम्बंधी आ गया है। सेठ ने तीन-चार लोगों को देखा तो उसे दु:ख हुआ और उसने नगर सेठ से इसका कारण पूछा। तब नगर सेठ ने सभी बातें बतायी। सेठ ने सभी बातेंजानकर शादी की तैयारी की और विवाह सम्पन्न हुआ। शादी के सभी सामानों को जहाजमें लाद कर समुद्रके रास्ते से रवाना कर दिया गया। उड़न –खटोले पर नगर सेठ अपने पुत्र , बहू और पंडित के साथ उज्जैन को लौट आये। वहाँ पर अपने रीति से विवाह का आयोजन हुआ। सभी को उफार और सौगात दिये गये। शादी के बाद नगर सेठ ने जवाहरात, पोशाकें, और चार घोड़े सहित उस उड़न खटोले को लेकर राजाविक्रमादित्य के दरबार में पहुँचा । राजा के पास जाकर दंडवत किया और  उड़न खटोले सहित सभी सामान राजा को देने लगा और बोला- “आपके पुण्य प्रताप से मेरे सभी काम अच्छी तरह निबट गये। मैं ये सौगात आपकेलियेलाया हूँ” । तब राजा ने कहा-“मेरा यह स्वभावहै कि मैं दी हुई चीज वापस नहीं लेता। यह उड़न खटोला तुम रख लो।” अपने दीवान से लाख रूपये मँगवाकर जो कुछ सौगात सेठ लेकर आया था उसके पुत्र के लिये दे दिया और कहा कि यह मेरी तरफ से तुम्हारे बेटे और बहू के लिये है। सभी कुछ लेकर  सेठ प्रसन्न हो अपने घर को लौट गया।

यह कहकर पुतली बोली- “सुन राजा भोज! विक्रमादित्य की बराबरी तो इंद्र भी नहीं कर सकता। फिर तू क्या करेगा। ” इस तरह से वह दिन बीता। राजा ने जैसे –तैसे रात बिताई और सुबह फिर सिंहासन के पास पहुँचा। इस बार सत्रहवीं पुतली सत्यवती ने रोका‌

सत्रहवीं पुतली सत्यवती

इस बार सत्रहवीं पुतली सत्यवती ने रोका‌ और कहा- “एक बार राजा विक्रमादित्य के सभी में एक ब्राह्मण आया। और उसने शेषनाग और उसके ऐश्वर्य के बारे में बताया। ”  शेषनाग के बारे में सुनकर राजा विक्रमादित्य को एक बार पाताल लोक जाने की इच्छा हुई। सभा समाप्त होने पर राजा ने अपने दोनों वीर असिया और वैताल को बुलाया और कहा- मुझे पाताल लोक ले चलो। चलो।मैं शेष नाग के दर्शन करना चाहता हूँ। यह सुन कर दोनों वीरों ने राजा विक्रमादित्य को पाताल लोक में शेष नाग के मंदिर के पास पहुँचा दिया। वहाँ पहुँच कर राजा ने दोनों वीरों को विदा किया और स्वयं उस मंदिर में गये। देखा कि वह मंदिर कंचन का है और उसमें रत्न जड़े हैं। उस रत्न की ज्योति से रात-दिन का कुछ पता हीं नहीं चलता।हर घर के द्वार पर कमल के फूलों के बंदनवार लगे हैं और मंगलाचार हो रहे हैं। राजा ने वहाँ के द्वारपालों को दंडवत करते हुये कहा-“महाराज! हमारा संदेश  शेष राजाजी के पास पहुँचा दो कि मृत्युलोक से एक राजा आपके दर्शन को आया है।” राजा वहीं द्वार पर खड़ा मन में कहता था कि धन्य भाग मेरा जो मैं यहाँ आया।हर तरफ से राम-कृष्ण की आवाज आ रही थी।

विक्रमादित्य का संदेश ले कर द्वारपाल शेष्नाग के पास गया और बोला एक मनुष्य मृत्युलोक से आया है और आपको सैकड़ों दंडवत कर आपके दर्शन करना चाहता है। शेषनाग ने जब यह सुना तो स्वयं द्वार पर आया। राजा ने शेषनाग को देखते हीं दंडवत किया और शेषनाग ने हँसकर आशीष देते हुये पूछा- “तुम्हारा नाम क्या है? तुम किस देश से आये हो? ” राजा ने हाथ जोड़कर कहा-“स्वामी! विक्रम मेरा नाम है। मैं भूलोक का राजा हूँ । आपके चरण के दर्शन की इच्छा थी, सो इच्छा पूरी हुई। आज मुझे करोड़ यज्ञ का फल मिला और करो‌ड़ो दान का पुण्य मिला है। चौसठ तीर्थों में नहाने का फल प्राप्त हुआ।”

विक्रम का नाम सुनते हीं शेषनग ने राजा का हाथ पकड़ा और अपने महल में ले गये। बैठा कर कुशल क्षेम पूछी। राजा ने कहा- “महाराज के दर्शन से सब आनंद है।” शेषनाग ने कहा- “किस कारण से यहाँ आये हो और आते हुये बहुत कष्ट पाये होंगे।”  राजा ने कहा- “फणिनाथ! आपके दर्शन से सब कष्ट मिट गये। ” राजा को रहने के लिये एक कक्ष दिया और अपने सेवकों से कहा कि इसकी सेवा मेरी सेवा समझो।इस प्रकार से पाँच-सात दिन रहकर राजा ने शेषनाग से विदा माँगी और हाथ जोड़कर कहा-“पृथ्वीनाथ! अब मुझे आज्ञा दीजिये। अब मैं अपने नगर को जाऊँ और आपके गुण गाऊँ। ” शेष जी ने हँसते हुए कहा- “राजा! अब तुम्हें अपने घर जाने की इच्छा हुई है, सो जाओ। हम तुम्हारे लिये कुछ प्रसाद देते हैं , वह लेते जाओ।” यह कहकर राजा को चार रत्न दिये और उसका गुण बताने लगे‌ – “एक रत्न का यह गुण है कि इससे तुम जितना गहना चाहोगे , यह तुम्हें देगा। दूसरा रत्न तुम्हें पालकी, घोड़ा, हाथी जितनी माँगो, वह देगा। तीसरे रत्न से जितनी लक्ष्मी चाहोगे , वह तुम्हें देगी। चौथे रत्न का यह प्रभाव है जितनी इच्छा तुम्हें हरिभजन और सत्कर्म की होगी , वह पूरी करेगा।” चारों रत्न का गुण बता राजा को दे विदा दिया। राजा ने हाथ जोड़कर कहा- “महाराज! मैं आपके गुण की उपमा नहीं दे सकता। पर आप मुझे दास समझकर,मुझ पर कृपा रखियेगा। ” यह कहकर राजा वहाँ से विदा हुआ। दोनो वीरों को याद किया और महल की ओर चल पड़ा।

जब नगर एक कोस पर रह गया तो वैतालों को विदा किया और पैदल हीं नगर की ओर चल पड़ा।इतने में देखता है कि एक निर्बल ब्राह्मण आ रहा है। पास आ कर राजासे कहा-“मैं भूखा ब्राह्मण हूँ। मुझे कुछ भिक्षा दो तो मैं अपने कुटुंब को पालूँ।” राजा सोचने लगा कि चारों रत्न में से एक इस ब्राह्मण को दे दूँ। यह सोच राजा ने ब्राह्मण को सभी के गुण बताये और कहा कि तुम्हेंजो इच्छा हो वह रत्न मैं तुम्हें दे दूँ। ब्राह्मण कुछ देर सोचा और बोला मैं घर हो कर आता हूँ फिर बताऊँगा।

ब्राह्मण अपने घर गया और अपनी  स्त्री,पुत्र और पुत्रवधू से रत्नों के गुण बताये। तब ब्राह्मणी बोली- “स्वामी !उनमें से वह रत्न लो जो लक्ष्मी देती है। लक्ष्मी से होते हैं सहाय और मिलते है सब के उपाय। धर्म,ज्ञान, नेम , पुण्य यह सब लक्ष्मी से हीं होते हैं। तुम और तरफ चित्त न लगाओ।” पुत्र ने कहा- “लक्ष्मी किस काम की है, जो सामान न हो। यदि सामान हो तो राजा कहावो। सब कोई सिर नवावे। समान हो तो दुर्जन डरे और संसार में शोभा पावे। जो लक्ष्मी हुई और शोभा न पावे तो उस पुरुष का जन्म लेना निष्फल है।” इतने में पुत्रवधू बोल पड़ी- “आप वह लाल लो, जो अच्छे आभूषण दे।दे।गहने पहनने से स्त्री अप्सरा मालूम हो। विपत्ति में भी काम आवे। जितना माँगोगे , उतना वह देगी। पुरुष मेरा बावलाहै और सास बुद्धिहीन।”

तब ब्राह्मण बोला-“तुम तीनो बौराये हो।मेरी इच्छा सिवाय धर्म के और किसी में नहीं है। क्योंकि धर्म से आदमी संसार में राज पाता है और धर्म से सब काम सिद्ध होते हैं।हैं।धर्म से ही यश मिलता है। धर्म से ही राजा बलि को पाताल का राज्य मिला।” इस तरह से चारों ने चार मत किये। एक का एक ने ना माना। तब वह ब्राह्मण राजा के पास लौट कर आया और सभी बातें कही और बोला- हम सभी के अलग-अलग मत है। कुछ भी बात न बनी। और आपने हमारे वास्ते खड़े हो कष्ट सहे। तब राजा ने ब्राह्मण से कहा ‌ “ब्राह्मण! उदास मत हो। मैं तुम्हें ये चारों रत्न देता हूँ। जिससे तुम भी खुश रहो और तुम्हारे कुटुम्ब भी।” राजा से चारों रत्न पाकर आशीष देता हुआ प्रसन्न हो ब्राह्मण अपने घर को चला गया।

मतलब यह कि राजा विक्रमादित्य के जैसा दानी अब मिलना मुश्किल है।इतना कह पुतली चुप हो गई। राजा अपने कक्ष को चला गया। दूसरे दिन अट्ठारहवीं पुतली रूपरेखा बोली-

अट्ठारहवीं पुतली रूपरेखा

अट्ठारहवीं पुतली रूपरेखा बोली-राजा पहले मेरी कथा सुन। राजा भोज ने कहा- “सुना। मैं तो विक्रमादित्य कि गुण सुनना चाहता हूँ।”

रूपरेखा बोली- एक दिन दो सन्यासी योग की रीति से आपस में झग‌ड़ते थे। न वह उससे जीत सकता था न यह इससे। लड़ते-लड़ते दोनों  राजा विक्रमादित्य के दरबार पहुँचे और राजा से अर्ज किया- “महाराज! हम दोनों विवादी हैं इसका आप न्याय करो। आप धर्मात्मा हो, यही सोचकर हम आये हैं।” राजा ने कहा- “मुझे सभी बातें विस्तार से बताओ कि झगड़ा किस बात पर है।”

तब उन में से एक सन्यासी बोला- “महाराज! मैं कहता हूँ कि मन के वश में ज्ञान है और मन के वश में ही आत्मा है, मन के वश महा देव है और माया, मोह , पाप, पुण्य ये भी सब मन से हैं। और जितनी बातें हैं वह सब मन के हीं वश में है। मन की इच्छा से ही सब कुछ है। मन पूरे शरीर का राजा है। जितने अंग है वो मन के अधीन हैं। मन उनसे जो काम लेता है,  वही वे करते हैं।” तब दूसरे ने कहा- “सुनो राजा! ज्ञान हीं शरीर का राजा है।और मन उसका ताबेदार। यदि अपना कुछ करना चाहेतो ज्ञान के आगे उसकी नहीं चलती।मन के काबू में इंद्रियां हैं वह उससे अपना कार्य करवावे लेकिन ज्ञान नहीं करने देता। जब मनुष्य से मन और इंद्रियों का विकार छूटा , संसार के भय से निर्भय हुआ और योग सिद्ध हुआ।”

तब राजा ने कहा- “तुम दोनों की बातें मैने सुनी। इसका उत्तर मै विचार करके दूँगा।” कुछ देर सोचने के बाद राजा बोला- “सुनो योगेश्वर! अग्नि, जल, वायु और पृथ्वी- इन चारों से शरीर है। मन इनका सरदार है । मन की गति से जो ये चले तो घड़ी पल में नाश कर दे। पर उन पर ज्ञान बलि है। मन का विकार होने नहीं देता।और जो नर ज्ञानी है उनकी काया विनाश को नहीं पाती। वे इस संसार में अमर है। और जबतक योगी ज्ञान से मन को नहीं जीतते तब तक उसका योग सिद्ध नहीं होता। ”

राजा की यह बात सुनकर दोनों सन्यासियों ने अपना हठ छोड़ दिया। योगियों ने राजा को एक खड़िया कलम देकर कहा कि इससे तुम जो दिन को लिखोगे तो रात को प्रत्यक्ष वह देखोगे।राजा के मन में आश्चर्य हुआ कि यह कैसे संभव है।

तब राजा ने एक कक्ष खाली करवाया।उसे छड़वा, पुछवा कर, बिछौना लगवाकर किवाड़ बंद कर दीवाल पर लिखने लगा। पहले कृष्ण की मूरत बनाई, फिर सरस्वती जी कीकी, आगे और देवताओं की। शाम हुई हुई और जय जय शब्द होने लगे। जिन-जिन देवों की मूरत बनाई थी वे प्रत्यक्ष दिखने लगे। देखते हीं राजा मोहित हो गया। वे जो बातें करते राजा को वह भी सुनाई देता। ऐसे ही सुबह हो गई।देवता सब चले गये। दीवार पर केवल मूरत रह गई।

फिर राजा ने दूसरी तरफ दीवार पर हाथी, घोड़े, पालकी , रथ और फौज यह सब कुछ बनाया।बनाया।जब शाम हुई तो राजा को वे सब प्रत्यक्ष दिखने लगे। राजा प्रसन्न होने लगा और योगी को याद करने लगा कि मुझे ऐसी वस्तु दे गया। सुबह को वे सब केवल चित्र रह गये।तीसरे दिन राजा ने एक मृदंगी बनाया, फिर गंधर्व, अप्सरायें, तम्बूरा वाला, सितार, बाँसुरी और भी बहुत कुछ  । जब शाम हुई , तब पहले एक शब्द हुआ उसके बाद गंधर्व गीत गाने लगे, अप्सरायें नृत्य करने लगीं। इस प्रकार से राजा रात-दिन उसी कक्ष में रहता और आनंद लेता, रनिवास में नहीं जाता।

तब रानियों को चिंता हुई कि  राजा रनिवास में क्यों नहीं आते और एक कक्ष में हीं रहते हैं। इसका क्या राज है। सभी रानियों ने विचार किया कि हमारा जीवन धिक्कार है जो राजा हमें छोड़ कर एक कक्ष में बैठा रहे। इतने दिन विरह में बीत गये अब और नहीं। यह सोचकर सभी रानियाँ रात को उस कक्ष की ओर चल पड़ी जहाँ राजा कौतुक देख रहा था। राजा से हाथ जोड़कर विनती करने लगी- “हमसे क्या अपराध हुआ। जो हमें भूल बैठे हो? ”

राजा ने कहा- “सुनो सुंदरियों! तुम्हें किसी ने सताया है और किस कारण तुम यहाँ आई हो? तुम्हारा मुख मलीन क्यों है? ” राजा की बातें सुन रानियाँ बोली- “सुनो स्वामी! जो बात है वह आपके सामने कहती हूँ ” राजा ने कहा- “जो कुछ कहना है, कहो। ” तब उनमें से एक चतुर रानी बोली- “महाराज! हम अबला है। कभी कुछ नहीं देखा, सुख में हीं उमर बिताई है। और यह  विरह हमें रात-दिन जलाता है।इससे आप हीं हमें बचा सकते हैं। किसी तरह हमने ये वियोग के दिन काटे। अब नहीं सह सकते ।” इसी प्रकार कहते हुये रात बीत गई और मूर्तियाँ फिर से चित्र में बदल गई। फिर रानी ने कहा-“जबसे आपने  रनवास छोड़ा है तब से वहाँ दु:ख ही बसा है। है।सभी रानियों का पाप आपके सर है क्योंकि हम सअब आपके हीं आसरे हैं।”

यह सुनकर राजा ने प्रसन्न हो कहा- “अब तुम सब प्रसन्न हो जाओ। जो तुम कहोगी वहीं हम करेंगे। जो मांगों वहीं हम देंगे।” तब रानियों ने कहा- “महाराज! हमारे मांगने से जो आप देंगे, तो हम माँगे।” राजाने कहा-“  जो तुम मांगोगे वह हम देंगे। ” तब रानी ने कहा- “यह खड़िया हमें दे दें।” राजा ने आनंद से दे दिया।  रानी ने उसे थैली में छिपा कर रख लिया। उसके बाद सभी रानियाँ रनवास में लौट आई। राजा भी अपने कक्ष में चले गये और राज काज देखने लगे।

इसके बाद पुतली ने राजा भोज से कहा- ऐसा था राजा विक्रमादित्य किसी के कुछ भी माँगने पर हँसते हुये दे देता था।ऐसी विद्या तू पा नहीं सकता। यदि पा भी लिया तो किसी को दे नहीं सकता। इसके बाद राजा भोज अपने कक्ष में चले गये।

दूसरे दिन स्नान ,ध्यान कर फिर सिंहासन के पास पहुँचे, तब उन्नीसवीं पुतली तारा ने कहा-

उन्नीसवीं पुतली तारा

तब उन्नीसवीं पुतली तारा ने कहा-हे राजा भोज! तू अज्ञानी बावला होकर यह क्या करता है। पहले मेरी कथा सुन। यह कहकर तारा ने कहा-

एक ब्राह्मण सामुद्रिक शास्त्र का ज्ञाता वन में जा रहा था। उसके जैसा दुनिया में कोई विद्वान और गुणी न था। रास्ते में उसे लगा कि यहाँ से कोई गया है।जब उसने पैर के निशान देखे तो उसे ऊर्ध्व रेखा और कम चिन्ह दिखा, यह देख वह समझ गया कि इस रास्ते से कोई राजा नंगे पैर गया है। उस ब्राह्मण के मन में वइचार आया कि उस राजा को देखना चाहिये। यह विचार कर वह पैर के निशन के पीछे चल पड़ा। जब एक कोस पहुँचा तो देखा एक आदमी वृक्ष से लकड़ियाँ तोड़कर गट्टर बना रहा है।

ब्राह्मण ने उस आदमी से पूछा- “तू यहाँ इस वन में कब से आया है।”  उस आदमी ने कहा- “महाराज दो घड़ी रात बीतने के बाद आया हूँ।” तब ब्राह्मण ने पूछा- “तूने यहाँ से किसी को जाते हुये तो देखा नहीं ।” उस आदमीने कहा- “महाराज!जब से मैं आया हूँ  तब से मनुष्य क्या एकपक्षी भी नहीं दिखा।” तब फिर ब्राह्मण ने कहा- “देखूँ तेरा पाँव।” यह सुनकर उसने पाँव आगे रख दिया । ब्राह्मण उसके पैर के चिन्ह देख कर सोचने लगा कि यह क्या माजरा है। इसके सब लक्षण राजा के हैं और यह इतना दु:खी क्यों?   

ब्राह्मण ने पूछ- “यह काम तू कितने दिनों से करता है? ” उस मनुष्य ने कहा-“जबसे मैंने होश सम्भाला  है तबसे यही कार्य कर रहा हूँ और राजा विक्रमादित्य के राज्य में रहता हूँ।” ब्राह्मण ने पूछा-“तू बहुत दु:ख पाता है। ” वह बोला- “यह सब भगवत की इच्छा। किसी को हाथी पर चढ़ावे और किसी को पैदल फिरावे। जिसके भाग्य में जो लिखा है उसे भोगना हीं होता है। ”  

ब्राह्मण को यह जान कर बड़ा दु:ख हुआ कि मैंने इतना शास्त्र पढ़ा सब व्यर्थ ।अब मै राजा के भी चिन्ह जा कर देखता हूँ। यदि शास्त्र के जैसे चिन्ह ना दीखें तो सभी पोथी फाड़कर समुद्र में डाल दूँगा और तीर्थ को चला जाऊँगा। इन सबसे अच्छा है कि भगवत भजन करूँ और उन्हीं के चरणों में पड़ा रहूँ। यही वइचार करता हुआ , राजा के पास पहुँचा। पहुँचा।राजा ने दंडवत किया तो राजा को आशीष दिया। तब राजा ने पूछ- “ब्राह्मण देव! आपका मुख इतना मलीन क्यों है? आपको क्या दु:ख है ?वह मुझे बताओ? ”

ब्राह्मण ने कहा- “पहले अपना पाँव दीखा, तो मेरे मन का संदेह दीखे।बाद में कुछ कहना। ” तब राजा ने अपने पाँव ब्राह्मण को दिखाया। राजा के पाँव में कुछ चिन्ह नजर न आया। यह देख शीश झुका मन में कहने लगा कि पोथी सब व्यर्थ है।  सब पोथी छोड़ कर वैराग्य ले देश-देश में फिरूँ।

इतने में राजा ने कहा- “ब्राह्मण ! तू क्यों क्रोध में भरकर सिर झुका कर चुप है? अपने मन की बात मुझसे कह? तेरे मन में क्या है? ” तब ब्राह्मण ने कहा- “सुनो महाराज! मैंने बारह वर्ष अध्ययन किया। सभी कुछ याद कर विद्या अर्जित की। लेकिन सब व्यर्थ है।इसलिये मेरा मन उदास है।” राजा ने हँसकर कहा- “यह तुमने प्रत्यक्ष कर देखा? ” वह बोला-“महाराज! मैंने एक मनुष्य देखा जिसके सभी राजसी चिन्ह मौजूद है लेकिन वह जन्म से दु:ख पा रहा है। और जब मैंने तेरे पैर देखे तो वहाँ ऐसे कुछ भी लक्षण नहीं है लेकिन तू नगर का राजा है। इसलिये क्रोध में हूँ। घर जाकर सभी ग्रंथ जला दूँगा और वैराग्य ले लूँगा।”

तब राजा ने कहा- “ब्राह्मण! मैं तुझे ग्रंथ की बातें सही कर दिखला दूँगा।” यह कहकर चाकू मँगवाया और अपने पैरों के छाल छेल कर राज चिन्ह दिखलाये। उसके बाद ब्राह्मण से कहा- “किसी के लक्षनप्रत्यक्ष होते हैं तो किसी के गुप्त। ऐसे विद्या किसी काम की नहीं जिसके सभी भेद मालूम ना हो। ” यह देख ब्राह्मण अवाक रह गया और राजा को आशीर्वाद देने लगा।

फिर पुतली ने कहा- बता राजा भोज ।क्या तू सि योग्य है। यह सुन राजा लौट गया। अगली सुबह बीसवीं पुतली चंद्रज्योती ने रोका।

बीसवीं पुतली चंद्रज्योती

बीसवीं पुतली चंद्रज्योती ने राजा भोज को एक कथा सुनानी शुरु की। एक दिन राजा विक्रमादित्य ने खुश होकर रासमंडली के प्रधान से कहा- यह कार्तिक का महीना , धर्म का महीना है। इसलिये कुछ हरि  का भजन करो और शरद पूर्णिमा को ठाकुर की रास लीला होना चाहिये। आज्ञा पाकर प्रधान ने सभी देश के राजाओं को निमंत्रण भिजवा दिया। ब्राह्मणों और मुनियों को भी बुलावा भेजा। सभी देवताओं को मंत्रों के द्वारा आवहित कर बुलाया गया। रास होने लगा। चारों तरफ से जय-जयकार होने लगी। लगी। राजा एक-एक का शिष्टाचार मनुहार करके ठाकुर जी का फूलमाला प्रसाद के रूप में देने लगा। राजा ने देखा सब देवता आये पर चंद्रदेव नहीं पधारे।

राजा ने वैताल को बुलाया और  चंद्रलोक को गया। वहाँ जा कर  चंद्रदेव को दंडवत किया और कहा- “स्वामी! मेरा क्या अपराध है? जो सब देव आये और आप नहीं पधारे।सब ने मेरे पर कृपा की। बिना तुम्हारे मेरा काम आधा है। मेरा काम सुधारिये। आपको धर्म होगा।आपको संसार में यश और कीर्ति मिलेगी। यदि आप नहीं चले तो मैं अपना जीवन समाप्त कर लूँगा। ”

तब चंद्रमा ने हँसकर मधुर वचन बोले-“राजा!मैं तुझसे सत्य कहता हूँ। तू उदास न हो। मेरे आने से संसार में अंधकार हो जायेगा। इसलिये मेरा आना नहीं बनता। तुझे मेरे दर्शन की अभिलाषा थी सो प[ऊरी हो गई। तेरा काम सफल होगा। तू अपने नगर को जा।” इस प्रकार राजा को समझा अमृत दे विदा किया। राजा ने अमृत को शीश से लगा, चंद्रदेव को दंडवत कर अपने नगर को चला। रास्ते में देखा कि यमराज के दो दूत एक ब्राह्मण के जीव को लिये जा रहे हैं। राजा ने यह देवदृष्टि से जाना। ब्राह्मण के जीव ने राजा को देख, यमराज के,  दूत से कहा- “मुझे राजा से मिलना है।” राजा ने उस ब्राह्मणकी आवाज सुनकर कहा- “तुम कौन हो भाई? ” यम के दूतों ने उत्तर दिया- “हम यमराज के कहने से उज्जैन नगरी को गये थे। ब्राह्मण की जीव लेकर अपने स्वामी के पास जाते हैं। ”

राजा ने उन यमदूतों से कहा- “पहले मुझे उस ब्राह्मण के जीव को दिखालओ। बाद में अपने स्वामी के पास जाना।” वे दूत राजा को साथ ले नगर को गये जहाँ उस ब्राह्मण का शरीर रखा था। राजा देखते हीं पहचान गया कि यह तो मेरा पुरोहित है। तब राजा ने उन दोनों दूतों को बातों मे लगा लिया और नजर बचाकर अमृत अपने पुरोहित के मुँह में डाल दिया। अमृत्त मुँह में पड़ते हीं, पुरोहित राम-राम कहता हुआ उठ खड़ा हुआ।

पुरोहित ने राजा को प्रणाम कर आशीष दिया और उन दूतों से कहा- यह जीवन मैंने तुम दोनो के कारण पाया है। यह देखकर दूतों को आश्चर्य हुआ कि अब हम लौटकर क्या जवाब देंगे। यह विचार करते हुये दोनों दूत यमराज के पास पहुँचे और सारा वृत्तांत सुना दिया।यमराज सुन कर चुप हो गये। इधर राजा पुरोहित को अपने महल ले गये और बहुत-सा दान दे उसे विदा किया।

इतना कह चंद्रज्योती पुतली ने राजा भोज से कहा- हे राजा भोज! ऐसा पुरुषार्थ तू कर सके तो बता। यह सुन राजाभोज आज भी लौट गया।

अगले दिन सिंहासन के पास पहुँचते हीं इक्कीसवीं पुतली अनुरोधवती बोली।

इक्कीसवीं पुतली अनुरोधवती

इक्कीसवीं पुतली अनुरोधवती बोली – हे राजा भोज! पहले मेरी कहानी सुन। यह कह अनुरोधवती ने कथा शुरु की- किसी नगर में माधव नाम का बड़ा हीं गुणी ब्राह्मण रहता था। उसकी तारीफ हो नहीं सकती, जो मैं करूँ। वह योगी होकर पूरी पृथ्वी पर घूमा आया था, पर कहीं ठहर कर न रह पाया। सूरत ऐसी मानो कामदेव का अवतार। स्त्रियाँ देखते हीं मोहित हो जाती थी। वह अति चतुर और सभी विद्याओं में पारंगत था। वैसा मनुष्य मृत्युलोक में कम हीं होते हैं।  जिस राजा के सेवा में जाता  वहाँ पहले उसका आदर होता, बाद में उसके गुण सुनकर राजा उसे देश निकाला दे देत। इसी प्रकार भटकता हुआ वह कामानगरी पहुँचा।  वहाँ के राजा  का नाम कामसेन था। उसके यहाँ कामंदकला नामक एक नर्तकी थी। वह साक्षात उर्वशी का अवतार थी। वह गंधर्व विद्या में निपुण थी।

ब्राह्मण माधव उसी राजा के पास पहुँचा। द्वारपालों से कहा- “राजा से कहो एक ब्राह्मण आपसे मिलना चाहता है। ” द्वारपालों ने उसकी बात अनसुनी कर दी। तब वह ब्राह्मण वहीं बैठ गया। शाम हुई और दरबार से मृदंग की आवाज और गाने की ध्वनि आने लगी।  जयों-ज्यों वह मृदंगकी आवाज और गाने की धुन सुनता अपना सिर हिला कर कहता कि राजा भी मूर्ख है और उसकी सभा भी मूर्खों की है जो विचार नहीं करती। यही बात कई बार दोहराई। द्वारपाल ब्राह्मण की बात सुन राजा के पास हाथ जोड़ खड़ा हो गया लेकिन डर से उसके मुख से कुछ न निकले।

राजा ने जा द्वारपाल को देखा, तब उसने कहा- “महाराज ! एक दुर्बल विदेशी ब्राह्मण द्वार पर बैठा है और सिर हिला-हिलाकर कह रहा है कि राजा और उसके सभासद अति मूर्ख हैं। जो गुण विचार नहीं करते।” तब राजा ने द्वारपाल से कहा- “जा कर उस ब्राह्मण से पूछ कि तूने ऐसा क्यों कहा? ” द्वारपाल  बाहर आ उस ब्राह्मण से बोला- “महाराज ने कहा है कि उनके गुण में दोष क्या है ? यह बताओ। तो हम सच माने।”

ब्राह्मण ने कहा- “बारह आदमी जो तीन तरफ चार-चार खड़े हो मृदंग बजा रहे हैं,उनमें से पूर्वमुख वाले में से एक  का अंगूठा नहीं है। इसके सम पर थाप हल्की पड़ती है इसलिये मैंने सब को मूर्ख कहा है। यदि नहीं मानते तो  स्वयं जाकर सच देख लो।” द्वारपाल दौड़े- दौड़े  राजा के पास गये और सब बात सुनाई। तब राजा ने पूर्वमुख वाले चारों मृदंग वाले को बुलाया और सब के हाथ देखें, उनमें से एक-का अंगूठा मोम का था।

यह देख प्रसन्न हो राजा ने माधव ब्राह्मण को दरबार में बुलाया। राजा ने ब्राह्मण को दंडवत किया और ब्राह्मण ने आशीष दिया। राजा ने ब्राह्मण को आदर-सत्कार के साथ आसन और आभूषण दिये। कामंदकला नर्तकी को बुलाकर कहा कि इस ब्राह्मण के सामने तुम अपना नृत्य पेश करो जिससे यह प्रसन्न हो। राजा की आज्ञा पाकर कामंदकला ने नृत्य शुरू किया और अपने हुनर दिखाने लगी। इतने में इत्र की खूशबू से एक भौंरा आकर कामंदकला के कंचुकी पर डंक मारने लगा , इससे उसे बड़ी पीड़ा हुई। हुई।लेकिन उसने ताल भंग न हो इसलिये नृत्य करती रही। और श्वास रोक कुचकी राह निकाल उस भौरे को उड़ा दिया।

यह देखकर वह ब्राह्मण बड़ा प्रसन्न हुआ और बोला- “हे सुंदरी! धन्य है तेरी कला और तू।”  इतना कह राजा ने जो आभूषण और वस्त्र उसे दिये थे सब कुछ कामंदकला को दे दिय॥ यह देख राजा और मंत्री ने विचारा देखो इस ब्राह्मण ने क्या मूर्खता की है। सब आभूषण और जवाहरात इस नर्तकी को दे दिया। यह भिखारी हमारे सामने शान दिखा रहा है। यह सोचकर राजा ने ब्राह्मण से क्रोधित हो कहा- “तू इसके किस गुण पर रीझा? यह मेरे आगे बयान कर। ” ब्राह्मण बोल- “सुन राजा! तू भी मूर्ख है और तेरी सभा भी। इसने वह गुण दिखाया जो तुम्हें समझ में नहीं आया। इसके कंचुकी में भौंरा आकर डंक मारने लगा और इसने श्वास रोक कुचकी राह निकाल उस भौरे को उड़ा दिया। यही देख मैंने इसे सब कुछ दे दिया।”

ब्राह्मण माधव की बात सुन राजा ने कहा- “इसी समय मेरे राज्य से निकल जाओ और यदि दिख गये तो बँधवाकर समुद्र में डलवा दूँगा।”  तब ब्राह्मण माधव ने कहा- “महाराज! मुझसे ऐसा क्या अपराध हुआ है।” राजा ने कहा- “मैंने जो कुछ तुझे दिया था, वह तूने मेरे सामने हीं दान दे दिया। क्या मेरे पास देने को कुछ नहीं था, जो तूने दिया। ” यह सुन ब्राह्मण माधव सभा से निकल कर एक वृक्षके नीचे  जा पहुँचा

और सोचने लगा कि यदि माता पुत्र को विष दे, पिता पुत्र को बेचे और राजा सर्वस्व ले तो कोई किसकी शरण जाये। राजा ने मुझे निकाला मैं कहाँ जाऊँ। यह सोच और कामंदकला का नाम ले रोता था। इधर कामंदकला ने भी जल्दी-जल्दी राजा से विदा ले अपने एक आदमी को दौड़ाया कि जा कर देखे वह ब्राह्मण माधव कहाँ गया।  वह आदमी ब्राह्मण माधव को ढ़ूँढ़ कर कामंदकला के भवन में ले गया। कामंदकला ने ब्राह्मण की आवभगत की और अपने कला का प्रदर्शन किया। ब्राह्मण ने भी अपने गुण जाहिर किये। इस प्रकार से रात हो गई। ब्राह्मण ने कहा- “मुझे राजा ने देश निकाला दे दिया और तुम अपने घर ले आई। यदि राजा को पता चला तो वह मुझे मार डालेगा और तुम्हें भी कष्ट देगा। प्रेम के पथ में किसी ने भी सुख नहीं पाया है। अत: तुम मेरा विचार छोड़ दो। ” तब कामंदकला ने उत्तर दिया‌- “मैं तो प्रेम के राह पर चल पड़ी हूँ। आगे जो ईश्वर की इच्छा हो वही होगा । ” दोनों ने प्रेमपूर्वक रात बिताइ । जब सवेरा हुआ तो माधव ने कहा- “अब मैं जाता हूँ और कुछ इंतजाम करके तुम्हें भी ले चलूँगा। तब तक तुम चुप रहना। ” यह सुन कामंदकला  मूर्छित हो गई और ब्राह्मण माधव वहाँ से चल दिया।

वह वहाँ से निकल कर वन-वन फिरने लगा और हाय कामंदकला- हाय कामंदकला करने लगा। लगा।इधर इसे भी सखियों ने जल छिड़कर उठाया । यह भी माधव-माधव कर हाय-हाय करती। खाना-पीना सब छोड़ दिया। जब कोई माधव का नाम और गुण सुनाता तब उसे राहत मिलती। उधामाधव भी वन-वन भटक कर यही सोचता कि किसके पास जाऊँ , जो मेरे दु:ख को दूर करे। तब उसे याद आया कि सुना है राजा विक्रमादित्य सबके दु:ख दूर करते है। अब उन्हीं के पास जाकर सच परख लूँ।

यह सोच वह ब्राह्मण उज्जैन नगरी को आ पहुँचा। वहाँ पहुँच कर लोगों से पूछा कि राजा से भेंट कैसे हो सकती है। तब लोगों ने बताया कि गोदावरी के निकट महादेव का मठ है, उस मठ मे राजा प्रतिदिन शिव जी के दर्शन को आता है। तब ब्राह्मण माधव उस मठ के पास गया और चौखट पर उसने लिखा ‌ “मैं अति दु:खी परदेशी ब्राह्मण हूँ। सुना है कि आप पर दु:ख निवारक हो। जब मेरा यह दु:ख जायेगा, तभी मैं जीवित रहूँगा, नहीं तो तीसरेदिन इसी गोदावरी में अपना प्राण त्याग दूँगा। मैंने सुना है कि तुम राजाहो और सदा गौ-ब्राह्मण की रक्षा करते आये हो और अब भी करोगे। इसलिये मैंने अपने मन की बात कही।”

इतनी बात कह पुतली ने राजा भोज से कहा- “सुन राजा भोज! राजा विक्रमादित्य का यह नियम था कि अन्नदु:खी, वस्त्रदु:खी, द्रव्यदु:खी, भूमिदु:खी, विरहदु:खी और किसी तरह का दु:खी जब नगर में आवे तो राजा जबतक सुनकर उसका दु:ख ना मिटा दे देतब तक जल भी ग्रहण न करता था।”

सवेरे जब राजा विक्रमादित्य  महादेव जी के दर्शन कर परिक्रमा कर रहा था तो राजा की नजर चौखट पर पड़ी जिसपर उस दु:खी ब्राह्मण ने लिखा था। राजा ने सब वृत्तांत पढ़ा और शिव जी को दण्डवत कर  मंदिर में आया। अपने सेवकों को आज्ञा दी कि उस माधव नामक ब्राह्मण को जो ढ़ूँढ़ कर लायेगा उसे मुँह मांगा द्रव्य मिलेगा। सभी सेवक उस ब्राह्मण को ढ़ूढ़ने  लगे पर उसका पता ना पा सके। तब राजा ने एक दूती को बुलाकर कहा कि यदि तुम उस ब्राह्मण को ढ़ूढ़ दो तो मैं तुम्हें मुँह मांगा द्रव्य दूँगा।राजा की आज्ञा पाकर वह दूती उस शिव-मंदिर के पास पहुँची। जब शाम हुई,तो वह ब्राह्मण माधव भटकता हुआ पहुँचा और हाय कामंदकला कह विलाप करने लगा। दूती उसकी हालत देख समझ गई  कि यही  वह ब्राह्मण है। उस  ब्राह्मण  का हाथ पकड़कर कर बोली-“उठ और मेरे साथ चल। राजा तेरा दु:ख दूर करेंगे। राजा तेरे दु:ख से निपट दु:खी हैं।” यह सुन  ब्राह्मण माधव उस दूती के साथ चल दिया।
उसे ले वह दूती राजा के पास पहुँची और प्रणाम कर कहा-“महाराज! आपके कहे अनुसार मैं इस ब्राह्मण को ले आई हूँ । यह वही वियोगी है जिसके लिये आपने दु:ख पाया है।” तब महाराज ने कहा- “हे ब्राह्मण! आप किस वियोग से दु:खी हो।साफ-साफ कहो। मैं  आपके दु:ख को दूर करूँगा।” तब ब्राह्मण ने कहा‌- “महाराज! कामंदकला के वियोग से मैं  दु:खी हूँ। वह  राजा कामसेन के पास है। मुझे वह  मिल  जाये  तो मेरा दु:ख दूर हो।तू  धर्मात्मा है मुझे वह दिला दे।”
राजा ने  हँसकर  कहा- “हे ब्राह्मण! वह तो नर्तकी है,तूने  उसके प्रेम के लिये अपना धर्म-कर्म छोड़ा है। यह उचित नहीं है।” ब्राह्मण बोला- “प्रेम  का पथ न्यारा है। जो नर प्रेम करते हैं वे धर्म-कर्म सब समर्पण कर देते हैं। प्रेम की कहानी तो अकथनीय है,वह मुझसे नहीं कही जाती।” यह सब सुन राजा उसे अपने साथ कक्ष में ले गये। वहाँ उसने ब्राह्मण को बैठाया और अपनी सभी नर्तकियों को बुलवाया। फिर ब्राह्मण से बोला इनमें  से  जो तुम्हें पसंद हो उसे ले जाओ। ब्राह्मण ने  कहा- “महाराज! मैं  आपके आगे  सत्य कहता हूँ। मेरे आँखों मे वही बसी है मुझे और कोई नहीं चाहिये। चातक की तृषा स्वाती के बूंद से बुझती है, उसे  जल से कोई  प्रीती नहीं। यहि प्रेम की दृढ़ता है। “
यह  सब सुन  राजा ने उसे साथ ले  कमंदकला को दिलाने  का विचार किया और ब्राह्मण से बोला- “विप्र! आप स्नान-ध्यान कर कुछ भोजन कर लो ,तब तक मैं भी तौयारी  कर आपको साथ ले  कामंदकला को  दिलाने  चलूँ।” इतना कह  राजा ने अपने प्रधान को कामानगरी  जाने के  लिये सेना  तैयार करने को  कहा।   प्रधान ने सेना तैयार कर दी । राजा  विक्रमादित्य ,उस ब्राह्मण के साथ अपने सेना के  साथ कामानगरी की ओर चल पड़ा।
कई दिन बीतने पर  जब कामानगरी की सीमा दिखाई  दी तो राजा  ने अपना डेरा एक कोस  पहले हीं डाल दिया। एक दूत को बुलाकर संदेशा  लिख राजा कामसेन के पास भेजा कि या तू मुझे  कामंदकला दे नहीं तो मुझसे  युद्ध करे। जब यह संदेश लेकर  दूत  कामानगरी  पहुँचा तो उस राजा कामसेन  ने  दूत  से कहा कि मैं युद्ध के लिये तैयार हूँ। दोनों  ओर तैयारी होने लगी।
इतने में  राजा विक्रमादित्य के मन में विचार आया कि जिसके लिये यह युद्ध हो रहा है उसके  प्रेम को परख लूँ। यह सोच साधु का वेष बना कामानगरी मे पहुँचा और लोगों से पता पूछ  कामंदकला के द्वार पर जाकर बोला मैं एक सिद्ध  वैद्य हूँ । उस मकान  से  एक दासी निकली और बोला-“हे सिद्ध!कृपा करके मेरी  मालकिन को ठीक कर दो। वो अच्छी होजायेगी तो तुम्हें ईनाम मिलेगा।” राजा उसके साथ  कक्ष केअंदर गया तो देखा कामंदकला   निर्जीव -सी पड़ी है। कामंदकला को देख कर राजा ने कहा कि इसे कोई रोग नहीं है। इसे प्रियतम का वियोग है। जिससे इसकी यह गति बनी है। यह सुन  कामंदकला  ने  आँखे खोली। यह  देख  दासी ने कहा- “हे योगी! तुम्हारे पास इसका ईलाज है ,तो  करो।”
राजाने  उत्तर दिया- “ईलाज तो था। पर इसमें हमें कुछ  कहते नहीं बनता।”  दासी  बोली-“तुम्हारे पास  क्या ईलाज था वह बताओ।”
राजा बोला-“माधवनाम काएकब्राह्मणहमनेउज्जैन नगरीमेंदेखा था। वह वियोग से  दु:खी था। विरह-वियोग के दु:ख से मर गया। “इतना सुनते हीं  कामंदकला  ने  प्राण त्याग दिये। सभी  दास-दासी  यह देख सिर पिट कर रोने लगे। तब राजा बोला- “तुम लोग  चिंता मत करो। इसे मूर्छा  आई है। इसे  इसी अवस्था में रहने दो।  इसकीचौकसी करते रहना। मैं  अपने घर जाकर औषधि लाता हूँ।”
ऐसा कह राजा अपने शिविर में आया और माधव को  कामंदकला   के मरने की खबर बता दी। सुनते हीं एक आह के  साथ  उसकी भी जान निकल गई। यह देख राजा सोचने लगा कि जिसके लिये इतनी सेना लेकर यहाँ तक आया वहीं नही रहा तो युद्ध क्या करना। इनकी  हत्या का पाप मुझे  हीं  लगेगा। इसलिये मैं भी अपना प्राण त्याग दूँगा। यहसोच चंदन की लकड़ी का चिता बनवा जीता हीं जलने को तैयार हो गया।प्रधान, सेनापति और सभी ने बहुत समझाया लेकिन कुछ  असर न हुआ। जैसे ही राजा चिता कीओर बढ़ा कि वैताल ने आकर हाथ पकड़ लिया।
राजा से बोला-“स्वामी! आप क्यों अपना प्राण त्याग रहे हो।” राजा ने सभी  बातें बताई कि उनपर दो हत्याओं का पाप लगा है। वैतालने शीघ्रता से पाताल लोक से अमृत ला राजा को दिया और कहा इससे उन दोनों के प्राण लौट आयेंगे ।  राजा ने अमृत की कुछ बूंदे ब्राह्मण माधव पर डाली  अमृत के पड़ते हीं वह ईश्वर का नाम ले उठ खड़ा हुआ। उसके बाद राजा अमृत ले कामंदकला के घर पहुँचा। वहाँ पहुँच अमृत कामंदकला पे छिड़का । अमृत पड़ते हीं वह भी जी उठी। माधव-माधव करने लगी।
राजा को देख  बोली- “महाराज! तुम कौन हो और कहाँ से  आये हो?मुझसे कहो।”तब राजा ने कहा-“मैं राजा वीर विक्रमादित्य हूँ। उज्जैन का राजा। माधव अपनी व्यथा लेकर मेरे पास आया था। मैंउसकी विरह व्यथा को दूर करने के लिये सेना लेकर आया हूँ। तुम धीरज के साथ कुछ समय तक रहो। हम तुम्हें माधव से मिला देंगे।” यह सुनते हीं कामंदकला राजा के चरणों में जा पड़ी और बोला-“महाराज!यह तुम मुझे जीवन-दान दोगे। मैंने तुम्हारे बारे में सुना था।जैसा तुम्हारा यश सुना वैसा हीं देखा।”
राजा वहाँ से अपने शिविर लौट आया। दूसरे दिन कामानगरी पर सेना सहित चढ़ाई की और उस नगर कोजीत लिया। उस नगर के राजा ने हार मानी और कहा कि मैं कामंदकला को दूँगा। और यह जो हमने युद्ध किया  वह इसलिये कि तुम्हारे चरण हमारी नगरी पर पड़े। राजा  विक्रमादित्य  से मुलाकत की  और उन्हें अपने नगर को ले गया। महल में ले जाकर सत्कार किया । सौगात नजर की और कामंदकला को  सौप दिया।राजा  विक्रमादित्य  ने माधव को बुलाकर कामंदकला उसे दे दी।
राजा  विक्रमादित्य  ने अपनी सेना सहित अपने देश को प्रस्थान किया। उज्जैन पहुँच कर ब्राह्मण माधव को बहुत-सा धन देकर विदा किया।
इतना कह पुतली बोली-“हे राजा भोज! क्या तुझमें इतनी सामर्थ्य और साहस है।”इस तरह से वह दिन बीत गया।  अगले दिन राजा  को बाईसवीं पुतली अनुरेखा ने रोका।

बाईसवीं पुतली अनुरेखा

बाईसवीं पुतली अनुरेखा  ने कथा सुनाया। एक दिन राजा विक्रमादित्य ने  सभा में अपने प्रधान  से  पूछा- “मनुष्य बुद्धि  अपने कर्म से पाते हैं या  माता-पिता के सिखाने से पाते हैं।” प्रधान ने  उत्तर दिया- “महाराज! यह नर पूर्व जन्म में जैसा  करता है विधाता उसके कर्म वैसे हीं लिख देता है। इसी तरह बुद्धि होती है। माता-पिता के सिखाये बुद्धि नहीं होती। कर्म  का लिखा-ही फल देता है।आदमी  -आदमी को क्या सिखावे। यदि सीख से बुद्धि होजाती तो सभी पंडित होते । कोई मूर्ख न होता। कर्म के लिखे विद्या होती है। कुछ भी कर लो कर्म का लिखा मिटता नहीं।”
राजा  ने  कहा-“प्रधान! ये तूने क्या कहा? संसार में जो देखते हैं कि जन्म लेते हीं लड़का माता-पिता से जो सुनता है वही व्यवहार करता है। इसमें  कर्म  का लिखा  क्या है? यह सिखाये से  सिखता है।और जैसे संगत में बैठता है वैसी बुद्धि पाता है।”
इतनी बात सुन प्रधान बोला- “धर्मावतार! आपकी बराबरी हम नहीं कर सकते। यह अपने मन में विचार कर तुम समझो कि कर्म का लिखा हुआ फल मिलता है।”
तब राजा ने कहा- “इसकी परीक्षा कर लेते हैं।”यह कह वन में एक महल बनवाया। अपने एक पुत्र के पैदा होते हीं,उसी महल में भिजवा दिया,उस के साथ एकअंधी,गूँगी और बहरी दाई रख दी। वही उस बच्चे का पालन-पोषण करती। इसी तरह  से  एक दीवान के बेटे को,एक ब्राह्मण के पुत्र को और एक कोतवाल के पुत्र को जन्मते हीं एकअंधी,गूँगी और बहरी दाई के साथ उसी महल में रखवा दिया। चारों ओर पहरे बैठा दिये कि कोई  वहाँ न जाने पाये। इसी तरह  से बारह  वर्ष  बीत गये।
एक दिन ब्राह्मणी ने ब्राह्मण से कहा-“एक युग बीत गये। कहीं प्राण निकल गये तो पुत्र को देख न पाऊँगी। तुम राजा से  जाकर अर्ज करो  कि महाराज बारह वर्ष बीत गये पुत्र का मुँह न  देखा। अब इच्छा है कि  पुत्र  को सब सौंप दंडी बन तपस्या करूँ।” ब्राह्मणी की बात सुन ब्राह्मण राजा के पास गया। ब्राह्मणको देख राजा ने दंडवत किया और ब्राह्मण ने आशीष दिया। राजा बोला-“आनंद मंगल से तो हो?” ब्राह्मण ने कहा- “महाराज!आपकी कृपा से सबआनंद मंगल है। लेकिन मैं आपके पास एक कामनासे आया हूँ।”
राजा ने  कहा-“जो भी  कामना हो,वह कहो।” तब ब्राह्मण ने अपने आने का कारण बताया। ब्राह्मण की बात सुनते हीं राजा ने प्रधान को  कहा कि उन चार बालकों को उस महल से बुलवाया जाये । प्रधान आज्ञा पाते हीं स्वयं  वहाँ  जा  पहुँचा और पहले राजकुँवर को बुलाकर लाया। उसके  नख औरकेश बढ़े हुये थे,शरीर एक दम मैला-कुचैला। प्रधान ने उसे वैसे हीं राजा के सामने पेश किया। राजा ने राजकुँवर से पूछा- “पुत्र! तुम कुशल से तो हो?इतने दिन तुम कहाँ थे और कहाँ से आये हो? यह सब बताओ?” राजकुँवर ने  हँसकर कहा-“आपकी कृपा से सब कुशल है  और आज का दिन भी कुशल का है जो आपके दर्शन हुये।” राजकुँवर   की बात सुन राजा प्रसन्न्चित्त  हो प्रधान की ओर देखा। तो प्रधान उठकर हाथ जोड़ कर बोला- “महाराज! यह सब कर्म का ही लिखा है।”
उसके  बाद दीवान केपुत्र को लाया गया,वन के भालू की तरह उसके शरीर में बाल-हीं-बाल नजर आ रहेथे और धूल भरी थी। राजानेउससे कहा- “तुम  अपनी कुशल कहो।कहाँ थे और किधर से  आये?” उस बालक  ने  उत्तर दिया- “महाराज! कुशल-क्षेम कहाँ होगी? उधर  संसार मेंउ पजे  हैं इधर विनसे है। सुबह होती है शाम ढ़ल जाती है।नर आता है और जाता है। आज  जो नर आया है कलउसेजाना है। यही जगत  का व्यवहार है। किस बात कि  कुशल-क्षेम।” यह सुनकर  राजा ने दीवान से  कहा-“यह सब इसे किसने सिखाया। जो कुछ तुमने कहा था वही सच है।यह फल कर्म से हीं इसने पाया है।”

उसके बाद  राजा ने कोतवाल के पुत्र को बुलवाया ।उसने आते हीं राजाको सलाम किया और हाथजोड़कर खड़ा हो गया। राजा नेउससे भी कहा- “तुम  अपनी कुशल कहो।कहाँ थे और किधर से  आये?”तब  उसने  कहा- “पृथ्वीनाथ! दिन-रात नगर का पहरा हम देते हैं। इसपर  भी चोर  आ कर  चोरी कर  जाता है।बदनाम  हम  होते हैं, कलंक हमें  लगता है। बिना अपराध कलंक लगे तो कुशल काहे की।

” अंत  में  ब्राह्मण-पुत्र को बुलाया  गया, उसे  देख राजा ने दंडवत  किया तो उसने मंत्र पढ़ आशीष  देने लगा। तब  राजा ने कहा- “आप कुशल-क्षेम से तो हैं? ” उसने  कहा- “महाराज! आप पूछते हैं कि मेरे शरीर  में कुशल है तो कुशल कहाँ से हो? मेरे शरीर की  दिन-प्रतिदिन उम्र घटती जा रही है।कुशल  तो तब आवे जब मनुष्य चिरंजीवी होवे।जिसका जीवन-मरण साथ है उसे क्या खुशी।”

राजा ने चारों लड़कों की बात सुनकर प्रधान से कहा- पढ़ाने से पंडित  नहीं होवे। जिसके कर्म में पंडिताई  लिखी हो वहीं पंडित होवे। प्रधान को सबका सरदार बना दिया ,बहुत धन-दौलत दिया। और अपना राज-भार भी दिया। उन चारों लड़कों का विवाह करवाया।

यह कह पुतली ने राजा भोज से कहा- “बता। कलियुग में ऐसा कोई धर्मात्मा और साहसी राजा है।” इस प्रकार से उस दिन का मुहुर्त भी टल गया। अगले दिन तईसवीं पुतली करुणावती बोली

तईसवीं पुतली करुणावती

तेईसवीं पुतली करुणावती बोली- अब मेरे कथा सुन । राजा विक्रमादित्य के जैसा गुणी , साहसी और पुरुषार्थी दूसरा कोई न जन्मा है और न जन्मेगा। जब राजा विक्रमादित्य ने शंख को मारकर राजा गद्दी सँभाली तो शंख के दीवान को बुलाकर कहा तुझसे मेरा काम न चलेगा। इसलिये मुझे बीस आदमी लाकर दे दो जो राज्य-कार्य सँभाल सके।मैं उनसे  अपना काम करवा लूँगा।राजा की आज्ञा पाकर दीवान ने उसी नगर से  बीस आदमी ढ़ूँढ़ निकाला जो कि उमर में, कुल में ,सुंदरता में, कार्य में सभी प्रकार  से गुणी थे।उनको  राजा के सामने पेश किया। राजा उन्हें देखकर अति प्रसन्न हुआ। उसी समय सबको पान देकर कहा कि आज से तुम सभी हमारे खिदमत में हाजिर रहो। फिर कुछ दिनों  बाद उन्हीं  में से सभी को अलग-अलग पद पर नियुक्त किया। इसी प्रकार नये लोगों को रखकर पुराने लोगों को हटा दिया और सब नया बँदोबस्त कर लिया। बस उस पुराने दीवान को जवाब न दिया।

दीवान जब  अपने घर में बैठता तो पुराने लोग आकर उससे मिलते। एक दिन उन लोगों से दीवान ने कहा कि आप लोग बुरा न मानो तो एक बात कहूँ। आप लोग यहाँ न आया करो। आपलोगों का कुछ  काम तो मेरे से निकलता नहीं।  पता नहीं राजा क्या सोचे । मैं  अपनी बदनामी से डरता हूँ। यह सुनकर उनमें से फिर कोई उस दीवान के घर न आया। दीवान रात-दिन यही सोचता कि ऐसा क्या करूँ कि राजा संतुष्ट हो।

एक दिन दीवान नदी में स्नान कर , जप कर रहा था कि  उसके हाथ एक अति सुंदर फूल दिखा। दीवान ने वैसा फूल अपने जीवन में न देखा था। उसने अपना जप छोड़  उस फूल को उठा लिया। घर आकर तैयार हो राजा के पास गया और वह फूल राजा को दे दिया। दिया।राजा फूल लेकर अति प्रसन्न हुआ और बोला मैंने तुझे अपने राज का प्रधान नियुक्त किया। उसने राजा का शुक्रिया किया।

तब राजा ने कहा- “इस फूल का वृक्ष लाकर मुझे दो। यदि ला दिया तो मैं तुझसे बहुत खुश हो जाऊँगा और नला के दिये तो देश निकाला दे दूँगा।” राजा की आज्ञा सुन दीवान अपने घर को लौट  आया । घर आकर सोचने लगा मैंने पूर्व जन्म में कौन-सा पाप किया कि वैसी सुंदर वस्तु पाई और राजा को दिया।

फिर  खुद पर हीं क्रोध किया कि कर्म की गति बूझी नहीं जाती भला करो तो बुरा होवे। होवे।य्ही सोचने लगा कि राजा की आज्ञा न मानूँ तो देश निकाला पाऊँ और खोजने जाऊँ तो कहाँ जाऊँ। इसलिये अपयश  के साथ मरने से अच्छा है  कि उस फूल के वृक्ष को खोजने चलूँ। मिल जाये तो लौट  आऊँ नहीं तो वन में हीं मर जाऊँ। यह विचार कर बढ़ई को बुलाया और कहा कि ऐसी नाव बनाओ जो बिना मल्ल्ह के जिधर चाहे उधर मैं ले जा सकूँ।

बढ़ई ने कहा कि कुछ खर्च के रूपये मिल जायें तो काम जल्दी हो जावे। दीवान ने उसे रूपये दे दिये। कुछ दिनों में नाव बनकर तैयार हो गई। बढ़ई ने दीवान को आकर कहा कि नाव नदी के पास तैयार रखी है। है।नाव देखकर दीवान ने बढ़ई को जोड़ा घोड़ा और पाँच गाँव वृत्ति में ईनाम के रूप में दिया। अपना जरूरत का सामान ले , कुटुंब से विदा ले उस नाव में सवार हो चल पड़ा। अपने कुटुंब से बोला- “यदि जीवित रहे तो मिलना होगा नहीं तो हमारी यहि विदा समझना।” यह सुन सभी कुटुंब रोने लगे।

उसके बाद पाल खोल जिस तरफ से फूल बहता हुआ आया था उस ओर चल पड़। दोनो किनारे के व्र्क्षों को देखता जाता। चलते –चलते एक महावन के पास पहुँचा। जो भी सामान खाने-पीने के थे वह भी खत्म हो चुका था। उस महावन को देखकर मन में विचार किया कि अब नाव में बैठने से न होगा। यहाँ उतर कर देखना होगा। तभी उसे एक पहाड़ दिखा, उसी पहाड़  से दरिया में पानी आ रहा था। वहीं पर अपने नाव को बाँध कर पहाड़ के पास उतरा।

पहाड़ पर देखता है कि हाथी, गैंडे, शेर, हिरनों की आवाजे आ रही है। सुन-सुन कर उसके प्राण मुँह को आते थे। लेकिन डरता-डरता पहाड़ को पार किया। पार करते ही देखता है कि वही फूल बहा हुआ आ रहा है। देख कर मन हलका हुआ कि ईश्वर की कृपा होगी तो वृक्ष भी दिखेगा। दिखेगा।जब कुछ आगे बढ़ा तो एक भव्य मंदिर नजर आया। मंदिर को देखकर सोचा कि यदि मंदिर है  तो यहाँ मनुष्य भी होंगे। यह सोचता हुआ मंदिर के पास जा पहुँचा। मंदिर के पास जाकर देखता है कि एक तपस्वी  पाँवों में जंजीर बाँधे हुये उल्टा लटका हुआ है। शरीर का मांस सूख गया है और बस कंकाल बचा हुआ है। उस के शरीर से एक-एक बूँद रक्त नदी में गिर रहा है। वही रक्त फूल बनकर नदी में बह रहा है।

ऐसा आश्चर्य देख कर कहने लगा  कि भगवान की लीला भी न्यारी है, कुछ समझ नहीं आता। नीचे  देखा कि बीसों तपस्वी वहाँ बैठे अपना शरीर सूखा कर ध्यान में लगे हैं। जो जैसी अवस्था में हैं वैसे हीं पड़े हैं । सभी के कमंडल वैसे हीं पड़े हैं। यह देख कर प्रधान उल्टे पाँव लौट गया। अपनी नाव में सवार हो उज्जैन नगरी को पहुँचा। अपने घर खबर भिजवाई। कुटुंब आकर उसे घर ले गये। राजा को खबर मिली तो राजा ने एक प्रधान को उसके घर भेजा।

राजा की आज्ञा सुनकर दीवान तुरंत दरबार में हाजिर हुआ और राजा के चरणों में  जा पड़ा। राजा ने उसे उठाकर गले से लगाया। फिर कुशल-क्षेम पूछी और कहा – “तू कहाँ तक गया था और उसका ठिकाना कहाँ कर आया? ”  यह सुनते हीं  जो फूल लेकर आया था वह राजा को भेंट की। और हाथ जोड़कर कहने लगा- “महाराज! एक आश्चर्य की बात जो मैंने देखी , वह कहूँगा तो आप नहीं मानोगे।”

राजा ने कहा- “तुमने जो भी आश्चर्य की बात देखी वह मुझसे बयान कर्। मैं अवश्य मानूँगा।” तब दीवान ने कहा- “आप से आज्ञा पाकर मै एक नाव में सवार हो कई दिनों तक नदी में चलते-चलते एक पहाड़ के पास पहुँचा। ऐसे कई पहाड़ा पार कर मुझे के मंदिर नजर आया। जब उस मंदिर के पास पहुँचा तो देखता हूँ कि एक वृक्ष पर एक तपस्वी उल्टा लटका हुआ है। उसके शरीर का माँस सूख गया है। उस के शरीर से रक्त की बूंद नदी में गिर रही है और वही रक्त  फूल बन जा रहा है। उसी  वृक्ष के समीप बीस सन्यासी तप कर रहे हैं । सभी के शरीर का माँस सूखा हुआ है किसी में भी प्राण नहीं है।”

यह सुनकर राजा हँसा और दीवान से बोला – “अब मेरी बात सुन।वह जो तपस्वी साँकल में लटके तूने देखा , वह तो मेरी देह है। मैंने पूर्व जन्म में ऐसी कठिन तपस्या की थी जिसके फल स्वरूप मुझे यह राज्य मिला है।  उस तपस्या के तेज से मेरे आगे कोई टिक नहीं सकता। उसी बल से मैंने शंख को मारा , यह पूर्वजन्म का लिखा था। इसमें मेरा कोई दोष नहीं। जब तक मैं इस पृथ्वी पर अखंड राज करूँगा, तू मेरा दीवान रहेगा। तू अपने जी में चिंता न कर। और तूने जो वो बीस तपस्वी देखे , वही वो बीसों दास हैं जिन्हें तुमने मुझे लाकर दिये हैं। उन्होंने जैसी मेरी सेवा उस जन्म में की थी उसी का फल उन्हें इस जन्म में मिल रहा है। इसलिये मैंने उन्हें अपने निकट रखा है।

मैंने  अपना परिचय दिखाने के लिये तुझसे निठुरता की थी। अब तुमने मेरे मर्म को जाना।जाना।क्योंकि सब कहते हैं कि विक्रम ने अपने बड़े भाई को मार गद्दी पाई।इसमें मेरा कोई दोष नहीं, जो कर्म में लिखा है  वही होता है।आज से मैंने तुझे प्रधान नियुक्त किया। जो राज-काज के लिये अच्छा हो, वही काम करना।

यह बात किसी के आगे ना कहियो।नहीं तो राज के लालच में लोग योग करने लगेंगे।”

इतना कह पुतली बोली- “इस तरह से राजा विक्रमादित्य ने अपने राज का भार उस दीवान को दे दिया।”

वह दिन भी निकल गया।दूसरे दिन चौबीसवीं पुतली चित्रकला ने कहा-

चौबीसवीं पुतली चित्रकला

चौबीसवीं पुतली चित्रकला ने कहा- मैं एक दिन की हकीकत बताती हूँ। एक दिन राजा विक्रमादित्य दशहरा नहाने नदी पर गया। वहाँ जाकर देखता है कि एक बनिये की जवान खूबसूरत स्त्री  स्नान कर बाल सुखा रही है और कुछ हीं  दूरी पर साहूकार का बेटा बैठा उसे देख रहा है। दोनों में नजरो-ईशारो से प्रेम की बातें हो रही है। राजा स्नान भी करे और उन दोनों पर नजर भी दिये हुये थे।

जब राजा ने देखा की वह स्त्री चल पड़ी और पीछे-पीछे साहूकार का बेटा भी चल दिया। तब एक हलकारे को उनके पीछे लगा दिया और कहा कि इनका घर और बाकी बाते पता कर आ।जब  वह औरत घर गई तब उसने  मुड़कर देखा और सर खोलकर दिखाया। फिर छातीपर हाथ धर अपने घर में गई और साहूकार के बेटे ने भी अपनी छातीपर हाथ रख लिया। यह खबर हलकारे ने आ राजा को दी तब राजा भी नदी के पास से उठ कर महल को चला गया। अपनी सभा में आकर बैठा और एक पंडित से कहा कि कोई स्त्रीचरित्र सुनाओ।

तब पंडित ने उत्तर दिया कि महाराज! मेरा क्या सामर्थ्य  जो मैं स्त्रियों का चरित्र और पुरुष का भाग कहूँ। ब्रह्मा भी नहीं जानते आदमी की क्या कुदरत है। और यह देखते हीं बनता है कहा नहीं जा सकता। पंडित की यह बात सुन राजा चुप रहा और मन में विचारा यह चरित्र देखना चाहिये। इतने में शाम हो गई। राजा सभा से उठ अपने महल में गया और कुछ भोजन कर ,उस हलकारे को बुलाया।

उस हलकारे को बुलाकर कहा कि तू  उनके इशारों  को कुछ समझा है तो बता। तब उस हलकारे ने कहा- “महाराज! कुछ मन में आया तो है, लेकिन कहते शंका होती है।” राजा ने कहा- “तू ने जो भी समझा है वह निडर हो कर कह।” वह बोला- “महाराज! उस स्त्री ने जो सिर खोलकर छाती पर हाथ रखा सो उसने कहा कि जिस वक्त अँधेरा हो तब मैं मिलूँगी  और साहूकार के बेटे ने जो छाती पर हाथ रख कर जवाब दिया कि दास सब समझ गया।”  राजा ने कहा तुझे तो सब समझ में आता है। अब मुझे उस स्त्री  का घर बता । हलकारा राजा को लेकर उस स्त्री के घर के पास जा पहुँचा। उसके बाद राजा ने हलकारे को कहा तू जा।

राजा वही छिप कर बैठ गया। जब कुछ अँधेरा हो गया तब राजा ने देखा कि मकान के पिछवाड़े जो खिड़की है उसमें से थोड़ी-थोड़ी देर पर कोई झाँकता है। जब रात्रि के दो पहर बीत गये , तब राजा ने एक कँकड़ उस खिड़की पर दे मारी। कँकड़ लगते हीं उस स्त्री ने खिड़की से झाँका और राजा को साहूकार का बेटा समझा। तब उसने घर के सारे गहने, जेवर, धन इकट्ठा कर एक थैली बना बाहर आ पहुँची। वह थैला राजा को दे बोली- “यह ले। मैं घर के सारे गहने, जेवर, धन ले कर आई हूँ  मुझे लेकर चल। मैं औ तू कहीं और ठिकाना बनायेंगे।”

तब राजा ने कहा- “मैं तुझे ऐसे लेकर नहीं चलूँगा। कल को जब तेरा पति तुझे नहीं पायेगा तो राजा से फरियाद करेगा। तब राजा मुझे  और तुझे खोजकर मार डालेगा। इससे बेहतर यह है कि पहले तू इसे मार डाल। ” राजा की बात सुनकर वह स्त्री घर के अंदर गई और खंजर से अपने पति को मार वापस आ गई। इसके बाद राजा आगे-आगे और वह स्त्री पीछे-पीछे चलने लगे। चलते –चलते दरिया के किनारे पहुँचे। तब राजा ने सोचा- “इस स्त्री का क्या भरोसा जिसने अपने पति को मार डाला।” यह सोच राजा ने कहा –“तू यहाँ दरिया के किनारे रूक मैं पानी का थाह लेता हूँ, फिर दोनों दरिया पार कर लेंगे। ” यह कह राजा थैला ले दरिया के बीच गया और धीरे-धीरे दूसरी ओर निकल गया। दूसरी ओर पहुँच कर उस स्त्री से जोर से बोला- “दरिया के बीचों बीच बहुत पानी है तू नहीं पार कर सकती। वहीं बैठी रह।” यह कह राजा अपने महल को चला गया।

दरिया के किनारे बैठी स्त्री हाय-हाय करने लगी कि वह पुरुष तो सब धन भी लेकर चला गया। फिर मन में विचार कर अपने घर को लौट गई। घर पहुँच कर दहाड़ मार चिल्लाने लगी कि  चोर मेरे पति को मार सारी सम्पत्ति ले भाग गया। उसके रोने  की आवाज सुन कर सभी कुटुम्ब आ पहुँचे। उसने कहा मैं अपने पति के साथ सती हो जाऊँगी। सभी उसे समझाने लगी। लेकिन उसने किसी की न मानी। नदी के किनारे चिता सजाया गया। वह स्त्री अपने पति के साथ चिता में बैठ गई।सभी नगरवासी भी यह तमाशा देखने पहुँचे। राजा भी बहाने से पहुँचा। उस स्त्री ने स्वयं हीं चिता में आग लगाय और उसमें कूद गई। जैसे हीं उसके बदन में आग लगी उठकर पानी में कूद गई। यह देख सब हँसने लगे। तब राजा से चुप न रहा गया और  कहा- ऐ सुंदरी! यह क्या है?  उस स्त्री ने हँसकर राजा को ओर देखा और कहा- “इसका मर्म अपने घर जाकर पता कर।  मैं अपने कर्म में जो लिखा कर आई थी उसका फल पाया।पर तू अपने घर का भेद न पा सका। हम सात सखियाँ इस नगर में हैं। उनमें से एक मैं थी और बाकी की छह सखियाँ तुम्हारे रनिवास में है।” इतना कह वह नदी में डूब गई।

राजा अपने मन में दु:ख ले महल को लौट आया। शाम होने पर रनिवास में छिप कर बैठ गया। रात्रि के एक पहर बीतने पर देखता है कि रनिवास की छह रानियाँ आलग-अलग थालों मे विभिन्न प्रकार के व्यंजन ले कर बाहर को जा रही है। राजा भी उनके पीछे चल पड़ा। वे छहों रानियाँ नगर के बाहर वन में गई। उस वन में एक कुटिया के पास पहुँची। उस कुटिया में एक योगी ध्यान कर रहा था। छहों रानियों ने उसे दंडवत किया और बैठ गई। थोड़ी देर में योगी ध्यान से उठा और उन सब से हँस-हँस कर बातें करने लगा। फिर व्यंजनों का भोग लगा,सबके साथ भोजन किया। उसके बाद उस योगी ने छह रूप बनाये और छहों रानियों के साथ समय बिताया। उसके बाद सभी रानियाँ वहाँ से लौट गई। वह योगी भी अपने ध्यान में बैठ गया।

राजा यह देख अपने मन में विचार किया कि इस योगी ने अपना योग भ्रष्ट  किया और उनका धर्म खोया। खोया। यह सोच राजा योगी के सामने गया। राजा को देख योगी के मन में शंका हुई। योगी मन में शंका लिये बोला- “हे नृपति! कहाँ से आये हो? अपने मन का भाव मुझसे कहो? ” राजा ने कहा‌ -“आपके दर्शन की इच्छा थी। इसलिये यहाँ आया।” तब योगी बोला- “राजा तुम मुझसे जो माँगोगे वह मैं दूँगा। ” राजा ने कहा- “एक शरीर से छह शरीर बनाने की विद्या मुझे बताओ , नहीं तो मैं तुझे मार डालूँगा।” यह औन उस योगी ने डर कर राजा को वह विद्या सिखा दी। विद्या सीखने के बाद राजा ने पहलेउ स विद्या को परखा, उसके बाद उस योगी के टुकड़े -टुकड़े कर एक गुफा बना उसमें डाल दिया।

राजा वहाँ  से सीधा रनिवास पहुँचा और उन छहों रानियों के पास गया। छहों रानियाँ तरह-तरह से राजा को रिझाने लगी।तब राजा ने उनसे कहा- “सुंदरियों! मैं तुम लोगों का हित करता हूँ और तुम लोग मेरा अहित कर किसी और का ध्यान करो यह अच्छा नहीं।” तब वे बोली- “महाराज! आप तो हमारे प्राणरक्षक हो। तुम्हारे देखे बिना हम जीतीं है। आठों पहर तुम्हारा हीं ध्यान करती हूँ।तुम कहीं चले जाते हो तो जल बिन मछली के तरह तड़पती हूँ।”  यह सुन राजा क्रोधकर मुस्कराया और बोला- “सुंदरियों! सच है। तुम्हारा दिल मुझे नहीं छोड़ता जैसे एक योगी के छह योगी हो गये और ओहिर वह एक योगी हो गया।” यह सुन रानियाँ एकदम चुप हो कर बोली- “महाराज! आप ऐसी अचरज की बात करते हो जो न किसी ने कभी देखी न सुनी। कोई इसका एतवार भी ना करे।एक का छह हो यह कौन मानेगा।”

तब राजा ने कहा- “चलो मैं दिखलाता हूँ।” यह कह छ्हों को साथ ले उसी कुटिया के पास गया। और गुफा का मुँह खोल दिया। रानियाँ देख कर लज्जित हो गई। और जान गई की राजा ने हमारे चरित्र को देख लिया। फिर राजा ने कहा- “तुमलोगों ने जाना या नहीं।” छहों रानियाँ नीचे गरदन कर खड़ी हो गई। गई।तब राजा ने छहों का सर काटकर उसी गुफा में डाल बंद कर दिया। राजा अपने महल को लौट आया।

अगली सुबह नगर में ढ़िंढ़ोरा पिटवा दिया कि जितने भी ब्राह्मण परिवार हैं अपने परिवार सहित  दरबार में हाजिर हो जायें। यह सुन नगर के सभी ब्राह्मण परिवार दरबार में हाजिर हुये। जितने उन छह रानियों के गहने, वस्त्र और आभूषण थे, वे सब सभी ब्राह्मणियों को दे दिये। ब्राह्मणों को एक-एक गाँव वृत्ति में दी। जितनी कुँवारी कन्यायें थी उन सब का विवाह करवाया। स्वयं राज-काज करने लगा।

यह कह पुतली ने कहा – “सुन राजा भोज! क्या कोई राजा  विक्रमादित्य के जैसा दानी और पंडित है।” इतना सुन राजा भोज अपने कक्ष को चला गया। दूसरे दिन जब राजाभोज्सिंहासन की ओर बढ़ा तब पच्चीसवीं पुतली जयलक्ष्मी बोली-

पच्चीसवीं पुतली जयलक्ष्मी

तब पच्चीसवीं पुतली जयलक्ष्मी बोली-सुन राजा भोज! एक दिन कि बात मैं तेरे आगे कहती हूँ। किसी नगर में एक भाट रहता था। निपट दरिद्र और खराब हाल। पृथ्वी पर जितने भी राजा थे सभी के पास जाकर आ गया लेकिन उसका एक-कौड़ी का फायदा नहीं हुआ। अपने घर आ जवान बेटी को देख चिंता करने लगा। तभी उसकी भाटिन बोली- “सभी देश घूम आये। पर जो कमाई कर के लाये हो वह बताओ।”

तब भाट ने उत्तर दिया- “मेरे भाग्य में धन नहीं है। क्योंकि मैं सभी राजाओं के पास गया और जो भी शिष्टाचार थे किये  लेकिन कहीं से भी एक कौड़ा का फयदा नहीं हुआ। अब सोचता हूँ कि एक राजा विक्रमादित्य रह गया है, उसके पास भी जा कर देखूँ। सुना है उसके पास से कोई भी खाली हाथ नहीं आता। वह सब के दु:ख दूर करता है। ”

तब भाटिन बोली- “अब तुम कहीं न जाओ। सअंतोष कर यही रअहो, जो भाग्य में लिखा होगा यहीं मिलेगा।” तब भाट बोला-“ राजा विक्रमादित्य के बारे में बहुत सुना है। वह बहुत बड़ा दानी है। एक बार उसके पास जाता हूँ।” इतना कह गणेश जी का ध्यान कर राजा विक्रमादित्य के दरबार में जा पहुँचा। पहुँचा।राजा ने उसे देख दण्डवत किया और भाट ने आशीष दे कर बोला- “हे महाराज! मैं बहुत देशों से घूम कर आया हूँ और आपका यश मुझे यहाँ ले आया। आप मृत्युलोक में  इंद्र का अवतार हो।आपके बराबर दानी नहीं। इस समय आप दान देने में राजा हरिश्चंद्र हो और पूरी पृथ्वी पर आपका हीं यश छाया है। मैं काली का सूत हूँ। भाट वंश में मैंए अवतार लिया है। अब तुम्हें याचने आया हूँ। मेरा मनोरथ पूर्ण कर दो। मैंने पूरी पृथ्वी पर घूम कर देख लिया। केवल तुम हीं मेरा मनोरथ पूर्ण कर सकते हो।”

तब हँसकर राजा ने कहा- “तुम अपना मनोरथ मेरे सामने कहो।कहो।तो मैं उसे पूरा करूँ।” भाट ने कहा- “मुझे अपने भाग्य पर भरोसा नहीं है। पहले आप वचन दो।” जा ब राजा ने वचन दे दिया तब भाट ने कहा- “महाराज! मुझे मुँह माँगा दान दीजिये। मेरी पुत्री की शादी करवा दो। बारह वर्ष की कन्यामेरे घर में बैठी है। इसलिये मैं आपके पास आया हूँ।” यह सुन राजा ने मंत्री से  कहा- “जो यह मांगेवह इसे दे दो।” तब भाट ने कहा- “महाराज! आप जो कुछ भी देना चाहें। अपने सामने मँगा कर मुझे दीजिये। मुझे किसी पर भी एतबार नहीं।” राजा ने लाख रूपये, सोने,जेवर,गहने थाल में भरकर मँगवाये और उस भाट को दे दइया। भाट आशीष देता हुआ अपने घर को लौट गया। वह जो कुछ लेकर  आया था वह अपनी कन्याके ब्याह में लगा दिये।

राजा ने उसके पीछे अपना जासूस भेजा कि देखकर आ कि यह इस धन का क्या करता है। जब भाट ने कन्या की शादी कर दी और उसके पास एक जून खाने का न रहा तो जासूसों  ने राजा को खबर की।

जासूस ने राजा से  आकर कहा कि  महाराज! भाट ने ऐसा ब्याह किया जो  इस कलियुग में कोई नही कर सकता। जो कुछ भी आपने  दिया था वह सब लेकर अपनी  कन्या के विवाह में लगा दिया।अब उसके पास खाने को भी कुछ  नहीं है।

राजा यह सुनकर बहुत प्रसन्न  हुआ  कि  मेरे  राज्य में  ऐसे हिम्मती लोग भी  हैं।और  भाट के  घर  बहुत-सा धन  भिजवाया।

यह कह पुतली बोली- सुन राजा भोज!  क्या तू  ऐसा  दानी  और न्यायी है। इस तरह से वह  दिन भी  बीत गया।  दूसरे  दिन छब्बीसवीं  पुतली  विद्यावती  बोली-

छब्बीसवीं  पुतली  विद्यावती 

छब्बीसवीं  पुतली  विद्यावती  बोली-सुन राजा भोज! मैं तेर आगे ज्ञान की बातें कहती हूँ और तू  मन देकर ध्यान से सुन। जब आदमी जन्म लेता है तो कुछ संग नहीं  लाता और मरता है तो कुछ लेकर नहीं जाता।इस जीवन का फल यही है कि संसार में आकर कुछ कर्म करे और जैसा कर्म करेगा वैसा फल पावेगा। जीवन  बहुत  थोड़ा  है इसलिये ऐसा यश करो कि  जानेपर भी जग में नाम ठहरा रहे। दोनों लोकों  का सुख मिले। मनुष्य  का शरीर  बार-बार  नहीं मिलता।लक्ष्मी  का दान कर कुछ सोच मत कर। यही अपने मन  में सदा रख कि हमेशा दान कीजिये। इस संसार सागर से तरने का  सिवाय दान, उपकार और हरि  का भजन के चौथा उपाय कोई नहीं है।

मैंने  तुझसे कहा था कि साथ लेकर कोई कुछ भी नहीं जाता। मैं तुझे बताती हूँ कि राजा हरिश्चंद्र, राजा कर्ण, राजा विक्रमादित्य अपने साथ क्या ले गये। जिन्होंने दान, उपकार, हरिभजन किया उनका जग में नाम रहा अउर अंतसमय बैकुण्ठ  पाया।

ये बातें पुतली की सुन राजा भोज बोला – “राजा विक्रमादित्य ने क्या किया है। वह कह।”

तब विद्यावती पुतली बोली- एक दिन राजा विक्रमादित्य  राजसभा में बैठे थे तभी एक दासी ने आकर  कहा –“महाराज! उठिये पूजा का समय जाता है। ” यह सुनकर राजा ने विचार किया कि इसने सच कहा है। मेरी उमर चली जाती है और मुझसे ज्ञान, धर्म , पूजा नहीं हो पाया, इससे उत्तम यही है कि , इस राजकाज की माया भुला योग  कमाया जाये। जिससे कि आगे के जन्मे में काम आवे।

यह सोचकर राजा ने राजपाट, धन जन मिथ्या समझ तपस्या करने को वन में चल पड़ा। वन को जाता और सोचता कि इस सअंसार में  जीना सुबह की ओस के समान है और जिसके भरोसे मैंने अपना जीवन अकारण गँवाया। फिर विचार करता पूर्वजन्म में दान, तपस्या, व्रत बहुत किया होगा तभी यह मनुष्य का जन्म पाया।

यही सोचते-सोचते एक महावन में पहुँचा। वहाँ पहुँच कर देखता है कि एक तपस्वियों की मंडली बैठी हुई है। सब के आगे एक-एक धुनी लगी हुई है। सब आसन लगाकर अपने ध्यान में लगे हैं। कोई ऊर्ध्वबाहु, कोई कपाली, कोई पंचाग्नि इस तरह से अनेक-अनेक प्रकार की साधना में लीन है। कोई-कोई अपने शरीर का मांस काट-काट कर हवन कर रहा है।

राजा भी उनको देख तपस्या करने लगा। आप भी तपस्या करता रहा। तपस्वियों  की देखा-देखी राजा भी अपना शरीर भी काटकर हवन करने लगा। एक दिन राजा ने अपना सर भी काट कर हवन कर दिया। वहीं पर एक शिव मंदिर था उसमें से एक शिवगण निकला और निकलकर सब तपस्वियों की धुनी में से राख समेट कर अलग-अलग ढ़ेर  बनाया और शिवजी को खबर दी कि महाराज! आपने कहा था सो मैंने किया । तब शिव जी ने आज्ञा दी कि, यह अमृत तू ले जा और उनके ऊपर छिड़क आ। यह आज्ञा पा अमृत ला ज्यों-ज्यों शिवगण छिड़कता था त्यों-त्यों , उनमें से एक-एक तपस्वी शिव-शिव, राम-राम कहता खड़ा होता था।

सब  पर तो उसने अमृत  छिड़क दिया पर राजा की धुनी भूल  गया और सब तपस्वी मिलकर शिव जी की स्तुति करने लगे कि महाराज! आप अनाथ के नाथ हो जिसने आपका स्मरण किया उसको आपने फल दिया और जहाँ –जहाँ सेवकों पर संकट हुआ है वहाँ-वहाँ उनका साथ दिया है, यह स्तुति करके उन तपस्वियों ने कहा कि महाराज एक नृपति भी हमारे सआथ तपस्या करता था। आपका भक्त यह राजा भी है ।मालूम नहीं कि उसको उठाने की आपकी आज्ञा हुई की नहीं । यह सुन महादेव ने उस गण की तरफ देखा। देखते ही उसने अमृत ले जाकर जो राजा की धुनी बाकी रही थी उसा पर छिड़क दिया।राजा भी शिव-शिव, राम-राम कहता उठ खड़ा हुआ और हाथ जोड़ स्तुति करने लगा  कि महाराज! संसार के सब जीवों की आप सहाय करते हो और पालते हो। आप बिना इस संसार सागर से कौन पार उतारे। जिसने जग में आपको नहीं पहचाना  उसने अपना जन्म निष्फल किया।

फिर जितने तपस्वी थे उनको शिवजी ने मुँह मांगा वरदान दिया अउर सबको विदा किया।सबके पीछे जब  राजा अकेला रह गया तो उसे कहा – “हे राजा विक्रमादित्य! अब जो तेरी इच्छा हो वह मुझसे मांग।” यह सउन राजा ने कहा- “महाराज! आपकी दया से मेरे पास सअब कुछ है बस एक वर मांगता हूँ कि संसार के जन्म-मरण से मेरी मुक्ति  हो जाये। जैसे  और भक्तों  को मुक्त किया वैसे ही मुझ परम पापी दीन-हीन को तारो।” राजा की विनती सुन दयाकर ,शिवजी ने हँसकर कहा- “तेरे समान कर्मी इस कलियुग में कोई नहीं है। तू दानी, योगी, दाता, साहसी ,तपस्वी है। कलि के राजाओं का उद्धार करने वाला है । मैं तुझसे कहता हूँ कि तू जाकर अपना राज कर। तेरा काल जब निकट आवेगा तब तू मेरे पास आना। मैंने तुझेवचन दिया है  कि अंतसमय में मैं तुम्हें मोक्ष दूंगा। इससे तू अब जाकर मृत्युलोक में आनद से राज कर।”

फिर राजा करुणा करके बोला कि, महाराज! संसार में तुम्हारे प्रपंच कुछ समझ नहीं आता या तो मुझे इस समय तारो या मैं अपने प्राण त्याग दूँगा। यह सुनकर शिवजी हँसकर बोले – “यदि तू प्राण दे देगा। तो भी बिना मृत्यु के तुम्हारे शरीर को यम छुयेगा भी नहीं।और फिर जितनी तेरी आयु बची रहेगी तुझे यों हीं भटकना पड़ेगा।इसलिये तू जा और मेरा वचन में रख ।”

शिवजी ने राजा को एक कमल का फूल दिया और कहा कि जब यह मुर्झायेगा तब समझ लेना कि तेरी आयु के मात्र छह माह ही रह गये हैं। इतना कह शिवजी कैलाश को चले गये। और वह फूल लेकर राजा अपने नगर को लौट आया।

इसके बाद कई बर्ष बीत गये। एक दिन वह कमल का फूल मुर्झा गया। तब राजा समझ गया कि उसके पास अब केवल छह माह हीं रह गये हैं। जितना कुछ धन-दौलत उसके पास थी सो सब ब्राह्मणों को संकल्प कर दे दी।स्त्री और पुत्र के खाने को कुछ धन दे दिया। बाकी सब पृथ्वी ब्राह्मणों को दान कर दी। इस तरह राजा दान-पुण्य कर सशरीर कैलाश को चला गया।

इतनी बात कह पुतली बोली – सुन राजा भोज! विक्रमादित्यने इतना काम किया और जीवन-मरण दोनो जाना।इससे मैं तुझसे कहती हूँ कि जीवन का कुछ भरोसा नहीं और मरण निश्चित है। दु:ख सुख भी मनुष्य के साथ हैं और पाप-पुण्यभी रहते है। निर्गुण और सगुण भी एक घट में रहते हैं। पर एक ब्रह्म हीं अलग है।

हे भूपाल! संसार में जिसकी कीर्ति रह जाती है वही अमर है। जो मैणे तुझे कहा कि मन,वचन,कर्म कर वह तू सच जान। वह दिन तो यूं ही गुजर गया। राजा नाउम्मीद हो कर अपने कक्ष को चला गया। सुबह होते हीं  हाथ, मुँह धो, स्नान कर फिर वहीं पहुँचा और कहा कि पुतलिया तो यूँ ही झूठ-झूठ बातें बनाती है। अब मै इनकी बातें न सुनूंगा और इस सिंहासन पर बैठूंगा। यह बातें वह कह हीं रहा था कि सत्ताइसवीं पुतली जगज्योती बोली-  

सत्ताइसवीं पुतली जगज्योती

सत्ताइसवीं पुतली जगज्योती बोली-  सुन राजा भोज! एक दिन राजा विक्रमादित्य अपनी सभा में बैठा था कि एक प्रसंग निकला। किसी ने कहा कि आज राजा इंद्र के बराबर कोई राजा नहीं है। क्योंकि वह देवलोक का राज करता है। यह बात राजा ने सुन किसी से कुछ न कहा और वैतालों को बुलाकर कहा कि, मुझे इंद्रपुरी ले कहलो। वैताल तुरंत ले उड़े और एक क्षण में इंद्र की सभा में पहुँचा दिया।

राजा ने जाते हीं वहां इंद्र को दंडवत की और हाथ जोड़ खड़ा हुआ। तब इंद्र ने बैठने की आज्ञा दी।वह आज्ञा पाकर बैठ गया। तब इंद्र ने पूछा- “तुम कहाँ से आये हो और तुम्हारा क्या नाम है? अपने देश का नाम बताओ और यहां किस अर्थ से आये हो? यह बताओ। ”

तब राजा बोला- “स्वामी! अम्बावती नगरी का मैं राजा हूँ। मेरा नाम विक्रम है और आपके पद पंकज के दर्शन के अर्थ से यहाँ आया हूँ।” यह सुन प्रसन्न हो इंद्र बोला- “हमने भी तुम्हारा बहुत नाम सुना है और मिलने की इच्छा मुझे भी था। सो तुमने आके उलटी रीत की । अब जो कुछ तुम्हारा मनोरथ हो सो हमसे कहो और जो कुछ तुम्हें चाहिये वह मांगों। हम तुम्हें जरूर देंगे।”

राजा ने कहा – स्वामी! आपकी कृपा और धर्म से सब कुछ है और जो कुछ न हो तो मै आपसे मांगूँ। आपका दिया हुआ सब कुछ मेरेपास है। राजा की ये बाते सुनकर इंद्र ने प्रसन्न हो अपना मुकुट और एक विमान दे यह आशीष दिया को जो तुम्हारे सिंहासन को बुरी दृष्टि से देखेगा वह तुरंत अंधा हो जायेगा।

राजा वहा से विदा हो फिर अपने नगर में आया और बधाई बजने लगी। इतनी बात पुतली सेसुनकर राजा भोज सिंहासन पर हाथ धरकर अपने एक पांव को ऊपर रख खड़ा होकर कहने लगा कि आसन मार गद्दीपर जा बैठूं। इतने में आँखों से अंधा हो गया  और दीवानी दीवानी बातें करने लगा। चाहता था कि हाथ सिंहासन से हटा ले , पर उसका हाथ सिंहासन से चिपक गया था।

यह देख पुतलियाँ खिलखिला कर हँसने लगी। पूरी सभा स्तब्ध हो गई। सब सोचने लगे कि राजा ने यह क्या किया। पुतली की पूरी बाते सुने बिना सिंहासन पर पाँव धरा। अपनी दशा देख  कर राजा भोज बहुत पछताया और लज्जित हुआ। तब पुतली ने कहा- “हे राजा! तूने हमारी बात न सुनकर यह फल पाया। अब तू ऐसे ही रह।” यह सुन राजा ने कहा- “इससे निकलने का उपाय बताओ।”

तब पुतली बोली- “इसका उपाय यह है कि  तू राजा विक्रमादित्य का नाम ले तभी इससे छूट पायेगा।” यह सुन राजा भोज ने विक्रमादित्य के साहस और पराक्रम का गुणगान किया तब वह सिंहासन से छूट पाया और  आँख से भी देखने लगा।

यह देखकर सभी बड़े भयभीत हुये और राजा भी डर गया। सभा के सब लोग बोले कि राजा विक्रम के समान होना इस कलियुग में बड़ा कठिन है, फिर पुतली बोली- “राजा! इसी लिये मैंने कहा था ।पर तू ने मेरी बात झूठ माना। तुझे कुछ भी ज्ञान नहीं जो तू विद्या पढ़ा है। उससे कुछ नहीं होता। ज्ञान कुछ और हीं चीज है। ”

तू अपने को राजा विक्रमादित्य के बराबर मत समझ। वह देवताओं के समान थ। उसके बराबर तेरा ज्ञान ,ध्यान नहीं है। इस सिंहासन की आश छोड़ दे। संसार में बहुत बातें है, वे कर, जिससे तेरा राज स्थिर हो। तेरा प्रताप बढ़े, कीर्ति रहे। वह दिन भी गुजर गया। राजा फिर अपने महल में गया। रात जैसे-तैसे बीती। सुबह होते हीं पूजा-पाठ कर उसी सिंहासन के पास आ खड़ा हुआ।

इस बार अट्ठाइसवीं पुतली मनमोहिनी  बोली-

अट्ठाइसवीं पुतली मनमोहिनी

इस बार अट्ठाइसवीं पुतली मनमोहिनी  बोली- सुन राजा भोज! वीर विक्रमादित्य के समान बली, साहसी और ज्ञानी  कलियुग में यदि दूसरा कोई हुआ हो तो तू मुझे बता दे। और जो मैं कहती हूँ उसे सच मान।

एक दिन मैंने राजा वीर विक्रमादित्य  से हँसकर कहा- “स्वामी! पाताल मे राजा बलि बड़ा राजा है, जिसके दास समान भी तू नहीं हो सकता है और जो तू अपना राज स्थिर करना चाहे तो एक बार राजा बलि के पास जाकर आ। ”

यह बात सुनते हीं राजा ने बैतालों को बुला कर आज्ञा दी कि पाताल में राजा बलि के पास मुझे ले चलो। यह सुनते हीं वैताल क्षण में ही उसे ले पाताल पहुँच गये। राजा वह नगर देखर भौचक हुआ। और अपने मन में कहने लगा कि ऐसा नगर मैंने आज तक नहीं देखा। आनंद कैलाश के समान हो रहा है। धन्य राजा बलि को जो इस नगर का राज करता है। इस तरह से नगर देखता हुआ राजा के सिंहद्वारा पर  जा पहुँचा और हाथ जोड़ विनती कर द्वारपालो से कहा कि, अपने राजा से  जाकर कहो-“मृत्युलोक से राजा विक्रम आपके दर्शन को आया है।” सुनते हीं द्वारपालो ने अपने राजा के पास जाकर यह समाचार दिया।यह सुनकर राजा बलि ने कहा कि मैं नर को मुँह न दिखाऊँगा। यह सुन विक्रमादित्य ने कहा जब तक मुझे राजा दर्शन ना देंगे मैं यहाँ से हिलूँगा नहीं।

यह बात द्वारपालो  ने जाकर राजा बलि से कही। तब उसने कहा कि विक्रम कौन है? यदि राजा इंद्र भी आये तो मैं दर्शन न दूँ।राजा विक्रमादित्य ने दु:ख पाकर अपना सिर काट डाला। राजा बलि के सभा में सभी कहने लगे कि बहुत अयुक्त काम इस प्राणे ने किया। जब राजा बलि ने यह सुना तो हँसकर कहा कि अमृथ ले जाकर उसे जीवित करो और कहो की तू जी मत घबरा तुझे राजाके दर्शन होंगे। इस सअम्य तुम अपने नगर को जाओ और राज-काज देखो।

जब शिवरात्रि होगी तब आओ। तुझे राजा के दर्शन होंगे। यह सुन राजा बलि का एक दास अमृत ले कर गया और विक्रमादित्य को जीवित कर दिया॥ जब विक्रमादित्य सावधान हो कर बैठ गया तब उसे दास ने राजा बलि का संदेशा कहा। तब विक्रमादित्य ने दास से कहा- “तुम यह बात कहा कर मुझे क्यों बहकाते हो। मैं तुम्हारा कहा न मानूंगा। इससे अच्छा है कि अभी महाराज का दर्शन करूँ।”

उस दास ने राजा बलि को जाकर सब बातें बता दी और कहा कि वह नहीं मानता और जाने को भी तैयार नहीं । विक्रमादित्य ने जब जवाब आने में देरी देखी  तो दुबारा से अपना सिर काट लिया। जब राजा बलि ने सुना तो फिर से दास को बोला कि उसे जीवित कर समझा –बुझा अपने राज्य को भेज दो।  दास ने उसे जीवित कर कहा कि अपने मन में धीरज रख तुझे राजा के दर्शन होंगे।

राजा बलि के सभा में मौजूद सभी प्रणियों ने राजा से विनती कर कहा कि विक्रमादित्य ने बड़ी साहस का कार्य किया है इस वास्ते आप उसको दर्शन दो। उसके आशा को निराश न करो।

सभी की बातें सुन कर राजा बलि द्वार पर आया और विक्रमादित्य को दर्शन दिये। तब दंडवत कर हाथ जोड़कर विक्रमादित्य ने कहा- “महाराज! धन्य है मेरा भाग्य जो मुझे आपके दर्शन हुये। ” फिर कहने लगा कि मेरा क्या अपराध था जो मुझे दर्शन न देते थे? क्या मैं साहसी नहीं हूँ या मुझे लोक के लोग नहीं जानते। वह कौन-सा पाप था जिसके कारण अपने बुरा माना? यह मुझे कृपा कर बताओ।

तब राजा बलि हँसकर बोला- “सुन विक्रम! तेरे समान और कोई राजा नहीं । अब कान देकर सुन कि तेरे आगे इसका यथार्थ कहता हूँ। पहले राजा हरिश्चंद्र बड़ा दानी , साहसी , यशी हो गया है और एक राजा जगदेव बड़ा प्रतापी और दानी हो गया है। उन दोनों ने भी बड़ा दान और साहस किया थ। पर तेरे-जैसा उनका न था और उन्होंने भी मेरे दर्शन की बहुत अभिलाषा की थी। पर मैंने दर्शन किसी को न दिया। तू एक द्वीप का राजा किस गिनती में है? पर तेरी तपस्या जोरबार है जो तुझे मेरा दर्शन हुआ। ”

 राजा विक्रम फिर हाथ जोड़कर कहने लगा- “महाराज! जो आपने कहा सब सअच है। और मैंए निश्चयकर अपने जी में माना कि आपने मुझपर बड़ी कृपा कर दर्शन दिया। और दया कर इस भवसागर से पार किया।”

तब राजा बलि ने कहा- “राजा विक्रम! अब तू यहां से विदा हो और जाकर अपना राज कर।” विदा का नाम सुनते हीं राजा विक्रम के मन में बड़ा खेद हुआ। इतने में राजा बलि ने एक लाल मँगवाकर राजा विक्रम को प्रसाद के रूप में दिया और उसका जो गुण था सओ बताया कि जो तू इससे मांगेगा वह सब यह देगा। विक्रम ने हाथ जोड़ लिया और राजा बलि को दंडवत कर वहाँ से निकला। वैतालों को बुलाकर सवार हो अपने नगर को आया।

जब नगर के निकट आन पहुँचा तब एक नदी के किनारे देखा कि एक स्त्री  का पति मर गया है। उसे जलाकर वह स्त्री विलाप कर रही है कि अब इस संसार में मेरा मालिक कोई नहीं है और न मेरे पास कुछ माया है। मैं किस तरह से इसका श्राद्ध  करोंगी और पंचों को क्या दूंगी?

उस स्त्री के रोने की आवाज राजा ने सुना और वहाँ जाकर देखा, कि उस स्त्री का यह हाल हो रहा सो देखकर राजा बलि के द्वारा दिया हुआ वह लाल उस स्त्री  को दिया। और कहा कि जो तू इससे मांगेगी सो यह लाल तेरी आशा पूरी करेगा। उसको ले वह स्त्री अपने धाम को गई और राजा वीर विक्रमादित्य अपनेमहल में दाखिल हुआ।

इतनी बात कह पुतली बोली कि सुन राजा भोज! ये गुण विक्रम में थे। वह ऐसा साहसी था और रजा का हितकारी। जो तू  सात  स्वर्ग घूम आवेगा तो भी उसके समान न हो सअकेगा। इससे अब तू अपने मन के खयाल से बाज आ। वह भी दिन उसी तरह से टल गया। दूसरे राजा अपने  दीवान के साथ सिंहासन के पास खड़ा हुआ । इतने में वैदेही नाम की उन्नतीसवीं पुतली ने कहा-

उन्नतीसवीं पुतली वैदेही

वैदेही नाम की उन्नतीसवीं पुतली ने कहा- हे राजा भोज! तू किस बात पर भूला है? सब सखियों ने तुझे राजा विक्रम की कथा सुनाइ तब भी तेरा पत्थर दिन न पिघला। अभी पहले मुझसे बात सुन ले और बाद में इस सिंहासन पर पाँव दे । राजा भोज ने कहा- “अच्छा, कह। मैं सुनूंगा।”

पुतली वैदेही बोली- एक दिन राजा विक्रमादित्य महल में सो रहा था कि एक ख्वाब देखा। वह मैं तुझसे कहती हूँ। राजा विक्रमादित्य  ने देखा कि एक सिद्ध का एक सोने का महल है, उसमें अनेक-अनेक प्रकार के रत्न जड़े हैं। तरह-तरह के पकवान थालों मे सजे हुये हैं। एक फूलों की सेज बिछी हुई है। एक तरफ फूलों के गहने चनेरों में भरे हुए है। इत्रदान, पानदान, गुलाबपाश भरे हुये हैं। और महल के चारों ओर फुलवारी है। महल के बाहर दीवारों पर रंग-रंग के चित्र बने हुए हैं, जिन्हे देखकर आदमी तुरंत हीं मोहित हो जाये और उस महल के अंदर खूबसूरत स्त्रियां साज मिलाये हुये मीठे-मीठे राग गा रही हैं।

यह देख राजा ने अपने जी में कहा कि यह तपस्वी इन स्त्रियों के योग्य नहीं है।इतने में राजा की आँख खुल गई और सुबह हो गई। तब राजा ने स्नान, ध्यान कर वैतालों को बुलाकर कहा कि मैंने स्वप्न में जो सथान देखा है मुझे वहाँ ले चलो। पलक झपकते हीं वैतालों ने राजा को उस स्थान पर पहुँचा दिया। राजा वहाँ पहुँच वैतालों को विदा किया और स्वयं पैदल उस बगीचे में जाकर उस भवन को देख मन में सोचा यह भवन किसने बनाया? आदमी के वश का तो नहीं जरूर ब्रह्मा ने इसे बनाया हो।

यही सोचते उस महल के अंदर गया।उसे देखते हीं सभी स्त्रियां जो गाना गा रही थी दर से चुप हो गई और उस तपस्वी को स्मरण किया। वह तपस्वी तुरंत हीं वहाँ पहुँचा और राजा विक्रम को देख क्रोधितहो बोला‌ “अभी मैं तुझे शाप देता हूँ कि तू जलकर भस्म हो जाये। मेरे स्थानपर तुम किसलिये आये हो? सुख से ये स्त्रियाँ राग आलाप रही थी। इतने में तू ने आकर इनका ध्यान भंग किया। ”

यह सुन राजा हाथ जोड़ विनतीकर बोला- “महाराज! मैं अनजाने में यहाँ आया हूं। तुम्हारे दर्शन की इच्छा थी। पर आपके क्रोध की आँच को कौन सह सकता है? मैं आपका दास हूँ। मेरी भूल माफ कीजिये। ” यह सुन वह सिद्ध बोला – “सुन राजा विक्रम! तूने सच कहा । मुझे बड़ा क्रोध था। पर यदि तू मेरे सामने न होता तो मैं तुझे शाप दे देता और अब मैं तेरी बात सुन प्रसन्न हुआ तू मुझसे मांग । जो तुझे चाहिये। ”

राजा ने कहा- “महाराज! मै क्या मांगू । आपके प्रसाद से मेरे पास सअब कुछ है। अन्न,धन,हाथी,घोड़े किसी चीज की कमी नहीं। पर एक वस्तु मात्र मांगने के लिये मैं आपके पास आया हूं। यदि कृपाकर दीजिये तो मैं मांगू।” यह सुन सिद्ध ने कहा- “राजा! जो तू मांगेगा सो मैं दूंगा। ”

यह सुनते हीं राजा विक्रमादित्य ने कहा- “महाराज! यह महल मुझे दे दीजिये।” योगी ने एक क्षण गंवाये बिना वह महल राजा को दे दिया और अपना योगरूप धर तीर्थ को चला गया। राजा ने जब वह महल पा लिया, तब प्रसन्न हो गद्दीपर जाकर बैठ गया । वे सब स्त्रियाँ  फिर से गाने लगी जैसेयोगी के पास गाती थी। राजा उस महल में रहने लगा और अनेकों सुख भोगे।

इतनी बात कह वह वैदेही पुतली बोली- “इस प्रकार से राजा विक्रमादित्य तो वहां बैठकर आनंद करने लगा और योगी तीर्थ-तीर्थ फिरकर रहता था। ” जो कोई भी सिद्ध मिलता था उसे अपना दु:ख कहता था। एक दिन उसे एक यती मिला और उसने उस योगी से कहा कि तू अपने स्थान पर जा और वेष बदल कर राजा विक्रम से जाकर सवाल कर वह बड़ा धर्मात्मा राजा है। जब तू उससे वह महल मांगेगा तो वह तुझे दे देगा। योगी ने उस यती की बात मान एक अति बूढ़े  ब्राह्मण का भेष धर उस महल  के निकट  पहुँचा और ताली देकर आवाज दी। आवाज सुनते हीं राजा बाहर आया और कहा- “तू यहाँ किसलिये आया है? और जो तेरी इच्छा हो वह मांग । मैं तुझे दूंगा।”  यह सुन बूढ़े  ब्राह्मण के वेष में वह योगी बोला- “महाराज! मैं सारी पृथ्वी पर घूम आया लेकिन अपनी इच्छा का स्थान नहीं पाया, जहाँ बैठकर आराम करूँ।”

यह सुन राजा हँसकर बोला- “यदि यह स्थान तुम्हारे इच्छा के अनुसार हो, तो ले लो।” यह सुन ब्राह्मण ने प्रसन्न हो राजा को आशीष दिया। राजा उसे वह महल देकर अपने राज्य को लौट आया।

इतनी बात कह पुतली बोली- “तू ऐसा धर्मात्मा नहीं । इसलिये तू इस सिंहासन पर मत बैठ।जो राजा विक्रमादित्य के बराबर हो वह इस सिंहासन पर बैठे।’ वह मुहुर्त भी बीत गया। अगली सुबह राजा  जैसे हीं सिंहासन की ओर बढ़ा कि तीसवीं पुतली रूपवती ने राजा से कहा-

तीसवीं पुतली रूपवती

तीसवीं पुतली रूपवती ने राजा से कहा-सुन राजा! बावले अज्ञानी । ऐसा पुरुषार्थ तूने कब किया? जो सिंहासन पर बैठने को तैयार होकर आया।

अब एक दिन की बात सुन। राजा विक्रमादित्य रात को अपने कक्ष में आराम से सो रहा था। इतने में कुछ मन में विचार किया और पलंग से उठ , वेष बदल हाथ में ढ़ाल,तलवार ले चल पड़ा। शहर की गलियों में घूमने लगा।

कुछ दूर  जाने पर कुछ चोर दिखाई दिये। वे आपस में चोरी की बातें कर रहे थे। उनमें से एक बोला कि अच्छा –सा सायत देखकर चोरी को चलो , जिससे कुछ माल-पानी हाथ लगे। ऐसे जाने पर दु:ख भी मिलेगा और खाली हाथ भी लौटेंगे। यही सब बातें वे कर रहे थे कि उनमें से एक की नजर राजा पर पड़ी। उन्होंने राजा से पूछा- “तुम कौन हो? ” राजा ने उत्तर दिया- “जो तुम ,वही मैं।”

यह सुनकर उन्होंने राजा को भी साथ ले चोरी करने चल पड़े।आगे एक जगह पहुँचकर एक-दूसरे से पूछने लगे अपना-अपना मन कहो।उनमें  से एक ने कहा- “मै ऐसा मुहुर्त जानता हूँ, जिसमें यात्रा करने से कभी खाली हाथ नहीं आना पड़े।” दूसरे ने कहा- “मैं सभी जानवरों की बोलियाँ समझता हूँ।” तीसरे ने कहा- “मैं जिस घर में जाऊँ, मुझे कोई नहीं देख सकता अउर मैं अपना काम कर आऊँ। ” चौथा बोला- “मेरे पास ऐसी जिसके कारण कोई मुझे कितना भी मारे , मैं न मरूँ।”  उसके बाद सबने राजा से पूछा- “तुम्हें कौन-सी विद्या आती है।”

तब राजा बोला- “ मुझे यह विद्या आती है कि मैं बता सकता हूँ कहाँ धन गड़ा है।” तब उन चोरों ने राजा से कहा- “ठीक है। तुम आगे चलो। हमलोग पीछे- पीछे। जहाँ धन गड़ा हो वह जगह तुम बताना।”

इस तरह वे सब चल दिये। राजा सभी चोर को लिये हुये राजमहल के बगीचे के पीछे पहुँचा। और जिस जगह राजा की दौलत गड़ी थी वह स्थान बताया।चोरों ने वहाँ खुदाई की तो एक  तहखाने का दरवाजा निकला। उसे तोड़कर अंदर देखे तो करोड़ों का जवाहरात और अशरफिया, रूपये भरे हैं।तब वे सब ले गठरी बाँध सर पर धर कर चल दिये। तभी एक गीदड़ बोला। तब जो जानवरों की बोली समझता था वह बोला- “भाई! यह गीदड़ कह रहा है कि इस धन के लेने में कुछ कुशल नहीं।” उनमें  से एक बोला अपना शकून तू रहने दे।पाई हुई लक्ष्मी तो हम नहीं छोड़ते। छोड़े तो हमारे धर्म में बट्टा आवे।तब उनमें से दूसरा बोला –“सुनो भाई! धन-रत्न तो पाये , पर वस्त्र नहीं पाये। इसलोयेकहीं चलकर वस्त्र चोरी कर लें। जिससे फिर चोरी न करना पड़े।” फिर उनमें से एक बोला‌ – “पास में ही राजा का धोबी रहता है, उसके घर सेंध लगा कर अच्छे वस्त्र ले लें।”

यह सोच कर वे सब धोबी के घर के पिछवाड़े गठरियाँ रखकर सेंध लगाई। इतने में धोबी का गधा रेंकने लगा। सारे चोर छिप गये। धोबी उठा और किसी को न देख-गधे को मारने लगा कि एक तो सारा दिन मेहनत करो और रात में यह गधा सोने न देता है। जब दुबारा गधा रेंका तब गुस्से में आकर धोबी ने उसकी रस्सी खोल दी और स्वयं जा कर सो पड़ा। चोरों ने वस्त्र चोरी करने के लिये धोबी के घर में घुस गये। इधर राजा ने सोचा कि वह तो अपना धन था उसका कुछ भी करो लेकिन यहाँ चोरी कर धर्म क्यों भ्रष्ट करूँ। यह सोच राजा वहाँ से चुपचाप निकल गया।

जब चोर कपड़े ले कर धोबी के घर से निकले तो राजा को न देख सभी सामान ले अपने घर पहुँचे। सवेरा होते हीं शोर मच गया कि राजा के भंडार में चोरी हो गई।गई।कोतवाल अअया, और देख-भाल कर घाट और सारे रास्ते बंद करवा दिये। जासूसों को लगाया। तब जाकर चारों चोर पकड़े गये।

चोरों को राज दरबार में पेश किया गया।राजा को देखते हीं वे चोर आपस में विचारने लगे कि पाँचवे चोर की शक्ल तो राजा से हू-ब-हू मिलती है। धन चोरी के सअमय तो वह साथ था लेकिन जब हमने कपड़े चोरी किये तो वह चला गया।यही सोच वे सब आश्चर्य में थे कि वह अपना हिस्सा भी नहीं ले गया।

तभी राजा ने कहा- “तुम सब मेरा मुँह देख-देख कर क्या विचारते हो? तुम्हारी भलाई इसी में है कि बता दो धन कहाँ छुपा रखा है।” तब चोरों ने कहा- “महाराज! हम बड़े आश्चर्य मे पड़े हैं कि एक और चोर रात को हमारे साथ में था। जब तक हमने चोरी की हमारे साथ था लेकिन अपना हिस्सा लेने के पहले हीं वह चला गया। ” राजा को चोर ने कहा- “अच्छा! उस चोर को भी बुला लो।” तब उतने मे एक चोर बोला – “महाराज! चाहे तो हमें मार दालो और चाहे तो हमें छोड़ दो, पर हम सच कहते हैं कि हमारा पाँचवा साथी बिल्कुल आपकी शक्ल का हीं था। हमने चोरियाँ तो बहुत की हैं लेकिन कभी ऐसा नहीं देखा कि चोर अपना हिस्सा छोड़ दे।इसलिये हम धर्म के साथ कहते हैं कि हमारे साथ आप ही थे।”

यह सुनकर राजा हँसकर बोला- “तुम अपने जी में मत डर । हमने तुम्हारी जान बख्श दी।दी।पर एक बात तुमलोगों को हमारी माननी पड़ेगी। तुम सभी आज से चोरी का धंधा छोड़ दोगे। यदि तुम्हें और धन की जरूरत है तो मेरे खजाने से ले जाओ।”

सुनकर चोरों ने राजा की आज्ञा मान ली। राजा ने उन्हें और भी मुँह मांगी दौलत दी और विदा किया। वे सअभी धन ले कर अपने घर को लौट आये। इतनी बात कह वह पुतली बोली- “सुन राजा भोज! तू ऐसा साहस न कर सकेगा। इस वास्ते इस सिंहासन के योग्य न होगा। इसलिये कहती हूँ कि अपना राज-काज सँभाल और अपने मन से यह खयाल निकाल दे।”

राजा चुपचाप वहाँ से उठ कर चल दिया। अगले दिन फिर सिंहासन के पास आया और अपने मन में सोचने लगा  कि , मैं इस सिंहासन पर बैठने न पाया। बिना स्वार्थ हीं जन्म गँवाया। सब देश-देश यह खबर हो चुकी कि, राजा भोज राजा वीर विक्रमादित्य के सिंहासन पर बैठने लगा सो बैठना मेरा न हुआ। यह बात सुनकर सब लोग हंसेंगे और गंधर्व गालियाँ देंगे। मेरे कुल को कलंक लगा। यह अपने मन में सोचकर नीची गर्दन किये सिंहासन के पास जाकर खड़ा हुआ।

फिर मन में सोचने लगा , एक माँ वह थी जिसका वीर विक्रमादित्य जैसा पुत्र था अउर एक मैं हूँ कुल का कलंक लगाया।और अपने मन में  जो  सोचा वह कर न पाया। ऐसी-ऐसी बातें राजा विचार कर चिंता करता था। यही सोच झुंझलाकर सिंहासन की ओर बढ़ा कि इक्कतीसवीं पुतली कौशल्या बोली-

इक्कतीसवीं पुतली कौशल्या

इक्कतीसवीं पुतली कौशल्या बोली- सुन राजा भोज! तू बड़ा मूर्ख है, जो हमारा कहा नहीं मानता। कंचन की बराबरी पीतल नहीं कर सकता और हीरे के बराबर शीशा नहीं होता।चंदन के गुण को नीम नहीं पाता। इससे तू समझ जा के तू राजा विक्रमादित्य की बराबरी नहीं कर सकता।यह सुन राजा को बहुत पछतावा हुआ।

तब कौशल्या नामक पुतली बोली- राजा विक्रमादित्य के मरने के दिन बहुत नजदीक आ गये, तब राजा को मालूम हुआ। तब उसने नगर के बाईं ओर गंगा के किनारे एक भवन बनवाया और वहीं जाकर रहने लगा।और ढ़िंढ़ोरा पिटवा दिया कि जो कोई दान लेना चाहे वो यहाँ आकर ले जाये। यह सुनकर जितने ब्राह्मण, पंडित,भाट, भिखारी , राजा के पास आये उन्होंने मुँह मंगा दान पाया।यह सुनकर बहुत से देवता रूप बदल कर राजा विक्रमादित्य का सत देखने के लिये वहाँ  आये। और आ आकर जो-जो जिसके जी में आया सो-सो मांगने लगे।  राजा ने भी सभी को दान दिया।जब दान ले चुके तो राजा के सामने असल रूप में आकर आशीष दे कहने लगे- “धन्य है राजा विक्रम और धन्य है तेरे माता-पिता। तूने ऐसा शमां बाँधा कि तीनों लोकों में तेरी निशानी रहेगी।”

सत्ययुग में जैसा सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र, त्रेता में जैसा दानी राजा बलि और द्वापर में जैसा राजा युधिष्ठिर हुआ वैसा कलियुग में तू राजा वीर विक्रमादित्य है।जैसे चारों युगों में तुम धर्मात्मा राजा हुए वैसे और न हुए और न होंगे। इस तरह राजा से कह देवता वहाँ से विदा हो गये।

इतनी बात कह पुतली बोली कि सुन राजा भोज! देवता तो सब विदा हो गये और राजा विक्रमादित्य झरोखे में आकर बैठ गया। इतने में राजा को एक सोने का हिरण दिखा । वास्तव में वह एक राजा था जिसे किसी ऋषि के श्राप के कारण हिरण योनी मिली थी।

राजा उस सोने के हिरण को देखते हीं उसको मारने के लिये धनुष –बाण उठाया और जैसे हीं मारनेको हुआ कि हिरण बोला- “मैं जन्म का ब्राह्मण हूँ । भूख के काराण दिन-रात यहाँ-वहाँ फिरता हूँ। एक सिद्ध के श्राप के कारण मुझे यह योनी मिली है।जब सिद्ध से मैंने पूछा कि महाराज! मुझे इस योनी सए मुक्ति कब मिलेगी। तब उसने कहा कि कलियुग में एक राजा वीर विक्रमादित्य बड़ा दाता और साहसी राजा होगा। जब तू उसका दर्शन करेगा तब तुझे इस योनी से मुक्ति मिलेगी।इसलिये मैं तेरे दर्शन को आया हूँ। ”

राजा उस हिरण की बातें सुनकर हँसा और उसी क्षण उस हिरण ने अपने प्राण त्याग दिये।राजा ने उस हिरण को जलाकर , उसके भस्म को गंगा में प्रवाहित कर दिया। और हिरण के नाम से बहुत से यज्ञ किये।

यह कह पुतली बोली- “सुन राजा भोज! तू उसके बराबर कैसे हो सकता है।तू इस सिंहासन को वहीं जाकर गड़वा दे जहाँ से निकाल कर लाया था।”

पुतली की यह बात सुन राजा भोज अपने जी में सोचने लगा और कुछ उत्तर न दे पाया।वहाँ से निराश हो अपने कक्ष में आया।सवेरा हुआ तो मन में वैराग्य ले और सब कुछ तुच्छ मान उसी सिंहासन के पास खड़ा हुआ और चढ़ने को पैर बढ़ाया तब बत्तीसवीं पुतली भानुमती ने कहा-

बत्तीसवीं पुतली भानुमती

बत्तीसवीं पुतली भानुमती ने कहा- सुन राजा भोज एक कथा मेरी सुन । यह कह वह बोली‌-

अंत समय में राजा वीर विक्रमादित्य विमानपर बैठ इंद्रलोक को गया और अंबावती नगरी में शोक हुआ । तीनों लोकों में हंगामा मचा कि, राजा वीर विक्रमादित्य सदेह स्वर्ग गया। राजा के साथ हीं उनके दोनों वीर वैताल भी लोप हो गये।न वह स्वामी रहा , न वे दास रहे। संसार में से धर्मात्मा चला गया। और राजा की सब रैयत हाहाकार करने लगी। ब्राह्मण, भाट, भिखारी, स्त्री, दु:खी सब  हाय-हाय कर रोने लगे कि हमारा आदर और मान करनेवाला राजा जगत से उठ गया।

रानियाँ तो राजा के साथ सती हो गई और जितने दास-दासी थे सो सब अनाथ हो गये। जितने लोग नौकर-चाकर, सिपाही, शागिर्द सभी रोते और कहते थे कि हाय! हममें से कोई काम न आया।

इसी तरह से हर तरफ खलबली मच गई। मंत्री ने राजा कुँवर को राजतिलक कर गद्दीपर बैठाया और तमाम मुल्कों में राजा जैतपाल के नाम का ढ़िंढ़ोरा पिटवा दिया। जब जैतपाल राजा हुआ तब वह एक दिन इस सिंहासन पर बैठा। बैठते हीं उसे मूर्छा आ गई और वह बेहोश हो गिर पड़ा। उसने एक स्वप्न देखा । उस स्वप्न में राजा वीर विक्रमादित्य ने उसे मना किया कि , इस सिंहासन पर मत बैठ। जब मेरे जैसा साहस और दान करे तब इस पर बैठना।इतने में राजा जैतपाल की मूर्छा जाती रही। वह सिंहासन से उठ नीचे उतर आया। मंत्री को बुलाकर  सभी बातें  बताई।

तब मंत्री  ने राजा जैतपाल से कहा-“इस आसन पर आपका बैठना उचित नहीं। और मैं एक बात कहता हूँ  ध्यान से सुनिये। आज रात पवित्र हो भूमि पर बिछौना लगाकर राजा का ध्यान कीजिये और  कहिये कि महाराज! आपकी जो आज्ञा हो उसी के  अनुसार मैं करूँ। यह कामना कर रात को सोइये।  जैसा जवाब कामना  का मिलेगा वैसा ही कीजिये।”

राजा जैतपाल ने मंत्री के कहे अनुसार किया।जब वह सो गया तब स्वप्न में राजा विक्रमादित्य ने  कहा- उज्जैन नगरी और धारा नगरी छोड़कर ,तुम अपना राज्य  अंबावती में  जाकर करो। और इस सिंहासन को यहीं पृथ्वी को सौंप दो।

सवेरा होते हीं जैतपाल ने मजदूरों को बुलवाकर इस सिंहासन को पृथ्वी में  गड़वा दिया।  और स्वयं   आज्ञानुसार  अंबावती नगरी में जाकर राज करने लगा।  धीरे-धीरे उज्जैन और धारा नगरी उजड़ गई।

इतना कह पुतली  चुप हो गई। राजा भोज ने दीवान को बुलाकर  आज्ञा दी कि  इस सिंहासन  को जहाँ से निकाल  कर  लाया गया था,वहीं  गड़वा दिया जाये। 

इसके  बाद से  अपना राज्य मंत्रियों को सौप  कर स्वयं तपस्या करने लगा।